सेवकाई के रुप में आपका पेशा


आज सुबह के मेरे संदेश के मुख्य बिन्दु को एक घोषणा के रूप में और एक प्रार्थना के रूप में बयान किया जा सकता है। एक घोषणा के रूप में, ये रहेगा: मसीही शिष्यता के एक अत्यावश्यक भाग के रूप में आप अपने व्यवसाय की मांगों को कैसे पूरा करते हैं। अथवा, इसे दूसरी तरह से रखें: आप अपने काम को कैसे करते हैं, ये यीशु के प्रति आपकी आज्ञा- कारिता का एक बड़ा हिस्सा है। प्रार्थना के रूप में बयान किया जावे, आज का मुख्य बिन्दु है: पिता, हमारे काम में आपकी उपस्थिति के प्रति सचेत रहने के लिए और हमारे सभी पेशेगत सम्बन्धों में आपके आदेशों का पालन करने के लिए हमें सभी अनुग्रह दीजिये। मैं विश्वास करता हूँ कि आज हमारे लिए ये परमेश्वर का वचन है, और मैं इसे 1 कुरिन्थियों 7: 17-24 से कुछ मिनिटों के लिए खोलना पसन्द करूंगा।

जो कोई जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में रहे

इससे पूर्व कि हम इसे पढ़ें, आइये हम इसके पूर्व के संदर्भ से स्वयं को अवगत करावें। मसीह में विश्वास को, मानव-जीवन के साधारण सम्बन्धों को किस प्रकार प्रभावित करना चाहिए, इस बारे में अनिश्चितता, कुरिन्थिुस की कलीसिया में समस्याओं में से एक थी। उदाहरण के लिए, 1 कुरिन्थियों 7 में प्रश्न उठाया गया है कि क्या मसीह में विश्वास का ये अर्थ होना चाहिए कि एक पति और पत्नी को यौन सम्बन्ध से बचकर रहना चाहिए। पद 3 में पौलुस प्रतिध्वनि करता हुआ, एक नहीं देता है। एक अन्य उदाहरण पद 12-16 में एक प्रश्न है, हमें क्या करना चाहिए यदि विवाह का एक साथी अपना विश्वास मसीह में रखता या रखती है किन्तु दूसरा नहीं ? क्या विश्वासी को शुद्ध बने रहने के लिए, स्वयं को पृथक कर लेना चाहिए ? पुनः पौलुस उत्तर देता है, नहीं। उस सम्बन्ध में बने रहिये जिसमें आप थे, जब परमेश्वर ने आपको विश्वास में बुलाया। मसीह में प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास, आपके विवाह की वाचा को कभी नष्ट नहीं करेगा जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के समय ठहराया था।

लेकिन पद 12 और 13 में वो कह देने के बाद, प्रेरित उसकी अनुमति देता है, यदि अविश्वासी साथी, विश्वासी साथी को त्यागता है और विश्वासी के साथ कोई वास्ता नहीं रखना चाहता, तब विश्वासी उस सम्बन्ध में सदा के लिए बंधा नहीं है। दूसरे शब्दों में, मसीह में विश्वास में आना, एक व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा नियुक्त सम्बन्धों का परित्याग करने की इच्छा रखने वाला नहीं बनाता, अपितु उन्हें शुद्ध करने की। धीरज और प्रार्थना और विनम्र, उदाहरण-स्वरूप चरित्र, के साथ विश्वास करने वाला जीवन-साथी, अविश्वासी को जीतने की लालसा करता है। किन्तु ये हो सकता है, जैसा कि यीशु ने मत्ती 10: 34 से आगे भविष्यकथन किया, कि अविश्वासी जीवन-साथी का विद्रोह और अविश्वास, मसीहियत को, एक शान्तिमय मरहम़ जो चंगा करता है कि बनिस्बत एक ऐसी तलवार में बदल देगा जो विभाजित करती है। अतः सिद्धान्त जो प्रेरित अनुसरण करता है, वो है: परमेश्वर-नियुक्त सम्बन्धों में बने रहो; उन्हें परित्याग करने या उन्हें नष्ट करने की खोज में मत रहो। लेकिन वह उस अपवाद की अनुमति देता है कि यदि वो सम्बन्ध तुम्हारी इच्छा या नियंत्रण से बाहर, अविश्वासी साथी के द्वारा परित्याग या नष्ट किया जाता है, तब ऐसा होने दीजिये। निर्दोष विश्वासी, उस त्यागने वाले से बंधा नहीं है।

