प्रार्थना में अर्पित रहो


… आशा में आनन्दित रहो; क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो …

आज प्रातः इस संदेश में, मेरा सरल और मानवीय रूप से असम्भव लक्ष्य है कि आप सभी सन् 2003 में प्रार्थना में अर्पित/ लगे रहें। मेरा लक्ष्य ये है क्योंकि यही है जो बाइबिल हमें होने के लिए बुलाती है। रोमियों 12: 12 मेरा मूल-पाठ है, जो कि प्रोत्साहन की एक लम्बी श्रंखला का भाग है। ये कहता है कि हमें ‘‘आशा में आनन्दित; क्लेश में स्थिर; प्रार्थना में नित्य लगे रहना (प्रोसकार्टराउन्टेस) है।’’

हो सकता है कि आपका भाषान्तर/अनुवाद कहे, ‘‘प्रार्थना में स्थिर’’ या ‘‘प्रार्थना में विश्वासयोग्य।’’ वे सभी, शब्द के विभिन्न पक्षों तक पहुँचते हैं। ‘‘अर्पित,’’ एक अच्छा अनुवाद है। ये शब्द मरकुस 3: 9 में उपयोग किया गया है जहाँ ये कहता है, ‘‘उस ने {यीशु} अपने चेलों से कहा, भीड़ के कारण एक छोटी नाव मेरे लिये तैयार रहे (प्रोसकार्टेरे ) ताकि वे मुझे दबा न सकें।’’ एक नाव को अलग किया जाना था - अर्पित - इस उद्देश्य से कि यदि भीड़ एक ख़तरा बनती है, यीशु को दूर ले जावे। ‘‘अर्पित’’ - एक कार्य के लिए समर्पित, इसके लिए नियुक्त।

अब, नाव एक जगह स्थिर रहती है। किन्तु लोग इस तरह समर्पित नहीं हैं। जब ये शब्द एक व्यक्ति पर लागू होता है तो इसका अर्थ होता है न केवल पद व नियुक्ति के अर्थ में अर्पित या समर्पित अपितु नियत कार्य में कार्यशील, और इसमें तत्पर रहना। अतः उदाहरण के लिए रोमियों 13: 6 में पौलुस, सरकार की भूमिका के बारे में इस तरह बात करता है: ‘‘इसलिये कर भी दो, क्योंकि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और सदा इसी काम में लगे {अर्पित} रहते हैं।’’ अर्थात्, वे परमेश्वर के द्वारा न केवल एक कार्य के लिए नियुक्त किये गए हैं, अपितु वे स्वयँ को इसमें दे रहे हैं।

इस शब्द के बारे में जो बात ध्यान देने योग्य है वो ये कि नया नियम के इसके दस में से पाँच उपयोग, प्रार्थना पर लागू होते हैं। सुनिये, रोमियों 12: 12 के अतिरिक्त हैं:

  • प्रेरित 1: 14 (यीशु के स्वर्गारोहण के पश्चात् जबकि चेले यरूशलेम में पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे), ‘‘ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाईयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहे।’’

  • प्रेरित 2: 42 (यरूशलेम में आरम्भ में मसीही बने लोग), ‘‘वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन {अर्पित} रहे।’’

  • प्रेरित 6: 4 (प्रेरितगण कहते हैं), ‘‘परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे {अर्पित} रहेंगे।’’

  • कुलुस्सियों 4: 2 (पौलुस हम सभी से कहता है), प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो, और धन्यवाद के साथ उस में जागृत रहो।’’

अतः नया नियम के धर्म-शास्त्र लेखों से हम कह सकते हैं कि सामान्य मसीही जीवन, एक ऐसा जीवन है जो प्रार्थना में अर्पित है। अतः जब आप 2002 से 2003 में मुड़ते हैं, आपको पूछना चाहिए, ‘‘क्या में प्रार्थना में अर्पित हूँ ?’’

इसका ये अर्थ नहीं कि वो सब जो आप करते हैं प्रार्थना है - एक पत्नी के प्रति अर्पित रहने का अर्थ इससे बढ़कर है कि जो कुछ भी पति करता है ये कि अपनी पत्नी से लिपटा रहे। अपितु उसके प्रति उसका अर्पण, उस पति के जीवन में सब कुछ को प्रभावित करता है और उसे बाध्य करता है कि स्वयँ को उसे (पत्नी को) विभिन्न तरीकों से दे दे। अतः प्रार्थना में अर्पित रहने का ये अर्थ नहीं कि सब जो आप करें वो है, प्रार्थना (यद्यपि पौलुस दूसरे स्थल पर यही कहता है, ‘‘निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,’’ 1 थिस्सलुनीकियों 5: 17)। इसका अर्थ है कि प्रार्थना करने का एक बनावट या ढाँचा होगा जो प्रार्थना में अर्पित प्रतीत होता हो। यह हर एक के लिए समान नहीं होगा। लेकिन ये कुछ अर्थपूर्ण होगा। प्रार्थना के प्रति अर्पित रहना, प्रार्थना के प्रति अर्पित न रहने से भिन्न दिखाई देता है। और परमेश्वर ये अन्तर जानता है। ‘वह’ हमें लेखा देने के लिए बुलायेगा: क्या हम प्रार्थना में अर्पित रहे हैं ? क्या आपके जीवन में प्रार्थना करने का ऐसा नमूना है जिसे सच्चाई से ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ कहा जा सकता है ?

