एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत करो

और दाऊद ने जान लिया कि शाऊल मेरे प्राण की खोज में निकला है। और दाऊद जीप नाम जंगल के होरेश नाम स्थान में था; कि शाऊल का पुत्र योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)। उस ने उस से कहा, मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा; और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है। तब उन दोनों ने यहोवा की शपथ खाकर आपस में वाचा बान्धी; तब दाऊद होरेश में रह गया, और योनातन अपने घर चला गया।

आज का संदेश, विगत रविवार को इफिसियों की पत्री से आरम्भ की गई श्रंखला में, एक क्रमभंग है। क्रमभंग का कारण वो गहरी क़ायलियत है जो हम ‘बैतलेहेम’ के सभी सदस्यों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के बारे में अनुभूति करते हैं कि किसी प्रकार के छोटे समूह का हिस्सा हों जहाँ आप विश्वास की लड़ाई (कुश्ती) को लड़ने के लिए एक दूसरे की सहायता करते हैं। अतः आज हमारी एकाग्रता, परमेश्वर में एक दूसरे के हाथों को मजबूत बनाने पर है।

सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है

हम विश्वास करते हैं कि सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है। हम विश्वास करते हैं कि सन्तों द्वारा धीरज से सहना, एक सामूहिक जिम्मेदारी है। उसी प्रेमी प्रभु ने जिसने कहा, ‘‘मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा (यूहन्ना 10: 27-28), यह भी कहा, ‘‘जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा (मत्ती 24: 13)।

दूसरे शब्दों में, जो परमेश्वर से जन्मे हैं वे यीशु के हाथ में सनातन के लिए सुरक्षित हैं। और वे जो परमेश्वर से जन्मे हैं उन्हें अन्त तक धीरज धरना चाहिए ताकि अन्ततः उद्धार पायें। और इस कारण प्रश्न उठता है:- परमेश्वर ने कैसे ठहराया है कि उसके लोगों को अन्त तक विश्वास में बनाये रखे ताकि ‘वह’ अचूक रूप से उस प्रतिज्ञा को पूरी कर सके कि वे सुरक्षित हैं और यह कि उनमें से एक भी नहीं खोयेगा?

आज प्रातः हम उस प्रश्न के उत्तर के एक कठिन भाग पर ध्यान एकाग्र कर रहे हैं:- यथा, परमेश्वर ने यह ठहराया है कि हम अन्य विश्वासियों से इस प्रकार सम्बन्धित रहें कि हम विश्वास की लड़ाई दिन-प्रतिदिन और अन्त तक सफलतापूर्वक लड़ने में, एक दूसरे की सहायता कर सकें। इस उत्तर का बाइबिल-शास्त्रीय आधार, इब्रानियों 3: 12-14 है,

हे भाइयो, चैकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए। बरन जिस दिन तक ‘‘आज’’ का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए। क्योंकि हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें।

परमेश्वर ने एक साधन/उपाय नियुक्त किया है जिसके द्वारा ‘वह’ हमें हमारे भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहने के योग्य बनायेगा। ये यह है:- उस प्रकार के मसीही सम्बन्ध विकसित कीजिये जिसमें आप, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को दृढ़ता से थामे रहने में और पाप की छल-पूर्णता से बचने में, एक दूसरे की सहायता करते हैं। दृढ़ता से खड़े रहने और परमेश्वर के सारे हथियार पहनने के लिए, दिन-प्रतिदिन एक दूसरे को प्रोत्साहित कीजिये।

मसीहियों के एक झुण्ड का एक हिस्सा बने रहिये

बच्चो, किशोरो, नौजवानो, कॉलेज के छात्रगणो, कुंवारो, विवाहित जोड़ो, विधवाओ, विधुरो! क्या आप मसीही मित्रों के एक झुण्ड का हिस्सा हैं जिसने आपस में प्रण किया है कि विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता करेंगे और एक दूसरे को पाप के धूर्त अनाधिकार-प्रवेश से बचायेंगे?