यहाँ हमारा मूल-पाठ 1 कुरिन्थियों 7: 17 में आरम्भ होता है। जब आप एक मसीही बन जाते हैं तब विवाह के परमेश्वर - नियुक्त सम्बन्ध में बने रहने के सिद्धान्त पर विचार-विमर्श करने के बाद, पौलुस इस सिद्धान्त को दो अन्य संदर्भ में विचार-विमर्श करता है। आइये हम 1 कुरिन्थियों 7: 17-24 को पढ़ें।

पर जैसा प्रभु ने हर एक को बांटा है, और जैसा परमेश्वर ने हर एक को बुलाया है ; वैसा ही वह चले: और मैं सब कलीसियाओं में ऐसा ही ठहराता हूँ। जो खतना किया हुआ बुलाया गया हो, वह खतनारहित न बने: जो खतनारहित बुलाया गया हो, वह खतना न कराए। न खतना कुछ है, और न खतनारहित परन्तु परमेश्वर की आज्ञाओं को मानना ही सब कुछ है। हर एक जन जिस दशा में बुलाया गया हो, उसी में रहे। यदि तू दास की दशा में बुलाया गया हो तो चिन्ता न कर ; परन्तु यदि तू स्वतंत्र हो सके, तो ऐसा ही काम कर। क्योंकि जो दास की दशा में प्रभु में बुलाया गया है, वह प्रभु का स्वतंत्र किया हुआ है: और वैसे ही जो स्वतंत्रता की दशा में बुलाया गया है, वह मसीह का दास है। तुम दाम देकर मोल लिए गए हो, मनुष्यों के दास न बनो। हे भाइयो, जो कोई जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में परमेश्वर के साथ रहे।।

वो सिद्धान्त जो पौलुस ने विवाह के संबंध में पहिले ही सिखा दिया था, यहाँ स्पष्ट रूप से तीन बार व्यक्त किया गया है। पद 17 पर ध्यान दीजिये, ‘‘पर जैसा प्रभु ने हर एक को बांटा है, और जैसा परमेश्वर ने हर एक को बुलाया है, वैसा ही वह चले।’’ फिर पद 20, ‘‘हर एक जन जिस दशा में बुलाया गया हो, उसी में रहे।’’ इसके बाद पद 24, ‘‘हे भाइयो, जो कोई जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में परमेश्वर के साथ रहे।’’ पौलुस के सिद्धान्त के ये तीन बयान, मूल-पाठ को दो भागों में बाँटते हैं। इन को एक ‘डबल-डेकर’ सेन्डविच (एक ‘बिग मैक के समान) में रखे हुए ब्रेड के तीन टुकड़ों के रूप में सोचना, सहायक होगा। ऊपर के दो टुकड़ों के बीच पद 18 व 19 हैं जहाँ सिद्धान्त को खतना व खतनारहित के विषय में लागू किया गया है। नीचे के दो टुकड़ों के बीच पद 22-23 हैं जहाँ सिद्धान्त को दासत्व और स्वतंत्रता के लिए लागू किया गया है। लेकिन इससे पूर्व कि हम इन दोनों अनुप्रयोगों में से किसी एक को समझ सकें, हमें सिद्धान्त ही में एक कुंजी-शब्द को स्पष्ट करना आवश्यक है।

किस प्रकार की बुलाहट दूष्टि में हैं ?

वो शब्द जो सिद्धान्त के प्रत्येक बयान में आया है और इस अनुच्छेद में कुल नौ बार आया है, शब्द ‘‘बुलाया गया’’ है। जब पद 17 में पौलुस कहता है, ‘‘जैसा परमेश्वर ने हर एक को बुलाया है … वैसा ही वह चले,’’ और जब वह पद 24 में कहता है, ‘‘जो कोई जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में परमेश्वर के साथ रहे,’’ वह एक ईश्वरीय बुलाहट की ओर संकेत कर रहा है जिसके द्वारा हम मसीह में विश्वास करने के लिए खींचे गए थे। हम बहुधा अपने व्यवसाय का उल्लेख करने के लिए शब्द ‘‘बुलाहट’’ का उपयोग हैं: मेरी बुलाहट एक गृह-निर्माता बनने की है; मेरी बुलाहट एक सेल्स-मैन बनने की है; आदि। किन्तु ये वो तरीका नहीं है, जिसे पौलुस ने नौ में से आठ बार इसे इस अनुच्छेद में उपयोग किया है। एक बार वह शब्द ‘‘बुलाहट’’ का उपयोग, इस व्यावसायिक अर्थ में करता है, यथा, पद 20 में। अक्षरश: ये पद कहता है, ‘‘हर एक जन जिस ‘‘बुलाहट ’’ (‘‘दशा’’ नहीं) में बुलाया गया हो, उसी में रहे।’’ शब्द ‘‘बुलाहट’’ यहाँ जीवन में व्यवसाय या पद का संकेत करता है। और जिन्दगी के इस व्यवसाय या पद में, परमेश्वर की ओर से एक अन्य बुलाहट आती है। ये बुलाहट है, मसीह के साथ संगति में, ‘पवित्र आत्मा’ द्वारा खींचा जाना। अधिक सरल शब्दों में, परमेश्वर की वो बुलाहट जो एक व्यक्ति को उसके व्यवसाय में आती है, सुसमाचार के माध्यम से उस व्यक्ति का मन-परिवर्तन करने वाली परमेश्वर की सामर्थ है।