मैं सोचता हूँ कि हम से अधिकतर लोग, कुछ ऐसे प्रकारों की प्रार्थनाएँ करने, जिसे ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं कहा जावेगा, पर सहमत होंगे। जैसे ही संकट आपकी जिन्दगी में प्रवेश करें तब प्रार्थना करना, प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने का नमूना नहीं होगा। केवल भोजन के समयों पर प्रार्थना करना एक प्रतिरूप है, लेकिन क्या यह पौलुस द्वारा ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो’’ के कलीसिया को प्रोत्साहन से मेल खाती है। दिन के अन्त में एक संक्षिप्त प्रार्थना, ‘‘अब मैं सोने के लिए स्वयँ को डाल देता हूँ,’’ सम्भवतः ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं है। जबकि आपको पार्किंग की जगह चाहिए, कार के अन्दर ‘‘प्रभु मेरी सहायता कीजिये’’ प्रयास करना और असफल होना, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं है। वे सभी अच्छी हैं। लेकिन मैं सोचता हूँ कि हम सहमत होंगे कि मसीह के अनुयायियों से पौलुस कुछ और अधिक तथा भिन्न की अपेक्षा करता है जब वह कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’

इस सब में हम ये न भूलें, जैसा कि हमने विगत सप्ताह देखा, कि मसीह का क्रूस - पापियों के स्थान में उसकी मृत्यु - सभी प्रार्थना की नींव है। क्यों या कैसे हम प्रार्थना करें का, कोई स्वीकार्य उत्तर नहीं होगा, यदि मसीह हमारे स्थान पर न मरा होता। इसीलिए हम ‘‘यीशु के नाम में’’ प्रार्थना करते हैं।

जब मैंने प्रार्थना की बाधाओं को तौला, ताकि मैं उन्हें सम्बोधित कर सकूँ, तो उनमें से कुछ इस प्रश्न के अन्तर्गत आते हैं, ‘‘क्यों प्रार्थना करें ? और उनमें से कुछ इस प्रश्न के अन्तर्गत आते हैं, ‘‘कैसे प्रार्थना करें। आज प्रातः मैं कैसे पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ। ये बात नहीं है कि प्रश्न क्यों महत्वहीन है, किन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें हमारे सभी धर्मशास्त्रीय उत्तर यथोचित मिल सकते हैं कि क्यों प्रार्थना करें और फिर भी हम प्रार्थना के जीवन में असावधान व लापरवाह हो सकते हैं। अतः मैं प्रश्न क्यों का एक संक्षिप्त उत्तर दूंगा, और फिर व्यावहारिक कैसे प्रश्नों पर ध्यान केन्द्रित करूंगा, जो, मैं प्रार्थना करता हूँ कि 2003 में आपको ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ के नये स्तरों का जोखि़म उठाने को उकसायेगा।

प्रार्थना क्यों करें ?

मैं तीन संक्षिप्त उतरों से आरम्भ करता हूँ कि हमें क्यों ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ चाहिये।

  1. बाइबिल हमें प्रार्थना करने के लिए कहती है और जो परमेश्वर कहता है, हमें करना चाहिए। कई अन्य मूल-पाठों के साथ ये मूल-पाठ कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ यदि हम अर्पित नहीं हैं, तो हम शास्त्रलेखों के प्रति अनाज्ञाकारी हैं। ये मूर्खतापूर्ण व ख़तरनाक है। यदि आपके लिए प्रार्थना करना सरल नहीं है, स्वयँ को हम शेष के साथ, सामान्यतः पाप में गिरा हुआ और पापमय समझें। तब लडि़ये। स्वयँ को उपदेश दीजिये। आपके पापों व दुर्बलताओं व सांसारिक झुकावों को आपके ऊपर शासन मत करने दीजिये। परमेश्वर कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो,’’ इसके लिए लडि़ये।

