सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है


हे भाइयो, चौकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाये। 13 बरन् जिस दिन तक ‘‘आज’’ का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए। 14 क्योंकि हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें। 15 जैसा कहा जाता है, कि ‘‘यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय किया था।’’ 16 भला किन लोगों ने सुनकर क्रोध दिलाया ? क्या उन सब ने नहीं, जो मूसा के द्वारा मिस्र से निकले थे ? 17 और वह चालीस वर्ष तक किन लोगों से रूठा रहा ? क्या उन्हीं से नहीं, जिन्होंने पाप किया, और उन की लोथें जंगल में पड़ी रहीं ? 18 और उस ने किन से शपथ खाई, कि तुम मेरे विश्राम में प्रवेश करने न पाओगे: केवल उन से जिन्हों ने आज्ञा न मानी ? 19 सो हम देखते हैं, कि वे अविश्वास के कारण प्रवेश न कर सके।।

दो बड़े 'यदि'

बीते सप्ताह हमने पद 6 व पद 14 में दो बड़े यदि पर ध्यान केन्द्रित किया था। हम पुनः उन्हें अपने समक्ष रखें और इस पर ध्यान एकाग्र करें कि बैतलहम में साथ-साथ हमारा जीवन, इन बड़े यदि को पूरा करने में किस प्रकार सहायता कर सकता है।

पद 6ब: ‘‘उसका (मसीह का) घर (अर्थात्, उसका घराना, उसके लोग) हम हैं, यदि हम साहस पर, और अपनी आशा के घमण्ड पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें।’’ सावधानीपूर्वक ध्यान दीजिये। ये यह नहीं कहता: हम मसीह का घर बन जायेंगे यदि हम अपनी आशा पर दृढ़ता से स्थिर रहें। ये कहता है: हम उसका घर हैं यदि हम अपनी आशा पर दृढ़ता से स्थिर रहें। दूसरे शब्दों में अपनी आशा पर दृढ़ता से स्थिर रहना, इसका प्रदर्शन और प्रमाण है कि हम अभी उसका घर हैं।

इसके बाद पद 14 के यदि को देखिये: ‘‘हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें।’’ पुनः, शब्दों पर सावधानीपूर्वक ध्यान दीजिये। ये यह नहीं कहता: ‘‘हम भविष्य में मसीह के भागी बन जायेंगे यदि हम अपने भरोसे पर दृढ़ता से स्थिर रहें।’’ ये कहता है, ‘‘हम भागी बन गये हैं (विगत में) यदि हम अपने भरोसे पर दृढ़ता से स्थिर रहें।’’ दूसरे शब्दों में, अपने भरोसे पर दृढ़ रहना प्रमाणित करता है कि कुछ वास्तविक और ठहरने वाला हमारे साथ हो चुका है, यथा, हम मसीह के भागी/साझीदार बन गये हैं। हमारा सच में नया जन्म हुआ था। हमारा सच में मन-परिवर्तन हुआ था। हम सच में मसीह के घर का हिस्सा बनाये गये थे।

तो फिर परिणाम क्या होगा यदि हम अपने भरोसे पर दृढ़ता से स्थिर नहीं रहें ? उत्तर ये नहीं है कि आप मसीह के भागी /सहभागी होना बन्द कर देते हैं, अपितु यह कि आप कभी भी मसीह के सहभागी नहीं बने थे। इसे ध्यान से पढि़ये: ‘‘हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें।’’ और इस कारण, ‘‘यदि हम अपने अंगीकार पर दृढ़ता से स्थिर नहीं रहें, तब हम मसीह के सहभागी नहीं बने हैं।’’