1 कुरिन्थियों 1 में ये सब स्पष्ट कर दिया गया है। अध्याय 1, पद 9 में, पौलुस कहता है, ‘‘परमेश्वर विश्वासयोग्य है ; जिस ने तुम को अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया है।’’ अतः सभी मसीही, और केवल मसीही इस अर्थ में बुलाये गए हैं। परमेश्वर की ओर से ये बुलाहट, एक ओर तो, हमारी व्यावसायिक ‘‘बुलाहट’’ से भिन्न है, और दूसरी ओर, पश्चाताप् करने की उस आम बुलाहट से भिन्न है जो सभी मनुष्यों को जाती है। जब यीशु ने मत्ती 22: 14 में कहा, ‘‘बुलाये हुए तो बहुत हैं पर चुने हुए थोड़े हैं,’’ उसने सुसमाचार के विश्वव्यापी बुलावे का संकेत दिया जो अनेक लोग सुनते हैं और अपने विनाश के लिए उसे अस्वीकार करते हैं।

किन्तु ये बुलावा वो नहीं था जो पौलुस के दिमाग में था। परमेश्वर का वो बुलावा जो हमें यीशु के साथ विश्वास करने वाली, प्रेममय संगति में ले आता है, एक सषक्त, प्रभावकारी बुलाहट है जो हमें ‘पुत्र’ के निकट खींचता है (यूहन्ना 6: 44, 65)। 1 कुरिन्थियों 1: 23, 24 में यह और स्पष्टतः देखा जाता है, जहाँ पौलुस कहता है, ‘‘परन्तु हम तो उस क्रूस पर चढ़ाये हुए मसीह का प्रचार करते हैं जो यहूदियों के निकट ठोकर का कारण, और अन्यजातियों के निकट मूर्खता है। परन्तु जो बुलाए हुए हैं क्या यहूदी, क्या यूनानी, उन के निकट मसीह परमेश्वर की सामर्थ, और परमेश्वर का ज्ञान है।’’ ये ‘‘बुलाए हुए’’ वे सभी नहीं हैं जो प्रचार सुनते हैं, अपितु वे जो इसे ज्ञान के रूप में ग्रहण करते हैं। हम, आम बुलाहट और प्रभावकारी बुलाहट में अन्तर दिखाने के लिए, आयतों की व्याख्या कर सकते हैं:- पौलुस कहता है, ‘‘हम हर एक को क्रूसधातित मसीह में विश्वास करने के लिए बुलाते हैं, किन्तु कई यहूदी इस बुलाहट को ठोकर का कारण होना पाते हैं, और कई अन्यजातीय इस बुलाहट को मूर्खता पाते हैं, लेकिन वे जो बुलाए हुए हैं (अर्थात्, सामर्थ के साथ और प्रभावकारी ढंग से मसीह की ओर खींचे गए हैं), सुसमाचार की बुलाहट को, परमेश्वर की सामर्थ और ज्ञान होना पाते हैं।’’

इसलिए, जब पौलुस 1 कुरिन्थियों 7: 17, 20 व 24 में कहता है, कि हम जिस दशा में बुलाये गये थे, उस में बने रहना और परमेश्वर के साथ जीवित रहना चाहिए, तो उसका अर्थ है: जिस दशा में आप मन-परिवर्तन के समय थे, जब आप को विश्वास करने में, ‘उसके’ पुत्र की प्रेममय संगति में, परमेश्वर द्वारा खींचा गया था, उस दशा में बने रहिये।