  2. आपके अपने जीवन में, और आपके परिवार में, और इस चर्च व अन्य चर्चों में, और संसार में प्रचार के निमित्त, और हमारी संस्कृति में कुल मिलाकर आवश्यकताएँ विशाल व निराशाजनक हैं। अनेकों मामलों में स्वर्ग और नरक तराजू में झूलते हैं, विश्वास या अविश्वास, जीवन व मृत्यु। रोमियों 9:2 में, अपने नाश होते रिश्तेदारों के लिए पौलुस का शोक और मनोव्यथा स्मरण कीजिये, और याद कीजिये कि रोमियों 10:1 में वह उनके लिए ईमानदारी से प्रार्थना करता है, ‘‘हे भाइयो, मेरे मन की अभिलाषा और उन के लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएं।’’ जब हम प्रार्थना करते हैं, उद्धार तराजू में झूलता है। प्रार्थना क्या है आप तब तक नहीं जानेंगे जब तक कि आप ये न जान लें कि जीवन युद्ध है। प्रार्थना करने में एक सबसे बड़ा अवरोध ये है कि हम में से अनेकों के लिए जीवन कुछ अधिक ही दिनचर्या के रूप से सरल है। युद्ध-भूमि वहाँ बाहर है, किन्तु यहाँ मेरे शांति व सन्तुष्टि के नन्हे बुलबुले में सब ठीक है। ओह काश कि परमेश्वर हमारी आँखों को खोले कि हम अपने चारों ओर की आवश्यकताओं को, और प्रार्थना की अन्तःशक्ति को, देखें और महसूस करें।

  3. प्रार्थना करने का तीसरा कारण है कि जब हम प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर कार्य करता है। और परमेश्वर पाँच सैकेण्ड में उससे अधिक कर सकता है जो हम पाँच सालों में कर सकते हैं। ओह कैसे मैंने सालों-साल में ये सीखा है। संदेश की तैयारी के दौरान, या परामर्श के कुछ संकट के दौरान, या गवाही के कुछ वार्तालाप, या योजना बनाने की सभा में, अपने सिर को बार-बार झुकाना और परमेश्वर से याचना करना कितनी अद्भुत चीज है, और सफलता के बाद सफलता पाना जो तब तक नहीं आयी जब तक कि मैंने प्रार्थना नहीं की। कितना महत्वपूर्ण पाठ है कि तुरन्त काम में लग जाने के लिए चिड़चिड़ाना व अधीर महसूस करना क्योंकि मेरे पास इतना कुछ है करने के लिए कि मैं नहीं जानता कि इसे कैसे पूरा कर सकूंगा, लेकिन स्वयँ को बाइबिल-शास्त्रीय तथा विवेकी होने के लिए जोर देना और इससे पूर्व कि मैं काम करूँ, समय निकाल कर प्रार्थना करने के लिए अपने घुटनों पर जाना, और जबकि मैं अपने घुटनों पर हूँ, मेरे दिमाग में विचारों का लुड़कते हुए आना कि एक समस्या का सामना कैसे करूँ, या एक संदेश को आकार कैसे दूँ, या एक संकट से कैसे निपटें, या एक धर्मशास्त्रीय समस्या का समाधान करूँ - और इस तरह पाँच सैकेण्ड में क्या प्रकाशन मिला इसे समझने का प्रयास करते हुए अपने घण्टों-ब-घण्टों का काम और दीवाल पर अपना सिर मारने की हताशा से बचूँ ! मेरा ये अर्थ नहीं है कि परमेश्वर हमें कठिन काम से बचाता है। मेरा अर्थ है कि तुलना में जितना आप इसे अकेले करते, प्रार्थना आपके काम को 5,000 गुना अधिक फलदायी बना सकता है।

और भी हैं, लेकिन क्यों प्रार्थना करें के ये तीन उत्तर हैं: 1) परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि प्रार्थना करें; 2) आवश्यकताएँ विराट हैं, और सनातन की चीजें दाँव पर हैं; 3) जब हम प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर कार्य करता है और जो हम घण्टों या सप्ताहों या कभी-कभी सालों में करते, वो परमेश्वर बहुधा सैकेण्डों में उससे भी अधिक करता है।

प्रार्थना के बारे में उत्तर दिये जाने के लिए, कई अन्य प्रष्न हैं जिन्हें मैं यहाँ नहीं ले सकता। इसी कारण ‘डिज़ायरिंग गॉड’ और ‘द प्लैज़र्स ऑफ गॉड’ और ‘लैट द नेशन्स बी ग्लैड’ में प्रार्थना के ऊपर लम्बे अध्याय हैं और इसी कारण एक पूरी पुस्तक है जिसका नाम ‘ए हंगर फॉर गॉड’ है: डिज़ायरिंग गॉड थ्रू प्रेयर एण्ड फास्टिंग। विशेष रूप से यदि आप इस बारे में परेशान हैं कि लोगों के उद्धार के लिए प्रार्थना, कैसे बिनाशर्त चुनाव के साथ मेल खाती है, तो सीधे 217-220 पृष्ठों पर जाइये अथवा ‘द प्लैज़र्स ऑफ गॉड’।

