तेरे वचन से अद्भुत बातें

मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं।

परमेश्वर द्वारा प्रकाश पाने की हमारी नितान्त आवश्यकता

विगत सप्ताह इस पद से हमने इन तीन बातों को देखा था - 1. परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातें हैं, 2. परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना कोई इन अद्भुत बातों की सच्चाई को नहीं देख सकता है, और 3. इसलिए जब हम बाइबल पढ़ते हैं तो हमें परमेश्वर से अलौकिक प्रकाशन के लिए प्रार्थना करना चाहिए।

अतः विग्त सप्ताह प्रार्थना पर ज़ोर था और कि आत्मिक बातों को देखने के लिए हमें परमेश्वर के अलौकिक प्रकाशन की नितान्त आवश्यकता है कि परमेश्वर की महिमा और मनोहरता और महानता को देख सकें। परमेश्वर द्वारा आपके हृदय की आंखों को खोले बिना आप परमेश्वर के वचन में बहुत-सी बातें देख सकते हैं। आप शब्दों को और व्याकरण को देख सकते हैं। आप तर्कों को देख सकते हैं। आप ऐतिहासिक तथ्यों को देख सकते हैं। आप लेखक के उद्देश्य को देख सकते हैं। आप कुछ मानवीय भावनाओं को देख सकते हैं। इन सब के लिए आवश्यकता नहीं है कि परमेश्वर हमारी आंखों को एक विशेष आत्मिक रीति से खोले।

परन्तु परमेश्वर की और उसके पुत्र की और संसार में उनके कार्य की उस आत्मिक मनोहरता को आप नहीं देख सकते हैं। आप यह नहीं देख सकते कि परमेश्वर सब बातों से बढ़कर अधिक चाहने योग्य है। एक दृष्टिहीन व्यक्ति सूर्य को नहीं देख सकता है, यद्यपि वह सूर्य के विषय बहुत-सी बातों को जान सकता है और किसी ऐसे व्यक्ति से जो सूर्य को देख सकता, खगोलशास्त्र में अधिक अंक पा सकता है। किसी के विषय जानना और किसी को देख कर जानना अगल-अलग में हैं। यह जानना कि शहद मीठा होता है और शहद का चखना दो अलग अलग बातें/ (चीजें) हैं।

परमेश्वर के विशेष, उद्धारक प्रकाशन के बिना हमारी दशा के विषय पौलुस द्वारा दिए उस सम्पूर्ण वर्णन को मैं एक बार फिर पढ़ना चाहूँगा। इफिसियों 4:17-18 में, पौलुस मानवीय दशा के उन पांच भंयकर लक्षणों का उल्लेख करता है जिनके कारण परमेश्वर को सहायता करना आवश्यक हो जाता है, यदि हमें आत्मिक सच्चाई देखना है। वह कहता है कि अन्यजाति (दूसरे शब्दों में कहें तो संसार के लोग, जिन्होंने मसीह के अनुग्रह का स्वाद नहीं चखा है) “अपने मन की अनर्थ रीति पर चलते हैं... क्योंकि उस अज्ञानता के कारण जो उनमें है, और उनके मन की कठोरता के कारण उनकी बुद्धि अन्धकारमय हो गई है, और वे परमेश्वर के जीवन से अलग हो गए हैं ।” यदि हम इसे पीछे की ओर पढ़ें तो हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर के महान अनुग्रह से अलग, हम सब में हृदय की वह कठोरता है जिससे अज्ञानता होती है, जिससे परमेश्वर से दूरी होती है और जो अन्धकार का कारण होता है जो कि मन की अनर्थ रीति पर चलने का कारण होता है।

अतः पिछले सप्ताह की मुख्य बात यह थी कि, यदि परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातों को देखने की हम कोई आशा करते हैं, तो हमें परमेश्वर द्वारा एक ऐसी ईश्वरीय, अलौकिक क्षमता दी जानी होगी जो कि स्वाभाविक रूप से हम में नहीं है। और इसलिए हमें इसके लिए प्रार्थना करनी होगी – “मेरी आँखें खोल दे।” और यदि हम परमेश्वर में जीवित बने रहेंगे और उसके प्रति अपने प्रेम में सच्चे और गम्भीर और तीव्र रहेंगे, तो हमें प्रतिदिन इस सामर्थ्य को पाने की लालसा रखनी होगी। अतः प्रार्थना करें, प्रार्थना करें, प्रार्थना करें। भजन 119 पढ़ें और देखें कि वह कितनी बार प्रार्थना करता है कि परमेश्वर की सहायता से परमेश्वर और उसके मार्गों को जाने।