इब्रानियों की पुस्तक सनातन सुरक्षा की शिक्षा देती है

इस मूल-पाठ के आधार पर मैंने पिछले सप्ताह कहा था कि ये पुस्तक सनातन सुरक्षा की शिक्षा देती है। अर्थात्, ये सिखाती है कि यदि आप सच में मसीह के भागी बन गये हैं, आप सदा बने रहेंगे। आपके विश्वास और आशा को संरक्षित रखने के लिए ‘वह’ आप में कार्य करेगा। इसे कहने का दूसरा तरीका यह है कि यदि आप परमेश्वर की एक सन्तान हैं, आप परमेश्वर की सन्तान बने रहना बन्द नहीं कर सकते। लेकिन हम सब जानते हैं कि अनेक लोग हैं जो मसीही जीवन में एक आरम्भ करते हैं और फिर गिर जाते हैं और प्रभु का परित्याग कर देते हैं। उस प्रकार का व्यक्ति इस लेखक के दिमाग में अवश्य ही है। वह जानता है कि ये होता है और वह इसके साथ इस मूल-पाठ में बर्ताव करता है और यह कि इसे होने से कैसे रोका जा सकता है। किन्तु जब यह होता है, उसकी व्याख्या ये नहीं है कि वो व्यक्ति वास्तव में मसीह का एक भागी था, अपितु यह कि वह कभी भी मसीह का सच्चा भागी नहीं बना था। यदि हम अपने भरोसे पर दृढ़ता से स्थिर रहते हैं, हम मसीह के भागी/सहभागी बन गये हैं; यदि हम स्थिर नहीं रहते, तब हम मसीह के भागी नहीं बने हैं।

दूसरे शब्दों में विश्वास और आशा में दृढ़ बने रहना, परमेश्वर में अपने भरोसे पर दृढ़ता से स्थिर रहना, मसीह में आपकी स्थिति को खो देने से सुरक्षित रखने का एक तरीका नहीं है; यह ये दिखाने का एक तरीका है कि मसीह में आपकी एक स्थिति है। वो स्थिति कभी भी खोई नहीं जा सकती, क्योंकि आप इसे परमेश्वर के सेंत- मेंत अनुग्रह से पाते हैं, और क्योंकि मसीह ने जो ‘उसके’ हैं उन्हें सुरक्षित रखने की प्रतिज्ञा (इब्रा नियों 13: 5; 20-21), एक वाचा और एक शपथ के साथ की है(इब्रानियों 6: 17-19)। दूसरे शब्दों में, मेरी सुरक्षा और भरोसा, एक निर्णय या एक प्रार्थना नहीं है जो मुझे याद है कि मैंने विगत में किया था; मेरी सुरक्षा और भरोसा, परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और सामर्थ्य है जो मुझे भविष्य में ‘उस’ में आशा रखने में, बनाये रखती है। मेरी सुरक्षा ये है कि ‘‘जिस ने मुझ में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा’’ (फिलिप्पियों 1: 6)।

आप कैसे "जीवते परमेश्वर से दुर हट" सकते हैं यदि आप कभी भी विश्वासी नहीं थे?

अब यह विभिन्न प्रश्न उठाता है। एक है: ठीक है, यदि अपनी आशा और भरोसे को दृढ़ता से थामे रहने में हमारी असफलता का अर्थ है कि हम कभी भी वास्तव में मसीह के भागी नहीं थे, तो पद 12 में हम किस चीज से दूर हट रहे हैं? हे भाइयों, चौकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा, और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाये (या मुड़ जाये)।

यदि हम सच में कभी भी परमेश्वर के नहीं थे, तो किस अर्थ में परमेश्वर से दूर हट जाना या मुड़ जाना हो सकता है ?