प्रार्थना कैसे करें

लेकिन आज प्रातः के हमारे शेष समय के लिए मैं प्रार्थना के कैसे के विषय में बात करना चाहता हूँ। मैं आपको व्यावहारिक, बाइबिल-शास्त्रीय सम्भावनाओं के द्वारा प्रेरणा देने का प्रयास करना चाहता हूँ जिनका आपने कभी भी विचार नहीं किया होगा, या शायद प्रयास किया हो और फिर दृढ़ रहने में असफल हो गये होंगे - ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो’’ में असफल।

एक संकीर्ण मेरा-तरीका-या-उच्च-मानसिकता का तरीका के बिना, ये मेरा प्रयास है कि चित्रण कर सकूं कि प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने का क्या अर्थ है। हम सब बहुत भिन्न हैं। हमारी दिनचर्या भिन्न हैं। हमारे परिवार भिन्न हैं। हमारे आज के दिनों की विभिन्न मांगों के साथ हम जिन्दगी के विभिन्न चरणों में हैं। हम आत्मिक परिपक्वता के विभिन्न स्तरों पर हैं, और कोई भी रातों-रात परिपक्व नहीं होता। प्रार्थना के प्रति आपके अर्पित रहने में आप जो विगत पाँच वर्षों से कर रहे होंगे, वो आपको पीछे देखने को विवश कर सकता है कि आप अचरज करें कि आप क्षीणता के इस मौसम में कैसे बने रहे। लेकिन हम सब आगे बढ़ सकते हैं। पौलुस अपनी कलीसियाओं को लिखना पसन्द करता है और कहता है, ‘‘तुम अच्छा कर रहे हो, किन्तु ऐसा ही और अधिक व अधिक करते जाओ’’ (फिलिप्पियों 1:9; 1थिस्सलुनिकियों 4:1, 10)। और यदि और कोई स्थल है जहाँ ‘‘ऐसा ही और भी अधिक करते रहो’’ लागू होता है, ये है प्रार्थना के प्रति हमारे अर्पण में।

मैं ये व्यावहारिक सुझाव पाँच जोड़ों में रखूंगा, जिनमें से प्रत्येक एक भिन्न अंग्रेजी अक्षर से आरम्भ होता है, जो मिलकर ‘‘फेड्स (एफ ए डी ई एस)’’ की हिज्जे देगा। इस ‘‘फेड्स’’ शब्द का कोई अभिप्राय नहीं है। इनसे मात्र इसे ये हिज्जे बन जाता है। किन्तु यदि आप इस पर बल देना चाहते हैं, तो आप कह सकते हैं कि बिना इन जोड़ों के प्रार्थना के प्रति अर्पण ‘‘फेड’’ (धूमिल) हो जाता है।

एफ – (फ्री एण्ड फॉर्मड्) स्वच्छन्द व गढ़ी हुई

मेरे दिमाग में यहाँ संरचित व असंरचित प्रार्थना के बीच अन्तर है। प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो का अर्थ होगा कि आप अपनी प्रार्थना के समयों में जो कहते हैं वो बहुधा स्वतंत्र और असंरचित होगा, और बहुधा गढ़ा हुआ व संरचित होगा। यदि आप अपनी प्रार्थनाओं में केवल स्वच्छन्द हैं, सम्भवतः आप उथले और घिसे-पिटे बन जायेंगे। यदि आप अपनी प्रार्थना में केवल संरचित हैं, आप सम्भवतः यांत्रिक और खोखले बन जायेंगे। प्रार्थना करने के दोनों तरीके महत्वपूर्ण हैं। दोनों में से कोई एक-अथवा नहीं, अपितु दोनों-और।

स्वच्छन्द से मेरा अर्थ है कि आप नियमित रूप से अपनी आत्मा परमेश्वर के समक्ष उण्डेलना चाहेंगे और आप ऐसा करेंगे। आप कोई लिखित कथन या दिशा-निर्देश या सूचियाँ या पुस्तकें नहीं चाहेंगे। आपकी इतनी सारी आवश्यकताएँ होंगी कि वे स्वच्छन्द रूप से बिना किसी पूर्व-निर्धारित रूप में लुड़कती चली आती हैं। ये अच्छा है। इसके बिना ये संदेहास्पद है कि मसीह के साथ हमारा कोई सच्चा सम्बन्ध भी है। क्या आप वास्तव में एक विवाह या मित्रता की कल्पना कर सकते हैं जहाँ सभी वार्तालाप सूची या पुस्तकों से पढ़ा जाता है या केवल रटे-रटाये शब्दों में कहा जाता है। ये चरम बनावटी होगा।

दूसरी ओर, मैं आपसे याचना करता हूँ कि ये न सोचें कि आप आत्मिक रूप से इतने गहरे या उपायकुशल या समृद्ध या अनुशासित हैं कि आप बिना रचनाओं की सहायता के कर सकते हैं। मेरे दिमाग में चार प्रकार की रचनाएँ हैं जो मैं आशा करता हूँ कि आप सभी उपयोग करते हैं।