(ध्यान देना) देखना बदलना है

परन्तु आज मैं कुछ और कहना चाहूँगा। परन्तु इससे पहले मैं यह सुनिश्चित करना चाहूँगा कि आप यह समझें कि यह महत्वपूर्ण क्यों है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यीशु के सदृश्य बनना परमेश्वर और उसके पुत्र और उनके वचनों और कार्यों की सुन्दरता, मूल्य तथा उत्कृष्टता को देखने के द्वारा होता है। 2 कुरिन्थियों 3:18 में पौलुस कहता है, “और हम सब खुले चेहरे से, प्रभु का तेज़ मानों दर्पण में देखते हुए, प्रभु अर्थात् आत्मा के द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश करके बदलते जाते हैं ।” देखना, बदलना है।

आचरण बदलने का यही एक मसीही तरीका है जिससे कि परमेश्वर को महिमा मिलें। हम बदलते हैं क्योंकि हमने एक श्रेष्ठतर सुन्दरता, महानता और श्रेष्ठता को देखा है। यदि आप मसीह के चेहरे को देखते और तब ‘खेल जगत’ या ‘मनोरमा’ जैसी पत्रिकाओं को देखते और मसीह की महानता तथा प्रेम की कहीं उच्च सुन्दरता तथा योग्यता को याद कर अभिभूत नहीं होते हैं, तो आप अपनी सोच में अभी भी कठोर और अन्धे और निरर्थक हैं। आपको यह पुकार उठना चाहिए, “मेरी आँखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ।” और आपके जीवन में यह दिखाई देगा। आपका धन- आपकी अभिलाषा, आपकी सुन्दरता जहाँ है – वहाँ पर आपका मन होगा - और आपकी शाम और आपका सप्ताहांत और आपका धन। हम परमेश्वर के वचन में परमेश्वर की महिमा देखने के द्वारा बदलते हैं। यदि इस संसार की अभिलाषा और महिमा से बढ़कर परमेश्वर आपके लिए अधिक महिमामय और चाहनीय नहीं है तो आपने उसे देखा ही नहीं है। 3 यूहन्ना 11 कहता है, “जो बुराई करता है उसने परमेश्वर को नहीं देखा ” (1 यूहन्ना 3:6 भी देखें)।

इसलिए यह सब महत्वपूर्ण है क्योंकि समस्त सच्चे परिवर्तित जीवन जो परमेश्वर को महिमा देते हैं और जो आत्मिक रीति से मूल्यवान हैं परमेश्वर के तेज़ की महिमा को देखने के कारण हैं, न कि आचरणों की एक धार्मिक सूचि बनाने और उनका पालन करने का प्रयास करने के द्वारा।

परमेश्वर अपने वचन के द्वारा मसीह की मनोहरता को प्रकट करता है

आज के बाइबल पाठ से हम इस मुख्य बात को देखते हैं, मसीह की मनोहरता और महानता को परमेश्वर केवल उन्हें दिखाता है जो परमेश्वर के वचन को पढ़ते हैं। इसी कारण सच्चा आत्मिक परिवर्तन बाइबल पठन और मनन और उसे याद कर लेने से होता है। इसलिए नहीं कि आपने पालन करने के लिए कुछ नियमों को सीखा। वरन् इसलिए कि बाइबल में ही परमेश्वर मसीह की मनोहरता तथा महानता को प्रकट करता है।

यहाँ पर मैं एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहूँगा । यदि आपने पिछले सप्ताह के सन्देश को पढ़ा कि परिवर्तित होने के लिए हमें परमेश्वर की महिमा के तेज़ को देखना होगा, परन्तु हम उसे अपनी मरी हुई दशा, और कठोरता और अन्धेपन के कारण नहीं देख सकते हैं, और कि इसलिए हमें परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वह हमें जिलाए और कोमल बनाए और हमारी आँखें खोले। ओैर माना कि आप यह निष्कर्ष निकालते हैं - ठीक तो मैं अब प्रार्थना का जीवन जीऊंगा और बाइबल पढ़ने, अध्ययन करने और उसे रटने में समय नहीं लगाऊँगा क्योंकि मानवीय रीति से देखना और समझना वह नहीं देख सकता जो देखा जाना चाहिए। यह जो मैंने कहा और जो बाइबल का यह पाठ कहता है उसका बिल्कुल गलत अर्थ निकालना होगा।