एक सरल उत्तर ये है कि एक मंगेतर से वास्तविक और दुःखदायी दूर हो जाना हो सकता है, जो एक पत्नी से दूर हो जाना नहीं है। मैं सोचता हूँ कि लेखक जिस तरीके से चाहता है कि हम इस बारे में सोचें वो 7-11 आयतों में (भजन 95 में भी), इस्राएल के लोगों के उदाहरण में दिया गया है। वह पद 9 में इंगित करता है कि लोगों ने ‘‘चालीस वर्ष तक मेरे काम देखे’’ फिर भी उन्होंने परमेश्वर के विरोध में अपने मनों को कठोर किया (पद 8) और अपने मनों में भटक गये (पद 10)। दूसरे शब्दों में उन्होंने परमेश्वर को लाल समुद्र को विभाजित करते और उन्हें मिस्र से बचाने में उसकी महान दया को देखा था। उन्होंने ‘उसे’ एक चट्टान से जल देते, आकाश से मन्ना, बादल और आग के खम्भे में मार्गदर्शन, शत्रुओं से छुटकारा, जीवन जीने के लिए अच्छे नियम, उनके बलवाई स्वभाव के प्रति नरमी करते, देखा था। लेकिन इस सब के बावजूद भी, वे अपने हृदयों में कठोर हो गये और परमेश्वर पर आशा रखना बन्द कर दिया। वे वापस मिस्र जाना चाहते थे, उन्होंने मूरतें बना लीं और कुड़कुड़ाया। ‘‘जीवते परमेश्वर से दूर हटने’’ से लेखक का यही तात्पर्य है।

वे परमेश्वर के शक्तिशाली कार्यों में बह चुके थे। उन्होंने उसकी सामर्थ्य का स्वाद चख लिया था और ‘उसके’ ‘आत्मा’ और भलाई से लाभान्वित हो चुके थे। पृथ्वी के किन्हीं भी लोगों से बहुत आगे, वे परमेश्वर के प्रकाशन से ज्ञानसम्पन्न किये गए थे। और वे दूर हट गये थे। यही नया नियम के समय के कुछ लोगों के साथ था। और यही आज भी है। इब्रानियों 2: 4 में व्यक्त किये गए चिन्हों और आश्चर्यकर्मों में, ये लोग बह गये थे। उन्होंने आने वाले युग की सामर्थ्य को चखा था। वे प्रेमी लोगों के समूह में बदल दिये गए और उन्होंने अपने मध्य और अपने जीवनों में पवित्र आत्मा के कार्यों का बड़ी माप में अनुभव किया था। उन्होंने सुसमाचार के प्रकाश की झलक पायी थी। उन्हें बपतिस्मा दिया गया, और उन्होंने प्रभु-भोज खाया और उपदेशों को सुना और सम्भवतः स्वयँ भी कुछ विशिष्ट काम किये थे।

लेकिन, जैसा कि इस्राएलियों के साथ, उनके हृदय कठोर हो गए, और एक अविश्वास के दुष्ट हृदय को मौका मिल गया, और उन्होंने मसीह की बनिस्बत किन्हीं और चीजों पर अपनी आशा रखना आरम्भ कर दिया, और समय के साथ वे उन सभी अच्छाईयों से दूर हट गये जिन से वे घिरे रहते थे। और इब्रानियों की पत्री कहती है, इसका स्पष्टीकरण यह है कि वे ‘‘मसीह के भागी नहीं बने थे।’’ वे किसी माप तक ज्ञानसम्पन्नता और सामर्थ्य और आनन्द में सहभागी हुए थे; किन्तु (यीशु के शब्दों का उपयोग करने के लिए) उस पौधे में कोई जड़ नहीं थी और ये सूख गया, जबकि अन्य इस जीवन की चिन्ताओं व धन व सुख-विलास में फंस गये (लूका 8: 13-14)।

दूसरे शब्दों में, आप परमेश्वर से उतने ही अंश दूर हट सकते हैं जितना आप परमेश्वर के कार्य के निकट आये हैं-- ‘उसके’ लोगों का प्रेम, ‘उसके’ वचन का प्रकाश, प्रार्थना करने की सुविधा, ‘उसके’ उदाहरण का नैतिक बल, ‘उसके’ ‘आत्मा’ के वरदान और आश्चर्यकर्म, ‘उसके’ आपूर्तियों की आशीषें और धूप और बारिश का प्रतिदिन का प्रकाश। ये सम्भव है कि ये वस्तुएँ चखी जाएं, उन से गहराई से प्रभावित होना, और अविश्वास में खो जाना, क्योंकि यीशु मसीह स्वयँ आपके हृदय की प्रसन्नता और आशा और भरोसा और प्रतिफल नहीं है।