सिध्दान्त, यहूदियों और अन्यजातियों पर प्रयुक्त किया गया

अब हमें ये देखने की आवश्यकता है कि पौलुस ने इस सिद्धान्त को अपने समय में कैसे प्रयुक्त किया, और आज हमारे लिए इसका क्या अर्थ है। इस प्रक्रिया में, इसके लिए धर्म-विज्ञानी कारण भी उभरेगा। इस सिद्धान्त का पौलुस का प्रथम अनुप्रयोग, व्यवसाय के प्रति नहीं है, अपितु खतना और खतनारहित के प्रति। वह इसे इस प्रकार से प्रयुक्त करता है: यदि एक अन्यजातीय के रूप में आपका मन-परिवर्तन हुआ था, जो यहूदी बनने का प्रयास मत कीजिये। यदि एक यहूदी के रूप में आपका मन-परिवर्तन हुआ, तो अन्यजातीय बनने का प्रयास मत कीजिये। खतना और खतनारहित, बुनियादी रूप से इसी अर्थ में थे। इसके दूर तक जाने वाले सांस्कृतिक उलझाव हैं: यदि आप काले हैं, गोरा बनने का प्रयास मत कीजिये; यदि आप गोरे हैं, काले बनने का प्रयास मत कीजिये। यदि आप मैक्सिकोवासी हैं, तो अमेरिकी बनने का प्रयास मत कीजिये; यदि आप अमेरिकी हैं, तो मैक्सिकोवासी बनने का प्रयास मत कीजिये।

तब पौलुस इस चेतावनी का धर्म-विज्ञानी कारण देता है। पद 19 अक्षरश: कहता है, ‘‘खतना कुछ नहीं है और बिनाखतना कुछ नहीं है, वरन् परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना (सब कुछ है)।’’ ये सर्वाधिक आपत्तिजनक बात के बारे में था जो पौलुस एक यहूदी से कह सकता था: खतना कुछ नहीं है। और यदि हम इसका एक व्यापक सांस्कृतिक अनुप्रयोग समझें, तो यह हम सभों को ठेस पहुँचाता है। किन्तु ये सच है। ध्यान दीजिये कि हमारे आज के समय में प्रभावी तर्काधार के तुलना में, आपके सांस्कृतिक प्रभेदकों को बनाये रखने के लिए पौलुस के तर्क का आधार कितना मूलतः भिन्न है। हम कहते हैं, गोरा सुन्दर है, काला सुन्दर है, लाल सुन्दर है, पीला सुन्दर है; इसलिए संस्कृतियों को मत छेडि़ये। पौलुस कहता है, गोरा कुछ नहीं है, काला कुछ नहीं है, लाल कुछ नहीं है, पीला कुछ नहीं है, वरन् परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना सब कुछ है; इसलिए संस्कृतियों को छेड़ने का प्रयास मत कीजिये। आप जहाँ हैं वहीं रहिये और परमेश्वर की आज्ञा-पालन कीजिये। पौलुस एक बहुत गैर-रिवाज़ी विचारक है और, इसलिए सदाकाल की संगतता रखता है। वह मूलतः परमेश्वर-उन्मुख है। हर चीज, हर एक चीज, परमेश्वर की प्राथमिकता के सामने गिर जाती है।

इसे पूर्णरूपेण समझ लेना परम अनिवार्य है, ऐसा न हो कि हम एक नयी विधिवादिता उत्पन्न करें। पुरानी विधिवादिता ने कहा, ‘‘उद्धार पाने के लिए तुम्हारा खतना किया जाना आवश्यक है (प्रेरित 15: 1)। अनुमोदित किये जाने के लिए तुम्हें गोरा होना अवश्य है।’’ नयी विधिवादिता कहेगी, ‘‘यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो तो तुम्हारा खतना नहीं किया जा सकता। यदि तुम स्वीकार किया जाना चाहते हो तो तुम गोरे नहीं हो सकते।’’ हम पौलुस की शिक्षा को विकृत कर देंगे और उसके ध्येय से चूक जायेंगे यदि हम वाक्य, ‘‘जो खतनारहित बुलाया गया हो, वह खतना न कराए’’ (पद 18) को लें, और इसे सांस्कृतिक अनुकूलनों का एक परम निषेध बना दें। वे जो अन्य संस्कृतियों के पहलुओं को अपनाते हैं और अपनी स्वयँ की संस्कृति के पहलुओं को त्यागते हैं, उन सभी पर पौलुस एक छिपी हुई दण्डाज्ञा की उद्घोषणा नहीं कर रहा है। ये इस तथ्य से स्पष्ट है कि उसने तीमुथियुस का खतना करवाया (प्रेरित 16: 3), और उसके स्वयँ के बयान से कि वह सब मनुष्यों के लिए सब कुछ बन जाता है ताकि वह कुछ लोगों का उद्धार करा ले (1 कुरिन्थियों 9: 22)।