बात यह है कि जब हम बाइबल पर दृष्टि करते हैं तो परमेश्वर ही अपनी महिमा के तेज़ को देखने के लिए हमारी आँखें खोलता है। मान लीजिए आप ताजमहल की सुन्दरता को देखना चाहते, परन्तु आप दृष्टिहीन होते, आप मान लीजिए कि परमेश्वर आपसे कहता, मुझे पुकारो और मुझ से प्रार्थना करो और मैं ताजमहल की सुन्दरता देखने के लिए तुम्हारी आँखें खोल दूँगा। तो क्या आप प्रार्थना करने आगरा से चेन्नई जाते? या कि आप ताजमहल देखने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रदान प्रत्येक शक्ति और ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते कि ताजमहल तक जाएँ और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार अपनी दृष्टि उठाएँ? जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि वह आपको ताजमहल की सुन्दरता नहीं दिखाएगा यदि आप चेन्नई में ही बैठे रहेंगे, चाहे आप कितनी भी प्रार्थना कर लें।

दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने यह ठहराया है कि उसके आत्मा द्वारा आँखों के खोले जाने का कार्य हमेशा उसके वचन के द्वारा समझाए जाने के साथ ही हो। वह यह चाहता है कि हम उसके पुत्र की महिमा को देखें (और बदल जाएँ)। इसलिए जब हम उसके पुत्र को देखते हैं तो वह हमारी आँखें खोल देता है। सच्चे आत्मिक आत्म-प्रकाशन के परमेश्वर के तरीके में आत्मा का कार्य हमेशा एक साथ होता है। आत्मा का कार्य उसकी महिमा, सुन्दरता और महानता दिखाना है जिसे हमारा ज्ञान परमेश्वर के वचन में देखता है।

हमें यह सोचने की गलती नहीं करना है कि परमेश्वर के आत्मा से हमें कोई नई जानकारी पाने की आवश्यकता है। बाइबल में परमेश्वर के विषय हमारी समझ से परे हज़ारों गुना जानकारियाँ हैं। हमें आवश्यकता यह है कि हम अपने हृदय की आँखों से देखें ! बाइबल में मसीह के विषय जो हम देख सकते हैं उसके विषय आत्मा के द्वारा दी कोई भी जानकारी हमें रत्ती भर भी और आत्मिक या परमेश्वर की दृष्टि में अच्छा नहीं बनाएगी।

मान लीजिए कि आत्मा आपको यह नवीन सूचना देती है कि आपकी बाँझ मित्र गर्भवती होने जा रही है। आप उसे यह बताते हैं, और जब ऐसा हो जाता है तो आप और वह इस भविष्यवाणी तथा गर्भधारण के आश्चर्यकर्म पर खुशी से झूम उठते हैं। आत्मिक रूप से आपने क्या पाया? कुछ नहीं, यदि आप बाइबल न खोलें और हृदय की आँखों से न देखें - मसीह की उस महिमा और सुन्दरता के चित्रण को न देखें -यीशु नासरी क्रूस पर मरा और जी उठा कि पापियों का उद्धार करे और उस परमेश्वर की महिमा करे जिसने इस प्रकार की आशीष आपको दी। आश्चर्यकर्मों के कारण धार्मिक जोश स्वाभाविक बात है और आवश्यक नहीं कि उसमें कोई आत्मिक या अलौकिक बात हो। आत्मा के वरदान बहुमूल्य हैं, परन्तु पवित्र आत्मा द्वारा आँखों का खोला जाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है ताकि हम बाइबल में मसीह की महिमा के तेज़ को देख सकें।

हमें किसी नई सूचना की आवश्यकता नहीं है। वरन् नई आँखों की जिस से कि हमारे लिए परमेश्वर के वचन में जो प्रकाशित किया गया है, वह हम देख सकें। मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ!

