दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: एक महत्वपूर्ण और सनातन महिमा के लिए


परन्तु हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे। हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते ; निरुपाय तो होते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते ; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते। हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं ; कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो। क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो। सो मृत्यु तो हम पर प्रभाव डालती है और जीवन तुम पर। और इसलिये कि हम में वही विश्वास की आत्मा है, (जिस के विषय में लिखा है, कि मैं ने विश्वास किया, इसलिये मैं बोला) सो हम भी विश्वास करते हैं, इसीलिये बोलते हैं। क्योंकि हम जानते हैं, कि जिस ने प्रभु यीशु को जिलाया, वही हमें भी यीशु में भागी जानकर जिलाएगा, और तुम्हारे साथ अपने साम्हने उपस्थित करेगा। क्योंकि सब वस्तुएं तुम्हारे लिये हैं, ताकि अनुग्रह बहुतों के द्वारा अधिक होकर परमेश्वर की महिमा के लिये धन्यवाद भी बढ़ाए। इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है। क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं।

पद 16 कुछ ऐसा अभिव्यक्त करता है जिसे आज सुबह यहाँ उपस्थित प्रत्येक जन अनुभव करना चाहता है। पौलुस कहता है, ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ यहाँ कुछ ऐसा है जो कोई नहीं चाहता और कुछ ऐसा है जो हर कोई चाहता है।

क्या है जो कोई नहीं चाहता और क्या हर कोई चाहता है

आज सुबह यहाँ उपस्थित कोई भी हियाव छोड़ना नहीं चाहता। कोई भी यहाँ ऐसा कहते हुए नहीं आया, ‘‘मैं निश्चित ही आशा करता हूँ कि हम कुछ गीत गायें और एक उपदेश सुनें जो हियाव छोड़ने में मेरी सहायता करे। ‘जॉन’ जो कहता है, मैं आज सुबह वास्तव में उसके द्वारा हतोत्साहित होना चाहता हूँ।’’ आप में से एक भी नहीं। आप में से कोई भी जीने के लिए, निराशा से भरा हृदय नहीं चाहता। पौलुस भी नहीं चाहता था।

इसके विपरीत, हर कोई दिन-ब-दिन भीतरी नवीनीकरण चाहता है। हम सब जानते हैं कि ताकत का बोध और नवीनता और आशा और जीवन-शक्ति और साहस और जीवन का मज़ा, थोड़े ही समय टिकता है, और फिर वे अपक्षय होने की प्रवृत्ति रखते हैं। यदि हम भीतर से मजबूत होने जा रहे हैं और अपने अन्दर आशा और आनन्द और प्रेम करने के लिए स्रोत प्राप्त करने जा रहे हैं, हमें दिन-ब-दिन नवीनीकृत होने के लिए तैयार होना पड़ेगा। हम जानते हैं कि जिन्दगी स्थिर अथवा बिना उतार-चढ़ाव के नहीं है। ये ऊपर और नीचे और ऊपर है। ये भरना और खाली होना और पुनः भरना है। ये नया करो, खर्च करो, नया करो, और खर्च करो और नया करो, है। और हम से हर एक नवीनीकरण की ताकत चाहता है। कोई भी यहाँ नहीं चाहता कि रिक्तीकरण व निरर्थकता और हतोत्साहन की घाटी में छोड़ दिया जावे। यदि दिन-ब-दिन और पुनः और पुनः और पुनः, मजबूत बना दिये जाने और आशापूर्ण और आनन्दमय और प्रेममय होने का कोई रहस्य है, तो उसमें हमारी रुचि है।

दो निर्णायक शब्द: ‘‘इसलिये’’ और ‘‘क्योंकि’’

जिसका अर्थ है कि इस मूल-पाठ में दो शब्द हैं जिस पर हमारा ध्यान जाना चाहिए। पद 16 के आरम्भ में शब्द ‘‘इसलिये’’ और पद 17 के आरम्भ में शब्द ‘‘क्योंकि।’’ वे इतने निर्णायक क्यों हैं ?