जो पौलुस कर रहा था वो ये दिखा रहा था कि किन्हीं भी सांस्कृतिक विभेदों की तुलना में, परमेश्वर के आदेशों के प्रति आज्ञाकारिता इतनी अधिक महत्वपूर्ण है, कि एक मसीही के लिए मात्र इन भिन्नताओं को बदलना कोई महत्व का नहीं होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, इस बात को तूल मत दीजिये कि आप खतना किये हुए हैं अथवा नहीं, या चाहे आप गोरे हैं अथवा काले, या लाल या स्वीडनवासी। किन्तु इसके बनिस्बत आज्ञाकारिता को अधिक तूल दीजिये; परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था का पालन करना, अपने जीवन का सम्पूर्ण लक्ष्य बनाइये। तब और केवल तब ही खतना (जैसा रोमियों 2: 25 में पौलुस ध्वनित करता है) और अन्य सांस्कृतिक विभेद, विश्वास की आज्ञाकारिता की अभिव्यक्ति के रूप में एक अधिक द्वितीयक और अमौलिक तरीके से, सुन्दर बन जाते हैं। एक शब्द में, सांस्कृतिक विभेदों के प्रति पौलुस के सिद्धान्त का अनुप्रयोग यह है: सांस्कृतिक भिन्नता की अपनी वर्तमान दशा के बारे में न कुढ़न रखिये न घमण्ड कीजिये; परमेश्वर के लिए वे कम महत्व के हैं, तुलना में कि क्या आप आपने स्वयँ को, प्राण व मन व शरीर को ‘उसकी’ आज्ञाओं का पालन करने में समर्पित कर रहे हैं, जो सब इस में पूरे होते हैं: ‘‘अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो’’ (रोमियों 13: 8-10; गलतियों 5: 14)।

सिद्धान्त, दासों और स्वतंत्र किये गए लोगों पर प्रयुक्त किया गया

तब पौलुस पद 21-23 में अपने सिद्धान्त को उस विषय में लागू करने की ओर मुड़ता है कि चाहे कोई जन एक दास है या दासत्व से छुड़ाया हुआ मनुष्य। पद 21 में अनुवाद की समस्या वास्तव में कठिन है। अधिकांश आधुनिक अनुवाद कहते हैं, ‘‘क्या तुम दास थे, जब तुम बुलाये गए ? कदापि ध्यान मत दो। किन्तु यदि तुम अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हो, उस अवसर का स्वयँ लाभ उठाओ’’ (आर.एस.वी.)। ये सही हो सकता है, किन्तु मैं इसे स्वीकार करने में कठिन पाता हूँ चूंकि जिस सिद्धान्त की वह व्याख्या कर रहा है वो पद 20 में इस रूप में व्यक्त किया गया है, ‘‘हर एक जन जिस दशा में बुलाया गया हो, उसी में रहे’’ और पद 24 में इस रूप में, ‘‘जो कोई जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में परमेश्वर के साथ रहे।’’ इन के बीच में ये कहना पूरी तरह विषय से बाहर लगता है कि, ‘‘यदि तू स्वतंत्र हो सके, तो ऐसा ही काम कर।’’ केवल यही नहीं, किन्तु ये अनुवाद, यूनानी भाषा के सभी शब्दों (‘‘भी’’ और ‘‘बेषक’’) के साथ न्याय नहीं करता, जो अन्य अनुवाद में आते हैं: ‘‘क्या तुम्हें एक दास के रूप में बुलाया गया था ? उसे तुम्हारी चिन्ता मत बनने दो; किन्तु, यदि तुम एक स्वतंत्र किये गए व्यक्ति भी बन सकते हो, बेषक उसका उपयोग करो (तुम्हारी वर्तमान स्थिति का)।’’ मुझे प्रतीत होता है, कि वास्तविक तुलना, इस प्रकार व्यक्त की जाना चाहिए: ‘‘तुम्हारे दासत्व को तुम्हें चिन्ताग्रस्त मत बनाने दो, अपितु इसकी बनिस्बत इसका उपयोग करो।’’ इसका उपयोग मसीह की आज्ञापालन करने में करो और इस प्रकार ‘‘हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के उपदेष को षोभा दो’’ (तीतुस 2: 10)।

मैं सोचता हूँ कि अंतिम विष्लेषण में यह सच है कि स्वतंत्रता स्वीकार करने का ये एक परम निषेध नहीं है, उससे अधिक नहीं जैसा पद 18, खतना का एक परम निषेध था। लेकिन यदि आप इसका अनुवाद स्वतंत्रता प्राप्त करने की एक आज्ञा के रूप में करते हैं, तो अनुच्छेद का वास्तविक बिन्दु धुंधला हो जाता है। बिन्दु ये है: जब आपको मसीह की संगति में बुलाया जाता है, आप आमूल रूप से मसीह-केन्द्रित प्राथमिकताओं का एक नया समूह प्राप्त करते हैं; इतना अधिक कि यदि आप एक दास हैं, इसे आपके कुढ़ने का कारण नहीं होना चाहिए। ‘‘क्या आप दास थे जब बुलाये गए ? कदापि ध्यान मत दो।’’ क्या आपकी नौकरी एक निम्नस्तरीय कार्य की है ? कोई बात नहीं। क्या ये ऐसा काम है जो अन्य व्यवसायों के जैसा उच्च सम्मानित नहीं किया जाता है ? कोई बात नहीं। यह वही बिन्दु है जो वह सांस्कृतिक भिन्नताओं के साथ स्पष्ट कर रहा था, जैसे कि खतना: क्या आप खतनारहित थे ? कदापि ध्यान न दो। क्या आप खतना किये हुए थे ? कदापि ध्यान न दो।