रचना-1. बाइबिल। बाइबिल प्रार्थना कीजिये। बाइबिल-शास्त्रीय प्रार्थना कीजिये। इस सप्ताह हम हमारी प्रार्थनाओं को इफिसियों 3: 14-19 में दी गई प्रार्थना के चारों ओर निर्मित कर रहे हैं।

मैं इसी कारण उस पिता के साम्हने घुटने टेकता हूं, 15 जिस से स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है । 16 कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे, कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ पाकर बलवन्त होते जाओ। 17 और विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नेव डाल कर। 18 सब पवित्र लोगों के साथ भली भांति समझने की शक्ति पाओ ; कि उसकी चैड़ाई, और लम्बाई, और ऊंचाई, और गहराई कितनी है। 19 और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है, कि तुम परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ।

इसे कण्ठस्थ कर लीजिये और अक्सर इसे प्रार्थना कीजिये। प्रभु की प्रार्थना कीजिये और जब आप इसे प्रार्थना करते हैं, प्रत्येक वाक्यांश को अपने शब्दों में रखिये और उन लोगों पर लागू कीजिये जिनके बारे में आपको बोझ है। बाइबिल की आज्ञाओं को प्रार्थना कीजिये: ‘‘ओ परमेश्वर, आपको, मेरे सारे मन और मेरे सारे प्राण और मेरी सारी बुद्धि के साथ प्रेम करने के लिए मेरी सहायता कीजिये, मेरी पत्नी की, मेरे बच्चों की, अध्यक्षों की, हमारे धर्म-प्रचारकों/सुसमाचार-प्रचारकों की सहायता कीजिये।’’ बाइबिल की प्रतिज्ञाओं को प्रार्थना कीजिये: ‘‘हे प्रभु, स्वर्ग में और पृथ्वी पर सारा अधिकार जो आपका है, उसे लीजिये और हमारे धर्म/सुसमाचार-प्रचारकों को उस प्रतिज्ञा की मिठास का बोध होने दीजिये कि आप उनके संग जगत के अन्त तक रहेंगे।’’ बाइबिल की चेतावनियों को प्रार्थना कीजिये: ‘‘ओ प्रभु, उस अत्यावश्यकता के प्रकार के साथ मुझे कुदृष्टि से लड़ने की सामर्थ दीजिये जो आपने सिखाया, जब आपने कहा, अपनी आंख निकाल कर फेंक दे और स्वर्ग में प्रवेश कर, बनिस्बत कि इसे भला-चंगा रहने दे और नरक में जाये।’’ अपने सम्मुख बाइबिल खोलिये और एक कोहनी एक ओर और एक दूसरी ओर टेकिये और प्रत्येक पैराग्राफ/अनुच्छेद को पश्चाताप् में या स्तुति में या धन्यवाद में या बिनती में, प्रार्थना कीजिये।

रचना-2. सूचियाँ। सूचियों को लेकर प्रार्थना कीजिये। मेरे दिमाग में लोगों की सूचियाँ हैं जिनके लिए प्रार्थना करना है और आवश्यकताओं की सूचियाँ हैं जिनके बारे में प्रार्थना करना है। यदि आप सभी लोगों को और आवश्यकताओं को याद रख सकते हैं, आपको बिना सूची के प्रार्थना करना चाहिए, आप परमेश्वर हैं। मेरे पास अवश्य ही सूचियाँ होना चाहिए, कुछ मेरे सिर में और कुछ कागज पर। मैंने लगभग 70 लोगों को कण्ठस्थ कर लिया है जिनके लिए मैं नाम लेकर प्रतिदिन प्रार्थना करता हूँ। लेकिन उसमें उन लोगों की सूची सम्मिलित नहीं है जो पुरोहिताश्रम में मिशन्स में आये थे, जिनके लिए मैं और ‘नोएल’ हर रात्रि एक लिखित सूची से प्रार्थना करते हैं। इसमें हमारे धर्म/सुसमाचार-प्रचारकों की सूची सम्मिलित नहीं है जो मैं एक सूची में से पढ़ता हूँ। और ये तो मात्र लोग हैं, उनकी आवश्यकताओं का कोई उल्लेख नहीं जो मेरे अपने प्राण में और मेरे परिवार में और चर्च में और संसार में सप्ताह-ब-सप्ताह बदल जाती हैं। अतः मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि लोगों की सूचियों और आवश्यकताओं की सूचियों का उपयोग करें। किसी प्रकार की प्रार्थना पुस्तिका या नोटबुक या अपने हाथ के छोटे कम्प्यूटर में फाइलें रखिये। याद रखिये, मैं इस जोड़े: स्वच्छन्द व गढ़ी हुई के मात्र द्वितीय-अर्द्ध के बारे में बात कर रहा हूँ। स्वच्छन्दता का मूल्य मत भूलिये। ये दोनों-और, है, दोनों में से एक-अथवा, नहीं।