एक त्रिकोण के शीर्ष के रूप में पद 16

एक त्रिकोण के ऊपरी सिरे पर पद 16 को और इसे सहारा देते हुए, दो भुजाओं को चित्रित कीजिये। सो, वहाँ है हमारी लालसा, इन दो पंक्तियों के द्वारा सहारा पाये हुए: ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ यही हम सब आज सुबह चाहते हैं — ये कहने के योग्य हों और वास्तव में यही हमारा अर्थ हो।

पद 16: ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।

शीर्ष को सहारा देते हुए एक भुजा के रूप में, 7-15 आयतें

आयत के आरम्भ में शब्द ‘‘इसलिये’’ का अर्थ है कि पौलुस कुछ ऐसा कह रहा था जो उसे इस अनुभव तक ले आया और इसे सहारा दिया: ‘‘ये सच है और ये सच है और ये सच है’’, 7-15 आयतों में, ‘‘इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … इसलिये हम दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।’’ अतः त्रिकोण की प्रथम रेखा, 7-15 आयतों की सच्चाई है जो इस अनुभव तक ले जाती और इसे सहारा देती है। इसे हमारा ध्यान खींचना चाहिए और इन आयतों में ये खोजने के लिए भेजना चाहिए कि ये क्या है। हो सकता है ये हमारे लिए भी है !

शीर्ष को सहारा देते हुए, अन्य भुजा के रूप में, 17-18 आयतें

तब अगली आयत 17 के आरम्भ में शब्द ‘‘क्योंकि’’ का अर्थ है कि पौलुस कुछ ऐसी चीजें कहने वाला है जो पद 16 के कारण हैं। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … और दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।’’ क्योंकि, ये सच है और ये सच है और ये सच है। अतः त्रिकोण की दूसरी रेखा जो दूसरी ओर से नीचे आ रही है, पद 17-18 की सच्चाई है, जो उस अनुभव को सहारा देती है जिसका उसने अभी वर्णन किया है।

तो क्या अब आप इसे देख सकते हैं ? वो अनुभव जिसे पाने की हम लालसा करते हैं, वहाँ इस त्रिकोण के शीर्ष पर, दो सहारा देनेवाली भुजाओं के साथ बैठा हुआ है। 7-15 आयतें सच हैं, ‘‘इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जाते हैं।’’ ये एक भुजा है। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते, अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जाते हैं’’ क्योंकि 17-18 आयतें सच हैं।

अतः अब हमारा लक्ष्य है कि इस त्रिकोण की दो भुजाओं को देखें और उस सत्य को बनायें जिसने पौलुस को सहारा या बल प्रदान किया और वो सत्य जो हमें सहारा/बल प्रदान करता है।

आयत 16 दुःख उठाने के मध्य में आती है

किन्तु पहिले, एक संक्षिप्त अवलोकन: पद 16 ये स्वीकार करता है कि हियाव नहीं छोड़ना और दिन प्रतिदिन नया होते जाना, दुःख उठाने के मध्य में हो रहे हैं। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते, यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ पौलुस जानता था कि वह मर रहा है — और ये कि हर कोई मर रहा है। उसने भंयकर दुःख उठाने का अनुभव किया, और इसमें उसने उसके पृथ्वी पर के जीवन को नाश होते और क्षीण होते देखा। वहाँ दुर्बलताएँ और बीमारियाँ और चोटें और कठिनाईयाँ और दबाव और निराशा और विफलताएँ थीं। और उनमें से प्रत्येक के लिए उसने अपनी जिन्दगी के एक टुकड़े द्वारा कीमत चुकाई। इसे कहने का एक तरीका था कि ‘‘मृत्यु उसके अन्दर काम कर रही थी’’ (तुलना कीजिये, पद 12)।

यही संदर्भ था ये कहने के लिए, ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … हम सदा नया होते जाते हैं।’’ तब अब हम जो वास्तव में पूछ रहे हैं वो मात्र ये नहीं कि ‘‘मैं जीवन में कैसे हियाव नहीं छोड़ सकता ?’’ और ‘‘कैसे मैं दिन प्रतिदिन नया हो सकता हूँ ?’’ अपितु ‘‘मैं कैसे बिना हियाव छोड़े दुःख उठाने के लिए तैयार हो सकता हूँ ?’’ ‘‘मैं कैसे अपने शरीर का नाश होना और मेरे पृथ्वी पर के जीवन का क्षीण होना स्वीकार कर सकता हूँ और उसी समय हियाव न छोडूं, वरन् अपनी भीतरी ताकत को नवीनीकृत पाऊँ कि आनन्द सहित, प्रेम के कार्यों के साथ अन्त तक पहुंचूँ ?’’