पौलुस ठीक वही धर्म-विज्ञानी कारण इस स्थिति के लिए दे सकता था, जैसा कि उसने पद 19 में किया। वह कह सकता था, ‘‘क्योंकि एक दास होना कुछ नहीं है, और एक स्वतंत्र किया गया व्यक्ति होना कुछ नहीं है, अपितु हर एक चीज में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना।’’ ये सच है। लेकिन पौलुस एक नये धर्म-विज्ञानी कारण के साथ हमारी समझ को गहरी करता है। कारण, कि एक व्यक्ति कह सकता है, ‘‘कोई बात नहीं,’’ भले ही वह एक दास है, ये है: पद 22, ‘‘क्योंकि जो दास की दशा में प्रभु में बुलाया गया है, वह प्रभु का स्वतंत्र किया हुआ है।’’ और कारण, कि एक व्यक्ति जो स्वतंत्र है, कह सकता है, ‘‘कोई बात नहीं,’’ उसी के समान है: ‘‘जो स्वतंत्रता की दशा में बुलाया गया है, वह मसीह का दास है।’’ मैं पौलुस द्वारा, उसके धर्म-विज्ञान को इस प्रकार रखते हुए कि इस प्रकार काम करे, देखना पसन्द करता हूँ। वह कह रहा है कि सुसमाचार में, निम्नस्तरीय पेशे में निराशा का एक विषनाशक है और उच्च-सम्मानित पेशे में घमण्ड के लिए एक विषनाशक। वह एक दास की ओर देखता है, जो हताषा महसूस कर सकता है, और कहता है, ‘‘मसीह में तुम एक स्वतंत्र व्यक्ति हो। तुम दाम देकर मोल लिए गए थे। किसी व्यक्ति को आपकी आत्मा को दास न बनाने दो। प्रभु में आनन्दित रहो और ‘उसमें’ आशा रखो और तुम सभी चिन्ताग्रस्त कुलीन लोगों से अधिक स्वतंत्र होगे।’’ तब वह कुलीन स्वतंत्र व्यक्ति की ओर देखता है, और कहता है, ‘‘घमण्डी मत बनो, क्योंकि मसीह में तुम एक दास हो। एक है जिसका तुम्हारे ऊपर अधिकार है, और तुम्हें नम्र और आज्ञाकारी होना है।’’

इसका निष्कर्ष ये है कि चाहे एक व्यक्ति दास हो या छुड़ाया हुआ, इसे उसकी निराशा या उसके घमण्ड का कारण नहीं होना चाहिए। उसे कहने के योग्य होना चाहिए, ‘‘कोई बात नहीं।’’ उसे चाहिये कि घमण्ड न करे यदि वह एक डाक्टर, या वकील या कार्यपालिक है, और उस व्यक्ति को स्वयँ पर तरस खाने वाला या निराश नहीं होना चाहिए यदि उसके पास एक ऐसा पेशा है जिसे समाज कम मान देता है। ‘‘अतः भाईयो,’’ पौलुस पद 24 में समापन करता है, ‘‘जो कोई जिस दशा में बुलाया गया हो, वह उसी में परमेश्वर के साथ रहे।’’ परमेश्वर के साथ ! वहाँ एक कठिन वाक्यांश है। जीवन में और सनातन जीवन में जो मायने रखता है वो है परमेश्वर के निकट रहना और ‘उसकी’ उपस्थिति का आनन्द उठाना। जो मायने नहीं रखता वो ये कि मनुष्य की नज़रों में चाहे हमारा पेशा उच्च है या निम्न। जो मायने रखता है वो ये कि क्या हम परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा प्रोत्साहित और नम्र किये जा रहे हैं।