झूठे भरोसे के विरोध में चेतावनी देने के लिए, यीशु ने ये बातें बार-बार सिखायीं। उदाहरण के लिए, मत्ती 7: 21-23 में ‘उसने’ कहा,

जो मुझ से, ‘‘हे प्रभु, हे प्रभु’’ कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; ‘‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से अचम्भे के काम नहीं किए ?’’ तब मैं उन से खुलकर कह दूँगा कि ‘‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।’’

भविष्यवाणी करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और यीशु के नाम में सामर्थ्य के काम करना, प्रमाणित नहीं करते कि यीशु ने हमें ‘‘जान लिया है,’’ या कि हम मसीह के भागी हैं। एक कठोर, अपरिवर्तित हृदय के साथ वे चीजें कर लेना सम्भव है। यीशु के द्वारा हमें ‘‘जानने’’ का प्रमाण ये है कि यीशु हमारी आशा, हमारा भरोसा, हमारा धन, हमारा प्रतिफल है (इब्रानियों 10: 24; 11: 25-26)। ये वो आन्तरिक वास्तविकता है जो हमारे जीवनों को रूपान्तरित करती है।

वो एक प्रश्न है: आप परमेश्वर से कैसे दूर हट सकते या दूसरी ओर मुड़ सकते हैं, यदि आप कभी भी मसीह के भागी नहीं रहे ? और उत्तर है: बिना ‘उस’ पर भरोसा रखे, बिना ‘उस’ में आशा रखे और बिना ‘उस’ से प्रेम करते हुए, परमेश्वर की निकटता के भागी होने के अनेकों तरीके हैं। और इसलिए बिना स्वयँ मसीह के कभी भागी रहे हुए, मसीह से दूसरी ओर मुड़ जाने के अनेकों तरीके हैं।

हमारी सनातन की सुरक्षा के प्रति हम कैसे सुनिशिचत हो सकते हैं?

अतः दूसरा प्रश्न है: हम क्या करें ? हम कैसे अपनी सनातन की सुरक्षा को जान सकते, आनन्द उठा सकते और पूर्णतः आश्वस्त हो सकते हैं ? पद 12 व 13 दो उत्तर देते हैं: एक अधिक सामान्य और एक अधिक विशिष्ट।

पहिले, सामान्य उत्तर पद 12 में: ‘‘हे भाइयो, चौकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए।’’ सामान्य उत्तर है, ‘‘चौकस रहो!’’ या ‘‘ध्यान दो!’’ या ‘‘देखो!’’ दूसरे शब्दों में, अपने हृदय की दशा के बारे में लापरवाह, या उदासीन या अनमयस्क न रहो। इसे देखिये। जैसा कि पौलुस 2 कुरिन्थियों 13: 5 में कहता है, यह देखने के लिए अपने आप को जाँचो कि विश्वास में हो कि नहीं। अथवा, जैसा पतरस, 2 पतरस 1: 10 में कहता है, ‘‘अपने बुलाए जाने, और चुन लिए जाने को सिद्ध करने का भली भांति यत्न करते जाओ।’’ किनारा मत करो या बह मत जाओ और विश्वास में अपने दृढ़ रहने को स्वीकृत मत समझो। सब प्रकार की नकली आसक्तियाँ/अनुराग प्रतिदिन आपके आत्मा के विरुद्ध युद्ध कर रही हैं ताकि आपके विश्वास को चुरा लें और मसीह को किसी और धन से प्रतिस्थापित कर दें। सावधान रहिये! निरन्तर जागृत रहिये! ईमानदार रहिये! अपने हृदय के प्रति चौकस रहिये। जैसा नीतिवचन 4: 23 कहता है, ‘‘सब से अधिक अपने मन की रक्षा (चौकसी) कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है।’’ पद 12 का उत्तर यही है। सावधान रहिये !