मैं यह नहीं कहता कि एक सुसंगठित छोटे समूह के न होने पर आप उद्धार नहीं पा सकते। लेकिन मैं अवश्य कहता हूँ, और मैं विश्वास करता हूँ कि यह परमेश्वर का वचन है, कि यदि आपके पास विश्वास में ऐसे अन्तरंग-साथियों का समूह नहीं है, तब आप, आपके संरक्षण और विश्वास में बने रहने के लिए परमेश्वर द्वारा नियुक्त किये गए एक साधन, की उपेक्षा कर रहे हैं। और अनुग्रह के साधन की उपेक्षा करना, आपके प्राण के लिए बहुत ख़तरनाक है।

अतः, आज प्रातः मेरा लक्ष्य बहुत सरल है:- आपको प्रेरित करूं कि मसीहियों के किसी छोटे झुण्ड का हिस्सा बन जाइये, जहाँ आप, दिन-प्रतिदिन विश्वास की लड़ाई लड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकें और प्रोत्साहित हो सकें। संदेश के अन्त में, आपके प्रार्थना-सहित विचार करने के लिए, ‘पीटर नेल्सन’ छोटे समूहों के एक तन्त्र को संक्षिप्त में प्रस्तुत करेंगे।

दाऊद के साथ योनातन की भेंट से चार शिक्षाएं

मूल-पाठ, 1 शमूएल 23: 15-18 है। विश्वास की सदा जारी रहने वाली लड़ाई में क्या होने की आवश्यकता है, यह इसका एक सरल और गम्भीर दृष्टान्त है।

शाऊल के मार्ग से दूर रहने का प्रयास करते हुए, दाऊद, यरूशलेम के दक्षिण में लगभग 30 मील की दूरी पर स्थित जीप के जंगल में, एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है। शाऊल, इस्राएल का राजा, दाऊद को मार डालना चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि सिंहासन के लिए वह एक ख़तरनाक प्रतिद्वन्दी है। योनातन, शाऊल का पुत्र, दाऊद से प्रीति रखता है और सुनता है कि वह जीप के जंगल में है, और परमेश्वर में उसके हाथ मजबूत करने के लिए वहाँ जाता है।

योनातन और दाऊद के बीच ये भेंट, विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता करने के बारे में कम से कम चार पाठ समझाता है।

1. मसीही सखापन (अन्तरंग-मैत्री) के लिए हर एक की आवश्यकता

सर्वाधिक गहरे सन्तगण और सबसे मजबूत अगुवों को, परमेश्वर में उनके हाथों को मजबूत करने के लिए साथियों की आवश्यकता होती है। दाऊद गहरा था, दाऊद मजबूत था, और दाऊद को योनातन की आवश्यकता थी।

मसीही अन्तरंग-मैत्री, मात्र नये रंगरूटों (नयी भर्ती) के लिए नहीं है। यह प्रत्येक विश्वासी के लिए है। अन्य मसीहियों की सेवकाई की आवश्यकता से बाहर, हम कभी भी विकास नहीं करते। यदि आप सोचते हैं कि विश्वास की लड़ाई में प्रतिदिन प्रोत्साहन की आवश्यकता से आप परे हैं, तब सम्भवतः आपका हृदय पाप के धूर्त छल-पूर्णता का शिकार बन चुका है।

दाऊद, परमेश्वर के मन के अनुसार पुरुष था। वह एक महान् योद्धा था। निस्संदेह, वह ताकत और बुद्धि और धर्मशास्त्रीय समझ में योनातन से श्रेष्ठ था। लेकिन पद 16 कहता है कि योनातन गया और उसका हाथ परमेश्वर में दृढ़ बनाया (मजबूत किया)।

कभी भी मत सोचिये कि एक व्यक्ति इतना मजबूत है कि उसे परमेश्वर में मजबूत किये जाने की आवश्यकता नहीं है। और कभी भी मत सोचिये कि कोई व्यक्ति आपसे इतना ऊपर है कि उसे बल देने के लिए आप परमेश्वर के औज़ार नहीं हो सकते।