पौलुस के सिद्धान्त के इन दो अनुप्रयोगों को एक साथ रखने पर, शिक्षा यह प्रतीत होती है: परमेश्वर के आदेशों का पालन करना (पद 19) और ‘उसकी’ उपस्थिति का आनन्द उठाना (पद 24), आपकी संस्कृति या आपके पेशे से इतने अधिक महत्व के हैं कि आपको आपकी स्थिति को बदलने की कोई बाध्यता महसूस नहीं करना चाहिए। आपको एक से, भय या निराशा के द्वारा प्रेरित नहीं होना चाहिए, न ही दूसरे की ओर धन या घमण्ड के द्वारा प्रलोभित होना चाहिए। आपको इस योग्य होना चाहिए कि अपनी स्थिति से कह सकें, ‘‘कोई बात नहीं। तुम मेरा जीवन नहीं हो। मेरा जीवन है परमेश्वर की आज्ञा पालन करना और ‘उसकी’ उपस्थिति का आनन्द लेना।’’

चार व्यावहारिक आशय

मुझे कुछ व्यावहारिक तात्पर्यों के साथ समापन करने दीजिये। पहिला, परमेश्वर इस बारे में बहुत अधिक रुचि रखता है कि जो पेशा आपके पास है उसे आप किस तरह करते हैं, तुलना में कि ‘वह’ उसमें रुचि रखे कि आपको एक नया काम मिले। हमारे पास इस मण्डली में नर्सें, शिक्षकगण, बढ़ई, कलाकार, सचिव, लेखाकार, वकील, रिसेप्षनिस्ट, लेखाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न प्रकार के सुधारक, इंजिनियर्स, कार्यालय अधीक्षक, परिवेषिकाएँ, प्लम्बर, सेल्समैन, सुरक्षा गार्ड, डाक्टर, सैन्य-अधिकारी, सलाहकार, बैंक के कर्मचारी, पुलिस-अधिकारी, साज-सज्जा करने वाले, संगीतज्ञ, आर्कीटेक्ट, पेन्टर, घर की सफाई करने वाले, स्कूल के प्रशासक, गृहणियाँ, मिशनरी, पासवान्, केबिनेट बनाने वाले और, और भी बहुत से लोग हैं। और जो हम सब को जो सुनने की आवश्यकता है वो ये कि परमेश्वर के हृदय पर जो सर्वाधिक रहता है वो ये नहीं कि हम एक से दूसरे पर जायें, अपितु इसमें कि क्या हम अपने वर्तमान काम में परमेश्वर की प्रतिज्ञा की गई उपस्थिति का आनन्द ले रहे हैं और जिस तरह हम हमारा काम करते हैं उसमें ‘उसके’ आदेशों का पालन कर रहे हैं।

दूसरा, जैसा कि हमने देखा, जब मन-परिवर्तन हुआ, आप जिस बुलाहट में थे, उसमें बने रहने की आज्ञा दृढ़ नहीं है। ये सभी व्यवसाय परिवर्तनों को निरस्त नहीं करती। हम इसे जानते हैं, न केवल उन अपवादों के कारण जिनकी अनुमति यहाँ 1 कुरिन्थियों 7 में (तुलना कीजिये, पद 15) पौलुस ने अपने सिद्धान्त के प्रति दी, किन्तु इसलिए भी कि धर्मशास्त्र ऐसे परिवर्तनों को चित्रित करता और अनुमोदित करता है। पुराना नियम में दासों को स्वतंत्र किये जाने का प्रावधान है, और एक चुंगी लेने वाले से भलिभांति परिचित हैं जो एक प्रचारक बना और मछुवारे जो सुसमाचार-प्रचारक बने। इसके अलावा, हम जानते हैं कि कुछ धंधे ऐसे हैं जिसमें बने रहकर आप परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन नहीं कर सकते: उदाहरणार्थ, वेश्या -वृत्ति, विभिन्न प्रकार के अशिष्ट और भ्रष्ट करने वाले मनोरंजन, और अन्य जिनमें आपको लोगों का दुरुपयोग करने को बाध्य किया जा सकता है।

पौलुस ये नहीं कह रहा है कि एक पेशेवर चोर या एक कुरिन्थी पंथ की वेश्या को उस बुलाहट में बने रहना चाहिए जिसमें वे बुलाये गये थे। कुरिन्थुस में प्रश्न था: जब हम मसीह के पास आते हैं, हमें किन चीजों का परित्याग करना चाहिए ? और पौलुस का उत्तर है: तुम्हें अपने पेशे का परित्याग करने की आवश्यकता नहीं है यदि तुम उसमें परमेश्वर के साथ बने रह सकते हो। उसकी रुचि पेशा-परिवर्तन की भत्र्सना करने में नहीं है, अपितु यह सिखाने में कि आप मसीह में पूरी सन्तुष्टि पा सकते हैं चाहे आपका पेशा कोई भी है। समकालीन पश्चिमी समाज में, ये एक बहुत ही अप्रचलित शिक्षा है, क्योंकि यह सांसारिक महत्वाकांक्षा की नस काटता है। हमें इस बारे में लम्बा और गहरा विचार करने की आवश्यकता है कि क्या सफलता के बारे में हम अपने बच्चों को जो बता रहे हैं वो बाइबल-शास्त्रीय है या मात्र अमेरिकी। हम सभी ‘‘सफलता-खोजियों’’ के लिए परमेश्वर का वचन ये है: अपनी सारी महत्वाकांक्षा और कर्मशक्ति को लो, जो आप अपनी उपरिमुखी गतिशीलता में उण्डेल रहे हैं और इसके बनिस्बत इसे परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द उपजाने में और धर्मशास्त्र में प्रगट की गई ‘उसकी’ मनसा की आज्ञाकारिता के लिए, एक आत्मिक जोश में उण्डेल दो।