कोई व्यक्ति कह सकता है, ‘‘ठीक है, यदि मैं मसीह का एक सच्चा भागी हूँ, जैसा कि मैं विश्वास करता हूँ कि मैं हूँ, मुझे क्यों आवश्यक है कि ध्यान दूँ और इतना चौकस रहूँ, जबकि आपने कहा है कि मैं सनातन काल के लिए सुरक्षित हूँ और मसीह में अपनी स्थिति नहीं खो सकता ?’’ मैं सोचता हूँ कि ये प्रश्न कुछ ऐसा अनुमान करता है कि नया नियम जो कहता है वो सच नहीं है। ये अनुमान करता है कि परमेश्वर के चुने हुओं को स्वर्ग में प्रवेश कराने का ‘उसका’ मार्ग बिना सचेत रहे और चौकसी किये और स्व-मूल्यांकन और साधनों का बुद्धिमानी से उपयोग किये बिना है। परन्तु वास्तव में लूका 13: 24 में, यीशु कहते हैं, ‘‘सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि बहुतेरे प्रवेश करना चाहेंगे, और न कर सकेंगे।’’ और पतरस कहता है, ‘‘सचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह की नाई इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए’’ (1 पतरस 5: 8)। सच्चाई ये नहीं है कि सच्चे मसीहियों को अपने हृदयों के ऊपर सचेत और चौकस नहीं रहना है; किन्तु यह कि आप जान सकते हैं कि आप एक सच्चे मसीही हैं यदि आप अपने हृदय के ऊपर सचेत और चौकस हैं।

ये अश्वारोही मसीही हैं जिन्हें अपनी स्थिति के बारे में चिन्तित होने की आवश्यकता है। ये वे हैं जिन्हें बपतिस्मा दिया गया और जो कुर्सियों की कतारों के मध्य के पथ में से चले या एक प्रार्थना की और प्रभु-भोज लिया और चर्च में आये, किन्तु यीशु से प्रेम नहीं करते अथवा ‘उसे’ अपनी सर्वाधिक प्रिय निधि नहीं मानते या ‘उस’ में अपनी आशा नहीं रखते न ही उससे मिलने की प्रतीक्षा में हैं, न कह सकते हैं, ‘‘जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।’’ ये स्व-आश्वस्त लोग हैं जिन्हें असुरक्षित महसूस करने की आवश्यकता है (देखिये, व्यवस्थाविवरण 29: 19)। ये वे लोग हैं, जो बहुधा चर्च में पाये जाते हैं जो उनके उद्धार को एक टीकाकरण के रूप में लेते हैं। उन्हें सालों पूर्व टीका लगा और अपने चारों ओर के अविश्वास के ख़तरों के बारे में जरा भी विचार न करते हुए वे मान लेते हैं कि सब ठीक है। वे कहते हैं, ‘‘जब मैं आठ साल का था-- या छः साल का--मुझे नरक के विरोध में टीका लग चुका है।’’ और इसलिए स्वर्ग में प्रवेश के लिए, उनके हृदय के ऊपर कोई सावधानी रखने वाली बात नहीं है कि इसे कठोर और अविश्वासी बनने से सुरक्षित रखा जाए। ये मात्र यह सुनिश्चित करने की बात है कि टीकाकरण हुआ था। ये वे लोग हैं जो भयंकर जोखि़म में हैं।

वो ये पहला उत्तर है कि हम अपनी सनातन सुरक्षा के लिए कैसे सुनिश्चित रहते हैं: अपने हृदय पर ध्यान दीजिये। अविश्वास से इसकी रक्षा कीजिये। अर्थात्, सभी प्रतियोगी निधियों के विपरीत, मसीह में अपने भरोसे और आशा को बनाये रखने में सचेत रहिये।

दूसरा उत्तर पद 13 में अधिक सुस्पष्ट है: ‘‘वरन् जिस दिन तक ‘आज’ का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो (या प्रोत्साहित करो), ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए।’’ दूसरा उत्तर ये है कि सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है। हम बैतलहम में क्या करें, एक ‘‘बुरा और अविश्वासी मन’’ को दूर करने के लिए और उन पापों के छल से कठोर नहीं होने के लिए, जो हमें प्रतिदिन बहकाते हैं कि हम यीशु को जैसा संजोए रहते हैं उससे अधिक उन्हें सँजोएं ?