’चार्ल्स् स्पर्जन’ ने अनेक मसीही अगुवों के लिए कहा, जब उसने लिखा,

कुछ साल पहिले, मैं आत्मा की भयावह उदासी का शिकार था। विभिन्न समस्याकारक घटनाएँ मेरे साथ घटित हुईं; मैं बीमार भी था, और मेरा दिल मेरे अन्दर डूब गया था। उन गहराईयों में से प्रभु को पुकारने को मैं बाध्य था। इससे पूर्व कि मैं आराम के लिए ’मैन्टोन’ जाऊं, मैंने शरीर में बहुत तकलीफ़ उठाई, लेकिन उससे भी अधिक प्राण में, क्योंकि मेरा आत्मा व्याकुल था। इस दबाव के नीचे, मैंने इन शब्दों में से एक उपदेश दिया, ‘‘हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?’’ उस मूल-पाठ में से प्रचार करने के लिए मैं उतना ही योग्य था जितना कि मैं कभी होने की आशा कर सकता हूँ ; अवश्य ही, मैं आशा करता हूँ कि मेरे कुछ भाई, उन हृदय तोड़नेवाले शब्दों में उतनी गहराई से प्रवेश कर सके होंगे। मैंने अपनी पूरी माप में, परमेश्वर द्वारा त्याग दी गई एक आत्मा के भय की अनुभूति की। अब, वो एक इच्छित अनुभव नहीं था। प्राण के उस ‘ग्रहण’ में से दोबारा गुजरने के विचार मात्र से ही मैं काँप जाता हूँ; मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं कभी भी उस तरह से दुःख न उठाऊं। (ऑटोबायोग्राफी, ग्रन्थ-2, पृ. 415)

मैंने इसका उल्लेख किया कि मूल बात पर वापिस आऊं कि बड़े से बड़ा सन्त/भक्त, सर्वाधिक पराक्रमी योद्धा भी, परमेश्वर में उनके हाथों को बल प्रदान किये जाने की आवश्यकता से ऊपर नहीं हैं। वास्तव में, उन पर शैतान के आक्रमण, उनकी आवश्यकता को और भी बड़ा बना सकते हैं। अतः मूल-पाठ में से हमारी पहिली शिक्षा है कि प्रतिदिन के प्रोत्साहन की आपकी आवश्यकता से, आप कभी भी अधिक बढ़ नहीं जाते। गहरे से गहरा सन्त और सर्वाधिक मजबूत अगुवों को, परमेश्वर में उनके हाथ मजबूत बनाये जाने के लिए साथियों की आवश्यकता होती है।

2. एक सचेतन प्रयास

दूसरी शिक्षा ये है कि परमेश्वर में एक व्यक्ति के हाथ मजबूत बनाये जाने में सचेतन प्रयास सम्मिलित रहता है।

ये अभिप्राय-सहित है। आप इसे हवा में नहीं करते; आप उठते हैं और होरेश को जाते हैं। पद 16:- ‘‘शाऊल का पुत्र योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)।

हमारी कलीसिया में ये कितना अन्तर ले आयेगा यदि, जब हम सब प्रातः उठें, हम किसी के हाथ को परमेश्वर में मजबूत बनाने की योजना बनायें! योनातन, दाऊद से होरेश में संयोगवश नहीं मिला (यद्यपि कभी-कभी वैसा होता है!)। उसने योजना बनाया कि उसके पास जाये और उसे बल प्रदान करे। मसीही परिपक्वता का ये चिन्ह है कि परमेश्वर में किसी का हाथ मजबूत बनाने के लिए आप अपने जीवन में ध्येय और अवसर निर्मित करते हैं। आज, आप किसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाने जा रहे हैं? इस सप्ताह? विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता इस तरह से करने के लिए क्या आपके पास प्रतिबद्ध (जान-बूझकर/साभिप्राय) साथियों का एक झुण्ड है?

मैं मैमवोर्स ऑफ सैमुएल परसी पढ़ रहा था, पासवानों के छोटे समूह में से एक, जिसने 1792 में प्रथम ‘बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी’ की स्थापना की। अन्य लोगों में ‘जॉन रेलैण्ड’ और ‘जॉन सुटक्लिफ’ और ‘एन्ड्रयू फुलर’ और ‘सैमुएल परसी’ और ‘विलियम कैरी’ थे। अन्य सब बातों से बढ़कर, हाल ही में एक चीज स्पष्ट दिखायी दी है:- इन पुरुषों ने एक दूसरे से प्रेम किया और फिर आपस में मिले और एक-दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनाने के लिए गम्भीरता से प्रतिबद्ध हुए। उन्होंने तब भी ऐसा किया जब वे एक दूसरे से बहुत दूर थे।

‘सैमुएल परसी’ ने ‘विलियम कैरी’ से, जब वह इंडिया के लिए जा चुका था, उसके पहिले पत्र के लिए एक साल से अधिक प्रतीक्षा की। लेकिन जब यह आया, ये है जो उसने ‘कैरी’ को लिखा,