प्रार्थना करके भटके नहीं

इस से मैं कुछ तात्पर्य बताना चाहूँगा।

पहला यह कि जब आप देखने के लिए आँखों के लिए प्रार्थना करते हैं, तो आपको अपने मस्तिष्क को शून्य नहीं करना है। यह न सोच लें कि प्रार्थना की अनिवार्यता का अर्थ परमेश्वर के वचन पर केन्द्रित विचार की निश्चितता है। जब आप मसीह की महिमा के तेज़ को देखने के लिए प्रार्थना करते हैं तो मानसिक रूप से भटक न जाएं, न ही तटस्थ हों। निष्क्रिय न बनें, ठहरे ही न रहें। यह एक बड़ी गलती है। मसीहियत के विषय जो एक अद्वितीय बात है वह यह है कि वह ऐतिहासिक है और सुस्पष्ट है। यीशु वास्तव में ऐतिहासिक है। परमेश्वर की योजना यह है कि इस मनुष्य यीशु की आत्मिक सुन्दरता तथा मूल्य जैसा कि बाइबल में प्रकाशित है, देखने के लिए वह हमारी आँखें खोल दे। यदि उसे देखने के लिए हम प्रार्थना करते और तब हमारा मन भटक जाता है, तो हम उसे नहीं देखेंगे। अतः एकाग्रचित्त हों और प्रार्थना करें।

तब क्या ?

1. प्रार्थना करें और पढें

परमेश्वर का वचन पढ़ें ! कैसा सौभाग्य! और कैसा दायित्व! और परमेश्वर को देखने की कैसी क्षमता! इफिसियों 3:3-4 देखिए। पौलुस कहता है, “अर्थात् वह रहस्य जो मुझ पर प्रकाशन के द्वारा प्रकट किया गया, जैसा मैं पहले ही संक्षेप में लिख चुका हूँ, जिसे पढ़कर तुम जान सकते हो कि मैं मसीह के रहस्य को कहाँ तक समझता हूँ।“ जिसे पढ़कर! परमेश्वर ने यह चाहा कि जीवन के सबसे बड़े रहस्य पढ़ने के द्वारा प्रकाशित हों।

तब अध्याय 1:18 से तुलना करें, जहाँ पौलुस कहता है, “मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, जिस से तुम जान सको कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है।” अतः इफिसियों 3:4 कहता है कि इस रहस्य को पढ़ने द्वारा जाना जाता है। और इफिसियों 1:18 कहता है कि जो हमें जानना चाहिए वह जानने के लिए प्रार्थना के उत्तर में परमेश्वर को हमारी आँखें खोलना होगा। हाँ, हमें प्रार्थना करना होगा। हां, परमेश्वर की सहायता के बिना हम अन्धे हैं। परन्तु इस सप्ताह मुख्य बात यह है कि, हमें पढ़ना चाहिए।

“जिसे पढ़कर तुम जान सकते हो कि मैं मसीह के रहस्य को कहाँ तक समझता हूँ।” प्रार्थना करना बाइबल पढ़ने का स्थान नहीं ले सकता है। प्रार्थना करना हमारे बाइबल पठ्न को देखने में बदल सकता है। परन्तु यदि हम बाइबल नहीं पढ़ेंगे, हम नहीं देखेंगे। पवित्र आत्मा इसलिए भेजा गया कि यीशु की महिमा करे, और यीशु की महिमा का चित्रण बाइबल में किया गया है। पढि़ए, खुश होईए कि आप पढ़ सकते हैं।

2. प्रार्थना करें और अध्ययन करें

2 तीमुथियुस 2:15, “अपने आपको परमेश्वर के ग्रहणयोग्य और ऐसा कार्य करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर जिस से लज्जित होना न पड़े, और जो सत्य के वचन को ठीक से काम में लाए।” परमेश्वर ने अपने बारे में एक पुस्तक हमें दी है, इसलिए नहीं कि हम इसे जैसा चाहे वैसा लापरवाही के साथ पढ़ें। पौलुस कहता है, “ऐसा कार्य करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर... जो सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाएँ।” यदि आप परमेश्वर के वचन से पूरा पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें वचन का अध्ययन करना होगा।