"बुरा और अविश्वासी मन" से बचकर रहने के लिए चर्च हमारी कैसे सहायता करता है?

उत्तर ये है कि हमें एक दूसरे के लिए चर्च बनना है। और वो मुख्य चीज क्या है जो चर्च एक-दूसरे के लिए करता है ? हम एक-दूसरे से ऐसे तरीकों से बात करते हैं जो हमारी सहायता करते हैं कि पाप के प्रलोभनों से धोखा न खायें। या इसे सकारात्मक ढंग से रखें, हम एक-दूसरे से ऐसे तरीकों से बात करते हैं जो हमें सभी चीजों से ऊपर मसीह के उच्च मूल्य में विश्वास का हृदय रखने का कारण बनते हैं। ऐसे शब्द बोलने के द्वारा जो लोगों का ध्यान सत्य और यीशु के मूल्य की ओर ले जाते हैं, हम एक-दूसरे का विश्वास बनाये रखने के लिए संघर्ष करते हैं। इसी तरीके से आप एक बुरा और अविश्वासी मन होने से रक्षा करते हैं। अविश्वास का अर्थ है, यीशु में अपने महानतम् धन/निधि के रूप में टिकाव लेने में असफल होना। अतः एक-दूसरे को विश्वास करने में सहायता करने का अर्थ है, लोगों को वे कारण दिखाना कि किसी और चीज से बढ़कर क्यों यीशु अधिक इच्छित और भरोसा और प्रेम किये जाने के योग्य है।

ठीक यहाँ एक स्पष्टीकरण है कि क्यों परमेश्वर ये नियुक्त करे कि मसीही जीवन, एक व्यक्तिगत व सामुदायिक चैकसी का जीवन रहे, और क्यों ‘वह’ योजना बनाये कि सनातन सुरक्षा, एक सामुदायिक परियोजना बने। स्पष्टीकरण यह है कि इस तरीके से मसीही जीवन जीना, मसीह की महिमा को हमारी सभी पारस्परिक क्रिया का केन्द्र बनाता है। यदि सनातन सुरक्षा एक टीकाकरण के समान होती, तब मसीह को टीकाकरण के दिन सम्मानित किया जाना चाहिए था, लेकिन उसके बाद ‘वह’ भुला दिया जाना चाहिये, ठीक वैसे ही जैसे हम अपने टीकाकरण को भूल जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है यदि सनातन सुरक्षा में अविश्वास के विरुद्ध एक प्रतिदिन का युद्ध सम्मिलित है, जहाँ विजय के हथियार हैं, मसीह के भरोसेमंद होने और मसीह की महानता और सभी चीजों से ऊपर मसीह के मूल्य के बारे में, विश्वास-निर्मित करने वाले प्रोत्साहन। यदि हमें एक-दूसरे से प्रतिदिन इस तरह से बात करना चाहिए कि यह सुनिश्चित करें कि हम सब ‘उस’ पर विश्वास करते रहें, तब ‘वह’ दिन-ब-दिन का अधिक हिस्सा बनाया गया है। सदैव ‘उसके’ बारे में बात होती है और वह सदा हमारे ध्यान का केन्द्र है। अतः परमेश्वर नियत करता है कि सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना बने क्योंकि ‘वह’ नहीं चाहता कि ‘उसका’ ‘पुत्र’ एक टीकाकरण के समान भुला दिया जाए, अपितु प्रतिदिन सारे विश्व में एक महानतम् निधि/धन के रूप में प्रतिष्ठित किया जाए।