जो विवरण आपने हमें दिया, उसने हमें नयी ताकत से प्रेरणा दी, और प्रभु में हमारे हाथों को बहुत मजबूत बनाया। हमने पढ़ा, और रोये, और स्तुति की, और प्रार्थना की। ओह, कौन किन्तु केवल मसीही अनुभूति करता है, ऐसे आनन्द जो हमारे प्रिय प्रभु यीशु मसीह के लिए मित्रता के साथ जुड़े हुए हैं? (पृ. 58)

क्या वो एक महान् वाक्यांश नहीं है:- ‘‘हमारे प्रिय प्रभु यीशु मसीह के लिए मित्रता।’’

जिस चीज के लिए मैं आज सुबह वास्तव में याचना कर रहा हूँ, वो है कि आप सभी यीशु मसीह के लिए मित्रता बनायें-- कि आपके पास, परस्पर सहमति के साथ, विश्वास में साथियों का एक झुण्ड हो, कि आप आशा और बल के लिए एक दूसरे को निरन्तर यीशु मसीह की ओर इंगित करते रहेंगे।

3. परमेश्वर में एक दूसरे को बल प्रदान करना

ये एक तीसरी शिक्षा है। वो ताकत जो हमें एक दूसरे को देना है, परमेश्वर में बल है, हमारे अपने में नहीं। पद 16 ये नहीं कहता कि योनातन होरेश तक चल कर गया कि दाऊद का आत्म-विश्वास मजबूत करे। उसने ऐसा नहीं किया। ये कहता है कि वह उठा और दाऊद के पास होरेश को गया, और परमेश्वर में उसके हाथ को मजबूत बनाया।

मसीही अन्तरंग-मैत्री और अन्य सभी सहारा-समूह व चिकित्सा-समूह और आत्म-सहायता-समूहों में यही अन्तर है। मसीही अन्तरंग-मैत्री का सम्पूर्ण सार है कि सहायता और बल के लिए एक-दूसरे को, मनुष्य नहीं, मसीह की ओर इंगित करें।

यहाँ एक प्रकार का विरोधाभासी कथन है:- एक ओर मैं आपसे कहता हूँ कि, मुझे आपकी आवश्यकता है। परमेश्वर ने आपको अनुग्रह के एक माध्यम के रूप में नियुक्त किया है कि अन्त तक धीरज धरे रहने में मेरी सहायता करें। किन्तु दूसरी ओर, मुझे अवश्य कहना चाहिए कि जिस तरह से आप वास्तव में मेरी सहायता कर सकते हैं, वो है कुछ कहने या करने के द्वारा जो मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहने को प्रेरित करे और आप पर नहीं।

ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ हम पुनः अपने सर्वाधिक सामान्य विषय के साथ हैं:- सब जो हम करते हैं, उसमें मूलभूत परमेश्वर-केन्द्रिता, यहाँ तक कि हमारी मानवीय एकता, हमारी अन्तरंग-मित्रता, हमारी मित्रता। अवश्य है कि यह मित्रता यीशु के लिए हो। प्रत्येक मसीही समूह जो विद्यमान है, अवश्य है कि एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनाने के लिए विद्यमान रहे और मनुष्य में नहीं। हमारे मूल-पाठ में वो तीसरी शिक्षा है:- ‘‘योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)।’’

4. एक-दूसरे को परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं स्मरण दिलाना

अन्त में, उसने यह कैसे किया? हम इसे कैसे करते हैं? योनातन ने कहा (पद 17):- ‘‘मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा; और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है।’’

योनातन कैसे जानता था कि दाऊद इस्राएल के ऊपर राजा होगा? वे गहरे मित्र थे और इसलिए ये कल्पना करना कठिन है कि दाऊद ने योनातन को अध्याय 16 की घटना के बारे में नहीं बताया होगा, जब शमूएल भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल के ऊपर राजा होने के लिए, एक बालक के रूप में दाऊद का अभिषेक किया था। अतः जिस तरीके से योनातन ने परमेश्वर में दाऊद का हाथ मजबूत किया, वो था उसे एक प्रतिज्ञा स्मरण दिलाकर जो परमेश्वर ने की थी (1 शमूएल 16: 12)। शाऊल, दाऊद के विरोध में सफल न हो सका क्योंकि परमेश्वर उसकी ओर था। अतः परमेश्वर की योजना में उसकी नियति स्मरण दिलाने के द्वारा, योनातन ने परमेश्वर में दाऊद का हाथ मजबूत किया।