रचना-3. पुस्तकें। पुस्तकें जैसे कि ‘ऑपरेशन वल्र्ड’ से, प्रतिदिन या दो दिन में, एक भिन्न देश के लिए और इसमें मसीह के आन्दोलन के लिए प्रार्थना कीजिये। भूमण्डल-आकार का हृदय और परमेश्वर की सर्वोच्चता का दर्शन पाने का कितना ताकतवर तरीका है ! ‘एक्सट्रीम डिवोशन’ जैसी पुस्तक से प्रार्थना कीजिये - वर्ष के हर एक दिन के लिए दुःख उठाती, सतायी जाती कलीसिया के लिए। मेरी पुस्तक लीजिये, ‘लैट द नेशन्स बी ग्लैड’, और पृष्ठ 57-62 पलटिये ओर उन 36 चीजों से प्रार्थना कीजिये जो आरम्भिक कलीसिया ने एक-दूसरे के लिए प्रार्थना किया। ‘वैली ऑफ विज़न्स’ लीजिये, प्यूरिटन की प्रार्थनाओं की एक पुस्तक, और वो प्रार्थना कीजिये जो भूतकाल के महान् सन्तों ने प्रार्थना की है। हम ये सोचने में इतने मूर्ख हैं कि ये हम पर छोड़ दिया गया है कि वो सब जो बाइबिल कहती है और सभी आवश्यकताएँ जिनके लिए प्रार्थना करना है, बिना अच्छी पुस्तकों की सहायता के, हम देख लेंगे।

रचना-4. रूपरेखा। प्रार्थना की रूपरेखा या ढाँचा विकसित कीजिये कि जब आप अपने घुटनों पर आते हैं वे आपको कुछ मार्गदर्शन दें कि पहिला और दूसरा और तीसरा क्या करें। एक नमूना रहेगा, जैसा कि मैं पहिले कह चुका हूँ, प्रभु की प्रार्थना के प्रत्येक निवेदन के चारों ओर अपनी प्रार्थना को संरचित करें। एक नमूना जिसका मैं यर्थाथ में प्रतिदिन उपयोग करता हूँ, वो नमूना है, संकेन्द्रित परिक्रमाएँ, मेरे अपने प्राण से आरम्भ करके - जो मैं अनुभूति करता हूँ कि पाप है और सर्वाधिक प्रखर आवश्यकताएँ - अपने परिवार की ओर बढ़ते हुए, और फिर पासवान्-स्टाफ तथा अध्यक्षगण, फिर सम्पूर्ण चर्च-स्टाफ, फिर हमारे धर्म-प्रचारक, और फिर मसीह की विस्तृत देह में सामान्य आवश्यकताएँ और मिशनों व संस्कृति में मसीह का आन्दोलन। इस प्रकार के बिना किसी रचना या ढाँचे के मैं ठंडा पड़ने और दिशाहीन होने लगता हूँ।

अतः पहिला जोड़ा है स्वच्छन्द व गढ़ी हुई। स्वतंत्र प्रवाह के साथ आवश्यकताओं व धन्यवाद व स्तुति के द्वारा असंरचित ; और बाइबिल, सूचियों, पुस्तकों व रूपरेखाओं के द्वारा संरचित। यदि आप ‘‘प्रार्थना में अर्पित’’ हैं, आप अपने प्रार्थना के जीवन में स्वच्छन्द व गढ़ी हुई का अनुसरण करेंगे।

ए - (अलोन एण्ड असेम्बिल्ड) अकेले और एकत्र

प्रार्थना में अर्पित का अर्थ होगा कि आप नियमित रूप से अकेले प्रार्थना करेंगे और नियमित रूप से अन्य मसीहियों की सभा में प्रार्थना करेंगे।

ओह, ये कितना महत्वपूर्ण है कि हम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से अकेले मिलते हैं। यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर में एक व्यक्तिगत भरोसे और संगति के बिना कोई मसीहियत है ही नहीं। इसके सिवाय सब दिखावा और भूसी और आडम्बर है। अपने 16 बच्चों के साथ ‘सुसाना वेस्ली’, रसोई में अपना एप्रन/आँचल सिर के ऊपर ले लिया करती थी और सभी बच्चों ने ये सीख लिया था कि इसका अर्थ है रसोई में शान्ति। बच्चों को ये सीखने की आवश्यकता है कि मम्मी और डैडी, यीशु के साथ समय बिताते हैं जो पवित्र हैं और उन्हें बाधा नहीं पहुँचाना है। स्थान खोजिये, समय को योजित कीजिये, बच्चों को अनुशासन सिखाइये।