तीसरा, आप नौजवान लोगों के लिए जिन्होंने अब तक किसी व्यवसाय में प्रवेश नहीं किया है, हमारे मूल-पाठ का आशय ये है: जब आप स्वयँ से ये प्रश्न पूछते हैं, ‘‘मेरे जीवन के लिए परमेश्वर की क्या मनसा है ?’’ आपको प्रतिध्वनित होने वाला उत्तर देना चाहिए: ‘‘उसकी इच्छा है कि मैं उसके साथ निकट की संगति बनाये रखूँ और उसकी आज्ञाओं का पालन करने में अपने आप को समर्पित कर दूँ।’’ आपके लिए परमेश्वर की प्रगट की गई मनसा (एकमात्र मनसा जिसका पालन करने के लिए आप जिम्मेदार हैं ) है, आपका पवित्रीकरण (1 थिस्सलुनिकियों 4: 3), आपका पेशा नहीं। अपने सम्पूर्ण हृदय से स्वयँ को उसे समर्पित कर दीजिये, और कोई भी पेशा (या नौकरी) ले लीजिये जो आप चाहते हैं। मुझे कोई संदेह नहीं है कि, यदि हमारे सभी नौजवान परमेश्वर के निकट रहने और धर्मशास्त्र के आदेशों का पालन करने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं, तो परमेश्वर उन्हें संसार में फैला देगा, ठीक वहाँ, जहाँ ‘वह’ अपने लिए उनका प्रभाव चाहता है।

चैथा, और अन्ततः, इस मूल-पाठ का आषय है कि वो पेशा जो अभी आपके पास है, जब तक आप उस में हैं, आपके लिए परमेश्वर का बांटा हुआ (या सौंपा गया) है। पद 17 कहता है, ‘‘जैसा प्रभु ने हर एक को बांटा है, … वैसा ही वह चले।’’ परमेश्वर प्रभुसत्ता-सम्पन्न है। ये कोई संयोग नहीं है कि आप वहाँ हैं जहाँ आप हैं। ‘‘मनुष्य मन में अपने मार्ग पर विचार करता है, परन्तु यहोवा ही उसके पैरों को स्थिर करता है’’ (नीतिवचन 16: 9)। ‘‘मनुष्य के मन में बहुत सी कल्पनाएं होती हैं, परन्तु जो युक्ति यहोवा करता है, वही स्थिर रहती है’’ (नीतिवचन 19: 21)। ‘‘चिट्ठी डाली जाती तो है, परन्तु उसका निकलना यहोवा की ओर से होता है’’ (नीतिवचन 16: 33)।

ईश्वरीय नियुक्ति के द्वारा आप हैं जहाँ आप हैं, भले ही आप वहाँ छल-कपट के द्वारा पहुँचे हों। आपका पेशा आपकी सेवकाई का बांटा गया कार्य है, ठीक उतना ही जितना कि मेरा है। उस पेशे की मांगों को आप कैसे पूरा करते हैं, वो आपके जीवन में उतना ही अत्यावश्यक है जितना आप यहाँ रविवार के दिन करते हैं। हम में से अनेकों के लिए इसका अर्थ, कल सुबह एक नया पृष्ठ पलटना, हो सकता है। इससे पूर्व कि हम काम में लगें, सब लोग प्रार्थना करें: ‘‘परमेश्वर, आज मेरे साथ जाइये और मुझे आपकी उपस्थिति के प्रति सचेत रखिये। जब मैं निराश होने लगूं तो मेरे हृदय को प्रोत्साहित कीजिये, और जब मैं घमण्ड करने लगंू मुझे नम्र कीजिये। हे परमेश्वर, आपकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए मुझे अनुग्रह दीजिये, जो मैं जानता हूँ कि सभी इस में समाहित हैं, मेरे पड़ोसी को अपने समान प्रेम करना। आमीन।’’