अब हम इस प्रश्न के लिए पौलुस के उत्तर को देखने के लिए तैयार हैं। पहिले पद 7-15 में और फिर पद 17-18 में।

पद 7-15: हियाव न छोड़ने के चार कारण

7-15 आयतों में, कम से कम चार कारण हैं जो पौलुस को ये कहने तक ले जाते हैं, ‘‘इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते।’’ और उन में से प्रत्येक पृथ्वी पर के अपने जीवन के नाश होने का ध्यान रखते हैं। वह कभी भी इससे दृष्टि नहीं हटाता कि वह एक मरता हुआ मनुष्य है और ये कि उसकी जिन्दगी खर्च हो रही है। अतः इन आयतों में जो वह कर रहा है, यह दिखाना कि सच क्या है, बावजूद इसके और यहां तक इस कारण कि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा व घट रहा है।

1. परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का महिमित होना

प्रथम, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन, प्रगट व महिमित हो रहे हैं।

पद 7: ‘‘हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों {अर्थात् नाश होता हुआ, दुर्बल, बाहरी व्यक्तित्वों} में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ, हमारी दुर्बलता में प्रगट होती है।

पद 10: ‘‘हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं {बाहरी मनुष्यत्व के नाश होने का ये एक अन्य पहलू है} कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि हमारे प्रतिदिन के मरने में, परमेश्वर के पुत्र का जीवन उन्नत होता है।

पद 11: ‘‘क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि हमारे नाश होते शरीरों में परमेश्वर के पुत्र का जीवन प्रगट व महिमित होता है।

अतः, पहिला कारण कि पौलुस हियाव नहीं छोड़ता, जबकि उसका बाहरी स्वभाव नाश होता जाता है, ये कि उसकी दुर्बलता में और दूसरों की ख़तिर उसके प्रतिदिन मरने में, परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन महिमित होते हैं और यही है जिस से पौलुस किसी और चीज से बढ़कर प्रेम करता है।

2. कलीसिया का मजबूत होना

दूसरा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा, जीवन उसके अन्दर से कलीसिया में बह रहा है। पौलुस के दुर्बल होने के द्वारा, मसीहीगण मजबूत किये जा रहे हैं।

पद 12: ‘‘सो मृत्यु तो हम पर प्रभाव डालती है और जीवन तुम पर।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि न केवल परमेश्वर महिमा पा रहा है, परन्तु तुम, मेरे प्रियो, जीवन और सामर्थ और आशा पा रहे हो।

पद 15: ‘‘क्योंकि सब वस्तुएं तुम्हारे लिये हैं, ताकि अनुग्रह बहुतों के द्वारा अधिक होकर {उनके लिए पौलुस के दुःख उठाने के द्वारा} परमेश्वर की महिमा के लिये धन्यवाद भी बढ़ाए।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि (और ध्यान दीजिये कि पद 15, कैसे प्रथम दो कारणों को एक साथ रखता है) दुःख उठाने की मेरी सेवकाई में, अनुग्रह तुम तक फैल रहा है और महिमा परमेश्वर तक पहुँच रही है। पौलुस के जीवन के ये दो महान् प्रेम हैं: दूसरों तक अनुग्रह पहुँचाना और परमेश्वर को महिमा पहुँचाना — और ये पद कहता है कि वे उसी एक अनुभव में होते हैं। इसलिये पौलुस हियाव नहीं छोड़ता।

3. परमेश्वर की बल देनेवाली उपस्थिति

तीसरा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा परमेश्वर उसे सम्भालता है और उसे हारने नहीं देता।

पद 8-9 (ध्यान दीजिये कि इन में से प्रत्येक जोडि़यों में, जो वह वास्तव में कह रहा है, वो है: हाँ, हमारा बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, किन्तु, नहीं, हम हियाव नहीं छोड़ते): ‘‘हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो होते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं ; पर त्यागे नहीं जाते ; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि परमेश्वर हमें बल देता है और हमें हारने नहीं देता।

4. मृतकों में से हमारा पुनरुत्थान

चैथा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि वह कलीसिया के साथ, मृतकों में से जिलाया जावेगा और यीशु के साथ होगा।

पद 14: ‘‘{हम जानते हैं}, कि जिस ने प्रभु यीशु को जिलाया, वही हमें भी यीशु में भागी जानकर जिलाएगा, और तुम्हारे साथ अपने साम्हने उपस्थित करेगा।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि ये सब ठीक होने जा रहा है। यहाँ तक कि मृत्यु भी कहानी का एक बुरा अन्त नहीं बना सकती। मैं दोबारा जीने जा रहा हूँ ; और मैं तुम्हारे साथ जीने जा रहा हूँ, लोग जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ ; और मैं यीशु के साथ जीने और सदाकाल के लिए उसकी महिमा में सहभागी होने जा रहा हूँ।