लेकिन मैं सोचता हूँ कि अन्य विश्वासियों की सभा में प्रार्थना करना, अकेले प्रार्थना करने से, अधिक अनदेखा किया जाता है। अकेले और एकत्र। नया नियम, सामूहिक प्रार्थना के लिए एकत्र होने से, भरा पड़ा है। वास्तव में नया नियम में अधिकांश प्रार्थना, सम्भवतः प्रार्थना के लिए एकत्र होने के सम्बन्ध में विचारित की गई हैं। प्रेरित 1:14, ‘‘ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाइयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहे’’ - ये एक नमूना है जो आप पाते हैं। प्रेरित 12:12, जब पतरस बन्दीगृह से बाहर आया, ‘‘वह उस यूहन्ना की माता मरियम के घर आया, जो मरकुस कहलाता है ; वहां बहुत लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना कर रहे थे।’’ आरम्भिक कलीसिया में प्रार्थना सभाएँ स्वाभाविक और मैं सोचता हूँ नियामक थीं।

नया नियम में, प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने में, निश्चित ही परमेश्वर के लोगों के साथ प्रार्थना करना सम्मिलित था। आप इसमें कैसे हैं ? ये उन्नत मसीहियत नहीं है। ये बुनियादी मसीहियत है। इस सप्ताह हमने बारह 30-मिनिट की प्रार्थना की योजना की है, साथ ही शुक्रवार की पूरी रात्रि में आठ घण्टों की प्रार्थना। विकल्प इसलिए हैं कि एक नये भेदन बनाने में आपकी सहायता हो। शेष वर्ष के दौरान, प्रत्येक सप्ताह, छः सुबह, 30-मिनिट की प्रार्थना सभाएँ हैं। बुद्धवार की संध्या 5: 45 पर, शहर के मुख्य स्थल पर। फिर छोटे समूह हैं जो प्रार्थना और सेवकाई के लिए इकट्ठे होते हैं। फिर रविवार की सुबह है जिसमें गीत में व अन्य प्रकारों से प्रार्थना सम्मिलित है। यदि प्रार्थना के लिए एकत्र होना, प्रार्थना के लिए आपके अर्पित होने का हिस्सा नहीं है, 2003 को एक भेदन का वर्ष बनाइये। दोनों-और: स्वच्छन्द व गढ़ी हुई, अकेले व एकत्र।

ड - (डेस्परेट एण्ड डिलाइटेड) निराश व प्रसन्न

प्रार्थना में अर्पित रहने का अर्थ होगा कि आप प्रार्थना में परमेश्वर के पास, बहुधा निराशा से भरे और बहुधा प्रसन्न आते हैं।

मेरा मात्र ये अर्थ है कि प्रार्थना, आपकी गहरी मनोव्यथाओं और भय के साथ परमेश्वर से मिलने का एक स्थान है, और प्रार्थना, आपके उच्चतम आनन्दों तथा धन्यवादों के साथ परमेश्वर से मिलने का एक स्थान है। जब आप प्रतिदिन ‘पिता’ के समक्ष घुटने टेकते हैं, वो तकिया जिसे आप अपनी कुहनियों को टेकने के लिए उपयोग करते हैं, आँसुओं से दाग़दार तकिया होगी। और फिर भी, चूंकि परमेश्वर, एक प्रार्थना-सुननेवाला परमेश्वर है, आप प्रेरित पौलुस के साथ कहेंगे, ‘‘शोक करनेवाले के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं (2 कुरिन्थियों 6: 10)। और बहुधा वो आनन्द, इस पतित संसार के बोझों को दबा देगा - जैसा कि इसे करना चाहिए - और आपको आनन्द से उछलने को प्रेरित करेगा। ‘पिता’ आपसे उन समयों में भी मिलना चाहता है। निराशा की दशा में और आनन्द की दशा में - उपवास में और भोज में, प्रार्थना में अर्पित रहिये। दोनों में से एक-अथवा नहीं, अपितु दोनों-और।

ई - (एक्सप्लोसिव एण्ड एक्सटेन्डेड) विस्फोटक और विस्तृत

मेरा कुल अर्थ है, संक्षिप्त और लम्बा। मैं संक्षिप्त और लम्बा कह सकता था, किन्तु अक्षर मेल नहीं खाते और परिवर्णी शब्द कुछ भी हिज्जे नहीं करते। इसके अलावा विस्फोटक शब्द, अधिक स्पष्ट है और ठीक वो है जो समय-समय पर प्रार्थना हो सकती है। यदि आप प्रार्थना में अर्पित हैं, आप नियमित रूप से स्तुति और धन्यवाद और आवश्यकताओं की प्रार्थनाओं के साथ विस्फोट करेंगें और वे कुछ सैकेण्डों से अधिक बने नहीं रहेंगे। और यदि आप प्रार्थना के लिए अर्पित हैं, ऐसे समय होंगे जब आप प्रभु के साथ प्रार्थना में एक लम्बे समय तक लगे रहते हैं। कभी-कभी मैं ‘नोएल’ को एक संक्षिप्त फोन करता हूँ और अन्य समयों पर हम एक संध्या साथ बिताते हैं। यदि आप मसीह से प्रेम करते हैं और सब चीजों के लिए ‘उस’ पर टिकाव लेते हैं और सभी चीजों से ऊपर ‘उसे’ संजोते हैं, आप ‘उसके’ साथ बहुधा विस्फोटक प्रार्थनाओं के साथ और बहुधा विस्तृत प्रार्थनाओं के साथ मिलेंगे।