और यही हमारे साथ है। एक-दूसरे को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बारे में स्मरण दिलाने के द्वारा जो विशेषतया एक दूसरे की आवश्यकताओं से मेल खाती हैं, हम परमेश्वर में एक-दूसरे के हाथों को मजबूत करते हैं।

आपको अपने मित्रों से क्या सुनने की आवश्यकता होती यदि आप ‘विलियम कैरी’ होते, घर से 15,000 मील दूर, लाखों अविश्वासियों से घिरे हुए, एक साथी के संग विश्वास की लड़ाई लड़ते हुए? आपको कुछ ऐसे की आवश्यकता होती, ‘सैमुएल परसी’ के शब्द, एक बहुमूल्य मित्र जो जानता था कि ‘कैरी’ का हाथ परमेश्वर में कैसे मजबूत करे। सुनिये कि अक्टूबर 4, 1794 के इस पत्र को, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ कैसे संतृप्त करती हैं।

भाई, मैं आपके बाजू में खड़े होने और उस आक्रमण के सभी चढ़ाव-उतार में प्रतिभागी होने को लालायित हूँ--एक आक्रमण जिसे और कुछ भी नहीं केवल कायरता असफल बना सकती है। हाँ, हमारे उद्धार का ‘कप्तान’, हमारे आगे चलता है। कभी-कभी वह अपनी उपस्थिति छुपा सकता है (किन्तु उसकी सामर्थ्य नहीं) कि हमारे आत्मिक शास्त्रों और स्वर्गिक हथियारों के साथ हमारी बहादुरी को परखे। ओह, मसीही योद्धा के लिए एक जीवित विश्वास क्या नहीं कर सकता! यह ‘छुड़ानेवाले’ को आकाशों में से ले आयेगा; ये उसे ऐसे सजायेगा जैसे कि लोहू में डुबोये गये वस्त्र से; ये उसे युद्ध में सामने खड़ा करेगा, और हमारे मुंह में एक नया गीत डालेगा-- ‘‘ये मेम्ने से लड़ेंगे; और मेम्ना उनपर जय पाएगा।’’ हाँ, ‘वह’ पाएगा--इससे पूर्व कि हम युद्ध-क्षेत्र में प्रवेश करें, विजय सुनिश्चित है; हमारे माथे को सुशोभित करने के लिए मुकुट पहिले ही से तैयार हैं, यहाँ तक कि वो महिमा का मुकुट जो मुर्झाता नहीं, और हमने पहिले ही प्रस्तावित कर लिया है कि इसके साथ क्या करें--हम इसे ‘जयवन्त’ के चरणों में डाल देंगे, और कहेंगे, ‘‘हमें नहीं, ओ प्रभु, हम पर नहीं, वरन् आपके नाम को महिमा दीजिये,’’ जबकि सम्पूर्ण स्वर्ग इस ‘कोरस’ में जुड़ जाता है, ‘‘मेम्ना ही योग्य है।’’ (मैमवॉर, पृ. 66)

ठीक है, कि हम सभी के पास उस प्रकार के शब्दों के साथ अपने साथियों को बल देने के लिए वरदान नहीं है। लेकिन यदि आप अपने दिमाग को परमेश्वर में वचन में तल्लीन कर दें और दिन-रात उसपर मनन करें, जैसा कि भजन 1 कहता है, तब आप जीवन के जल का एक सोता होंगे और अनेक लोगों के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनायेंगे। आज सुबह आपके लिए परमेश्वर की बुलाहट है:- आओ, हम एक-दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनायें! आमीन।

©2014 Desiring God Foundation. Used by Permission.

Permissions: You are permitted and encouraged to reproduce and distribute this material in its entirety or in unaltered excerpts, as long as you do not charge a fee. For Internet posting, please use only unaltered excerpts (not the content in its entirety) and provide a hyperlink to this page. Any exceptions to the above must be approved by Desiring God.

Please include the following statement on any distributed copy: By John Piper. ©2014 Desiring God Foundation. Website: desiringGod.org