इसलिये … यही उस त्रिकोण की पहिली भुजा है (7-15 आयतें) जो हियाव न छोड़ने अपितु प्रतिदिन नया होते जाने के अनुभव को सहारा देती है।

  1. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन, मेरी नाश होती दुर्बलता में प्रगट व महिमित हो रहे हैं।

  2. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मेरे दुःखभोग के द्वारा कलीसिया में जीवन बह रहा है, जिसे मैं इतना अधिक प्रेम करता हूँ।

  3. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मेरे दुःखों में परमेश्वर मुझे सम्भालता/बल देता है और मुझे इससे हारने नहीं देता।

  4. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हारे साथ मृतकों में से जिलाया जाऊंगा और सदा सर्वदा के लिए यीशु के साथ जीवित रहूँगा।

इसलिये मैं हियाव नहीं छोड़ता !

पद 17-18: हियाव न छोड़ने के चार कारण

अब त्रिकोण की अन्य भुजा को देखिये जो पद 16 में पौलुस के अद्भुत अनुभव को सहारा देती है, यथा, 17-18 आयतें। वह हियाव नहीं छोड़ता, और दिन प्रतिदिन नया होता जा रहा है क्योंकि 17-18 आयतें सच हैं। उसके नाश होते हुए बाहरी मनुष्यत्व के बावजूद, पौलुस के लिए हियाव न छोड़ने के पुनः चार कारण हैं — उसकी दुर्बलताएँ और रोग और चोटें और कठिनाईयाँ।

1. क्षण भर का क्लेश

वह हियाव नहीं छोड़ता क्योंकि उसका क्लेश क्षण भर का है।

पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश … ।’’ इसका ये अर्थ नहीं है कि यह 60 सेकैण्ड तक रहता है। इसका अर्थ है कि यह केवल एक जीवन-काल तक रहता है (जो सहस्त्राब्दियों के लाखों युगों के साथ तुलना में क्षण भर का है) और फिर समाप्त। शब्द का अर्थ है, ‘‘वर्तमान’’ — ‘‘वर्तमान के क्लेश’’ — वे क्लेश जो इस वर्तमान जिन्दगी के आगे बने नहीं रहेंगे। मैं हियाव नहीं छोड़ता … क्योंकि मेरे क्लेश समाप्त हो जावेंगे। वे मेरे जीवन में अन्तिम व निर्णायक बात नहीं रह जावेंगे।

2. हल्का सा क्लेश

वह हियाव नहीं छोड़ता क्योंकि उसका क्लेश हल्का है।

पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश … ।’’ ये एक आधुनिक निश्चिन्त अमेरिकी का विचार नहीं है। ये पौलुस का स्वयँ का विचार है। न ही पौलुस वो भूल गया था जो वह 2 कुरिन्थियों 11: 23-28 में कहता है।

अधिक परिश्रम करने में ; बार बार कैद होने में ; कोड़े खाने में ; बार बार मृत्यु के जोखिमों में। पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए। तीन बार मैं ने बेंते खाईं ; एक बार पत्थरवाह किया गया ; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए ; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा। मैं बार बार यात्राओं में ; नदियों के जोखिमों में ; डाकुओं के जोखिमों में ; अपने जातिवालों से जोखिमों में ; अन्यजातियों से जोखिमों में ; नगरों में के जोखिमों में ; जंगल के जोखिमों में ; समुद्र के जोखिमों में ; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में। परिश्रम और कष्ट में ; बार बार जागते रहने में ; भूख-पियास में ; बार बार उपवास करने में ; जाड़े में ; उघाड़े रहने में। और और बातों को छोड़कर जिन का वर्णन मैं नहीं करता सब कलीसियाओं की चिन्ता प्रतिदिन मुझे दबाती है।

जब पौलुस कहता है कि उसके क्लेश हल्के हैं, उसका अर्थ सरल या दर्दरहित नहीं है। उसका अर्थ है कि उसकी तुलना में जो आने वाला है, वे ऐसे हैं मानो कुछ भी नहीं। आने वाली महिमा के विशाल द्रव्यमान की तुलना में, पैमाने पर वे पंखों के समान हैं। ‘‘मैं समझता हूं, कि इस समय के दुःख और क्लेश उस महिमा के साम्हने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं’’ (रोमियों 8: 18)। मैं हियाव नहीं छोड़ता … क्योंकि मेरे क्लेश हल्के हैं।