घड़ी का ‘पेन्डुलम’ झूलता रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रार्थना करें और बस प्रार्थना करें और अध्ययन जैसे आत्मिक कार्य पर निर्भर न करें । कुछ दूसरे लोग कहते हैं, अध्ययन करें और बस अध्ययन करें क्योंकि परमेश्वर प्रार्थना में आपको किसी वचन का अर्थ नहीं बताएगा। परन्तु बाइबल में इस प्रकार का कोई द्विभाजन नहीं है। हमें बाइबल का अध्ययन करना चाहिए और इसका ठीक ठीक उपयोग करना चाहिए, और हमें प्रार्थना करना चाहिए, अन्यथा हम बाइबल में एक आवश्यक बात को नहीं देख पाएँगे, अर्थात् मसीह के चेहरे पर परमेश्वर की महिमा के तेज़ को (2 कुरिन्थियों 4:4,6)।

बाइबल के एक महान अध्ययनकर्ता बेन्जामिन वारफील्ड ने 1911 में लिखा, “कभी कभी हमें ऐसा सुनने को मिलता है कि आपके पुस्तकों में दस घण्टे अध्ययन करने की अपेक्षा आपके घुटनों पर दस मिनिट रहना आपको परमेश्वर का एक अधिक सच्चा, गहरा और सक्रिय ज्ञान देगा। ‘क्या!’ सही उत्तर होगा, ‘तब आपके घुटनों पर आपकी पुस्तकों के साथ दस घण्टे?’” (“द रिलीजस लाईफ ऑफ थियोलॉजिकल स्टडीज”, नॉल, द प्रिन्सटन थियोलॉजी, (ग्रैन्ड रैपिड्स: बेकर बुक हाऊस, 1983) पृ. 263)। बाइबल का सन्देश यही है। हाँ, हमें प्रार्थना करना चाहिए। यदि परमेश्वर हमारी आँखें न खोले तो हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातें नहीं देख पाएँगे। परन्तु प्रार्थना करना अध्ययन करने का स्थान नहीं ले सकता है, क्योंकि पौलुस कहता है, “प्रयत्न कर -अध्ययन कर – कि सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाएँ।”

3. प्रार्थना करें और छान-बीन करें

बाइबल के प्रति हमारा रवैया एक लोभी व्यक्ति के समान होना चाहिए जो सोने की खदान में सोना ढूँढ़ता है,या एक मंगेतर के समान जिसने घर में कहीं अपनी सगाई की अंगूठी खो दी है। वह घर को छान मारती है।इसी रीति से हम बाइबल में परमेश्वर को खोजते हैं।

नीतिवचन 2:1-6 कहता है,

हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करें, ओर मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े, 2 ओर बुध्दि की बात ध्यान से सुने, और समझ की बात मन लगाकर सोचे; 3 और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारें, 4 और उसको चान्दी की नाई ढूँढे़, और गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगा ररें; 5 तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा। 6 क्योंकि बुध्दि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुँह से निकलती हैं।

ग्रहण करें, संचित करें, अपना मन लगाएँ, पुकारें, ज़ोर से चिल्लाएँ, चांदी के समान ढूँढें, गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगे रहें। यह बाइबल की छान-बीन करना है जिससे लाभ ही होगा। ऐसे ढूँढें जैसे कि कोई छिपा हुआ धन है, या चाँदी है। प्रार्थना अवश्य करें (जैसा कि पद 3 कहता है) परन्तु छान-बीन करना न छोड़ें। परमेश्वर उन्हें देने की प्रतिज्ञा करता है जो सम्पूर्ण हृदय से ढूंढते हैं (यिर्मयाह 29:13)।

4. प्रार्थना करें और विचार करें

2 तीमुथियुस 2:7 पर विचार करें, “जो मैं कहता हूँ उस पर ध्यान दें, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” इसका अर्थ क्या यह है कि पौलुस की शिक्षा को समझना सोच विचार का मात्र एक मानवीय तथा स्वाभाविक कार्य है? नहीं। इस पद के अन्त में लिखा है, “प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” आप इसे स्वयं के प्रयास से नहीं देख सकते हैं। आत्मिक समझ परमेश्वर का दान है।