एस - (स्पॉन्टेनियस एण्ड शेड्यूल्ड) स्वेच्छित और निर्धारित

इसमें और ‘‘स्वच्छन्द व गढ़ी हुई’’ में अथवा ‘‘विस्फोटक और विस्तृत’’ में क्या अन्तर है ? ‘‘स्वच्छन्द व गढ़ी हुई’’ के द्वारा मेरा तात्पर्य था, हमारी प्रार्थनाओं की विषय-वस्तु - जब हम प्रार्थना के लिए आते हैं, हम क्या करते हैं। ‘‘विस्फोटक और विस्तृत’’ के द्वारा मेरा तात्पर्य था, हमारी प्रार्थनाओं की लम्बाई। स्वेच्छित और निर्धारित से मेरा तात्पर्य है, हम कब प्रार्थना करते हैं।

यदि हम प्रार्थना में अर्पित हैं, हम पूरे दिन के दौरान स्वेच्छा से प्रार्थना करेंगे - निरन्तर, जैसा कि पौलुस कहता है – मसीह के साथ एक निरन्तर संगति की भावना, पवित्र-आत्मा के द्वारा चलते हुए और अपने जीवन में ‘उसे’ एक निरन्तर व्यक्तिगत उपस्थिति के रूप में जानते हुए। जब आप ‘उससे’ बातें करते हैं तब कोई योजना नियंत्रित नहीं करेगी। दिन भर में यह दर्जनों बार होगा। ये सामान्य व अच्छा है। ये है प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना।

लेकिन यदि आपके पास मात्र ये है, ये आपके पास बहुत देर तक नहीं रहेगा। स्वेच्छितता का सच्चा रस से भरा फल, उस बगीचे में विकसित होता है जिसकी, निर्धारण के अनुशासन द्वारा भलिभांति देखभाल की जाती है। अतः मैं आपसे याचना करता हूँ, प्रार्थना के अपने समय निर्धारित कीजिये। 2003 के लिए इसकी योजना बनाइये। आप कब ‘उससे’ नियमित रूप से मिलेंगे ? कितनी देर तक आप ठहरेंगे ? मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि प्रतिदिन का आरम्भ इस तरह करें। क्या आप तैयार हैं कि एक दिन या दो आधे-दिवस या दिवसों की योजना बनायें कि आप स्वयँ या एक मित्र के साथ या अपने पति/पत्नी के साथ अलग रहेंगे - एक पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं अपितु 4 घण्टे या आठ घण्टे प्रार्थना करने के लिए ? कैसे ? मात्र अपनी बाइबिल पढ़ने और इसे पूरी प्रार्थना में बदल देने के द्वारा। बाइबिल की एक छोटी पुस्तक लेने और एक अध्याय पढ़ने और फिर ठहरकर उस अध्याय को हमारे परिवार तथा चर्च में प्रार्थना करने के द्वारा, ‘नोएल’ और मेरे पास, हमारे कुछ सबसे समृद्ध दिन रहे हैं। इसके बाद एक और अध्याय पढ़ना और प्रार्थना करना, और इसी प्रकार करते रहना। लेकिन ये अपने आप नहीं होता। इसे सुनियोजित किया जाना आवश्यक है। ये स्वेच्छित नहीं है। ये संरचित है। और ये महिमापूर्ण है।

सो अब आप समझ गये। आज हमारे लिए परमेश्वर का वचन है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ इसमें स्थिर रहिये। इसमें ईमानदार रहिये। क्यों ? क्योंकि परमेश्वर हमें ऐसा करने की आज्ञा देता है ; आवश्यकताएँ विराट हैं और सनातनकाल तराजू में झूल रहा है ; और इसलिए कि परमेश्वर सुनता और पाँच सैकेण्ड में उससे अधिक करता है जो हम पाँच सालों में कर सकते हैं।

और हम प्रार्थना में कैसे अर्पित रहें ? ये चीजें। बिना उनके प्रार्थना (फेड) धूमिल पड़ जाती है। आपकी प्रार्थना हो …

एफ – (फ्री एण्ड फॉर्मड्) स्वच्छन्द व गढ़ी हुई
ए – (अलोन एण्ड असेम्बल्ड) अकेले और एकत्र
ड – (डेस्परेट एण्ड डिलाइटेड) निराश व प्रसन्न
ई – (एक्सप्लोसिव एण्ड एक्सटेन्डेड) विस्फोटक और विस्तृत
एस – (स्पॉन्टेनियस एण्ड शेड्यूल्ड) स्वेच्छित और निर्धारित

प्रभु आपको प्रार्थना के इस सप्ताह में और सारे वर्ष भर में, अनुग्रह और बिनती का आत्मा दे।