3. महिमा का एक सनातन विशाल द्रव्यमान

वह हियाव नहीं छोड़ता क्योंकि उसका क्लेश वास्तव में पौलुस के लिए, सभी तुलना से सर्वथा परे, एक भारी द्रव्यमान की सनातन महिमा उत्पन्न कर रहा है।

पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण {या ‘भारी द्रव्यमान की’ - अंग्रेजी से सही अनुवाद} और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’’ जो पौलुस के पास आ रहा है, वो क्षणिक नहीं है, अपितु सनातन है। ये हल्का नहीं है, अपितु वजनी है। ये क्लेश नहीं है, अपितु महिमा है। और ये समझ से सर्वथा परे है। जो आँख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, वे ही हैं जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं (1 कुरिन्थियों 2: 9)।

और बिन्दु ये नहीं है कि क्लेश, मात्र महिमा के पूर्व आते हैं ; वे महिमा उत्पन्न करने में सहायता करते हैं। इन दोनों के बीच एक वास्तविक आकस्मिक सम्बन्ध है कि कैसे हम अभी कठिनाई सहते हैं और कितना हम आने वाले युगों में परमेश्वर की महिमा का आनन्द उठा सकेंगे। धीरजवन्त दर्द का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं होता। मैं हियाव नहीं छोड़ता … क्योंकि मेरे सारे कष्ट मेरे लिए, सभी तुलना से परे, महिमा का एक सनातन विशाल द्रव्यमान उत्पन्न कर रहे हैं।

4. अनदेखी, आनेवाली सनातन महिमा

पौलुस हियाव नहीं छोड़ता क्योंकि वह अपना मन अनदेखी, आनेवाली सनातन महिमा पर लगाता है।

पद 18: ‘‘हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं।’’ परमेश्वर आपको विश्व में सारी महिमा दे सकता है ताकि हियाव छोड़ देने से आपकी रक्षा करे और दिन प्रतिदिन आपकी आत्मा को नया बनाये, लेकिन यदि आपने इसकी ओर कभी नहीं देखा, इससे कुछ लाभ नहीं होगा।

परमेश्वर का उदार आमंत्रण

वास्तव में, परमेश्वर ठीक इसी समय इस उपदेश में यही कर रहा है। ये मूल-पाठ परमेश्वर की ओर से आपके लिए एक उदार आमंत्रण है कि उन सभी कारणों की ओर देख लें कि क्यों आपको हियाव नहीं छोड़ना है — सभी कारण कि क्यों आप दिन प्रतिदिन नया किये जा सकते हैं। * देखिये ! परमेश्वर की सामर्थ और उसके पुत्र का जीवन आपकी दुर्बलताओं में प्रगट होता है। * देखिये ! आपके दुःखभोग के द्वारा यीशु का जीवन, दूसरे लागों के जीवन में बह रहा है। * देखिये ! आपके क्लेशों में परमेश्वर आपको सम्भालता है और आपको नाश नहीं होने देगा। * देखिये ! आपके क्लेश अन्तिम व निर्णायक नहीं हैं ; आप यीशु के साथ और परमेश्वर की कलीसिया के साथ मृतकों में से जी उठेंगे और सदा सर्वदा के लिए आनन्द में जीवित रहेंगे। * देखिये ! आपके क्लेश क्षणिक हैं। वे केवल अभी के लिए हैं, आने वाले युग के लिए नहीं। * देखिये ! आपके क्लेश हल्के हैं। वे सुख जो आ रहे हैं उनकी तुलना में वे कुछ भी नहीं के समान हैं। * देखिये ! ये क्लेश आपके लिए महिमा का एक सनातन भारी द्रव्यमान उत्पन्न कर रहे हैं, जो सभी तुलनाओं से परे है।

अतः देखिये ! ध्यान केन्द्रित कीजिये ! मनन कीजिये ! इन चीजों पर विचार कीजिये ! परमेश्वर जो कहता है, उस पर विश्वास कीजिये। और आप हियाव नहीं छोड़ेंगे, अपितु आपका भीतरी व्यक्ति दिन प्रतिदिन नया होता जावेगा।