पद 12 व 13 से अब ये स्पष्ट है कि उपदेश से अधिक कुछ और चीज यहाँ पर दृष्टि में है। मैं अपने शिक्षण में यह करने का प्रयास करता हूँ--प्रति सप्ताह आपको प्रोत्साहित करूँ कि एक बुरा और अविश्वासी मन न रखें। किन्तु ये मूल-पाठ उससे भी अधिक दो बातें कहता है। एक (पद 13 में) यह कि ये प्रोत्साहित करना, ‘‘दिन-ब-दिन’’ होते जाना है, सप्ताह में मात्र एक बार नहीं। और दूसरा यह कि ये ‘‘एक-दूसरे’’ (पद 13) के द्वारा किया जाना है--अर्थात्, आपको इसे प्रत्येक दूसरे के साथ करना है, मात्र इसे उपदेशक से प्राप्त नहीं करना है।

यह दृढ़ विश्वास कायलियत--कि ऐसी एक-दूसरे की सेवकाई, विश्वास में आपके दृढ़ बने रहने और आपके उद्धार के लिए परम निर्णायक है--यह दृढ़ विश्वास ही कारण है कि प्राचीनों ने निर्णय किया है कि छोटे समूह की सेवकाई को बैतलहम में आयोजित किया जाए। हमें विश्वास है कि इस आकार की कलीसिया में, विश्वास के इस प्रकार की सामूहिक लड़ाई को प्रोत्साहित करने का इससे अच्छा तरीका नहीं है, तुलना में उससे कि छोटे समूहों के लिए एक अधिक बड़ी जगह बनायी जाए और बड़ी संख्या में सम्मिलित होने के लिए काम किया जाए। इसी कारण सितम्बर से आरम्भ करके प्रत्येक रविवार की रात्रि, छोटे समूहों के लिए अलग रखी जाएगी और प्रत्येक बुद्धवार की रात्रि, मध्य-सप्ताह में भोजन पर, एक कलीसिया के रूप में आराधना करते हुए, विश्वास-निर्मित करने वाली कहानियाँ कि परमेश्वर समूहों में क्या कर रहा है बताते हुए, और हमारे बच्चों, जवानों, और वयस्कों को परमेश्वर का वचन सिखाते हुए, एक-दूसरे को जोड़ने के लिए समर्पित की जाएगी, ताकि ऐसा न हो कि हम में से किसी का मन अविश्वासी होकर हमें जीवते परमेश्वर से दूर हटा ले जाये।

इन दोनों सेवकाइयों के प्रभाव के बारे में मैं बहुत उत्साहित हूँ—1) प्रत्येक रविवार रात्रि को इस आशा में उपलब्ध बनाने के द्वारा छोटे समूहों में बांटना, कि कई समूह, अधिक और अधिक सेवकाई दल बन जायेंगे जो एक-दूसरे को प्रतिदिन प्रोत्साहित करते हों ; और 2) भी, बुद्धवार संध्या का संगति का नमूना, आराधना, शिक्षण, और परमेश्वर की वर्तमान सामर्थ्य की कहानियाँ।

मैं अपने सम्पूर्ण हृदय के साथ आपसे ये याचना करता हूँ कि धर्मशास्त्र के इस अनुच्छेद ( पैराग्राफ) को गम्भीरता से लें, जब आप ये विचार कर रहें हों कि क्या आपका जीवन, मसीही जीवन के इस नमूने से मेल खाता है। क्या ऐसा न होगा कि विश्वासियों के एक छोटे समूह के साथ नियमित रूप से इकट्ठा होना, जो एक दूसरे के विश्वास के लिए लड़ने के लिए आमादा हैं, आपको भरोसे और सुरक्षा के ऐसे आनन्द में ले आये, जो उन सब से बढ़कर है जो आपने जाना है, और संसार में आपको साहसिक गवाही और सेवकाई के लिए स्वतंत्र करे ? मैं सोचता हूँ कि परमेश्वर हमें इसी के लिए बुला रहा है।

Thumb author john piper

John Piper (@JohnPiper) is founder and teacher of desiringGod.org and chancellor of Bethlehem College & Seminary. For 33 years, he served as pastor of Bethlehem Baptist Church, Minneapolis, Minnesota. He is author of more than 50 books, including A Peculiar Glory.