परन्तु परमेश्वर ने आत्मिक प्रकाश का दान सोच-समझ के द्वारा देना नियुक्त किया है।“जो मैं कहता हूँ उस पर ध्यान दें, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” अतः मन लगा कर प्रार्थना करें और परमेश्वर से मांगें कि वह आपको वह प्रकाश दे जिसकी आपको आवश्यकता है। परन्तु ध्यान लगाना न छोड़ें। ध्यान दें और प्रार्थना करें। प्रार्थना करें और ध्यान दें। परमेश्वर ने इसी प्रकार ठहराया है। एक ऐतिहासिक मसीह। संरक्षण तथा प्रकाशन की एक पुस्तक। सभी यही कहती हैं - पढ़ें और अध्ययन करें, और छान-बीन करें और ध्यान दें या सोच विचार करें। परन्तु प्रार्थना के बिना सब कुछ व्यर्थ है। दोनों कार्य करना है, कोई भी एक नहीं।

5. प्रार्थना करें और बोलें

परमेश्वर चाहता है कि प्रचार करने, एक-दूसरे को शिक्षा देने, चेतावनी देने, उत्साहित करने और समझाने में कहे गए वचन लिखित वचन में बदलें। कुलुस्सियों 3:16 कहता है, “मसीह के वचन को अपने हृदय में बहुतायत से बसने दो, समस्त ज्ञान सहित एक दूसरे को शिक्षा और चेतावनी दो...।” हमारे लिए मसीह का वचन एक दूसरे के लिए हमारा वचन बन जाता है।

मैं उपदेश देता हूँ। यह परमेश्वर की इच्छा है कि उसका वचन बारम्बार नई रीति से सुनाया जाएँ। और आप एक दूसरे को परमेश्वर का वचन सुनाते हैं। कलीसिया में छोटे-छोटे झुण्ड होने का सही आधारभूत कारण है - कि हमारे द्वारा परमेश्वर के वचन को हमारे लिए परमेश्वर का वचन बनाएँ।

इसका क्या यह अर्थ है कि हम उन समयों में प्रार्थना न करें कि हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों को देखने के लिए किसी न किसी रीति से हृदय की आँखें खोल सकते हैं क्योंकि हम इसे दृढ़ निश्चयता या प्रेरक तर्कों या सुन्दर शब्दों में कह रहे हैं? पौलुस ऐसा नहीं सिखाते हैं। इसी पुस्तक में (कुलुस्सियों 1:9-10) में वह प्रार्थना करता है – प्रार्थना! – “हमने तुम्हारे लिए प्रार्थना और यह विनती करना नहीं छोड़ा कि तुम समस्त आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहचान में परिपूर्ण हो जाओ... परमेश्वर के ज्ञान में बढ़ते जाओ।”

जब मसीह का वचन हमारे मध्य बहुतायत से निवास करता है तब यदि परमेश्वर को जानना और आत्मिक ज्ञान एवं समझ पाना स्वतः ही होते, तो पौलुस को परमेश्वर से मन लगाकर यह प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं होती।

वचन और प्रार्थना साथ-साथ

हमने बार बार देखा कि यदि हमें परमेश्वर के वचन में परमेश्वर की महिमा देखना है तो प्रार्थना अपरिहार्य है।परन्तु हमने यह भी देखा कि परमेश्वर के वचन को पढ़ना, अध्ययन करना, छान-बीन करना, उस पर ध्यान देना और उसे सुनाना भी आवश्यक है। परमेश्वर ने यह ठहराया है कि उसके आत्मा द्वारा अन्तर्दृष्टि दिए जाने के कार्य के साथ हमेशा उसके वचन द्वारा समझ प्रदान किए जाने का कार्य भी है। वह यह चाहता है कि हम परमेश्वर की महिमा को देखें और कि हम में परमेश्वर की महिमा दिखाई भी दे। और इसलिए जब बाइबल में हम परमेश्वर की महिमा को देखते हैं तो वह हमारी आंखें खोलता है।

पढ़ें, अध्ययन करें, छान-बीन करें, सोचें, बोलें, सुनें, और प्रार्थना करें, “मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ”

(आगे अध्ययन के लिए देखें - लूका 24:45; प्रॆ.काम 16:14; 2 राजा 6:17; मत्ती 16:17; 11:2-6, 11:27)।

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