परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 2

परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 1, का पुनरवलोकन

कल, हिमशिला में एक मशाल लगाने और सभी लोगों के आनन्द के लिए, सब बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन फैलाने के एक प्रयास में, मैंने एक बात स्पष्ट करने का प्रयास किया कि हर एक काम जो परमेश्वर करता है, ‘वो’ अपने नाम की महिमा के लिए करता है। परमेश्वर, परमेश्वर को आवर्धित करता (या बड़ा बनाता) है। सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर के लिए सर्वाधिक धुन से भरा हृदय, परमेश्वर का हृदय है। ये मुख्य बिन्दु था। ‘पैशन 97’, जैसा कि मैं इसे समझता हूँ, परमेश्वर के लिए परमेश्वर की धुन के बारे में है। हर एक चीज जो ‘वह’ करता है, सृष्टि से लेकर समाप्ति तक, ‘वह’ अपने नाम की महिमा के प्रदर्शन और ऊंचा उठाये रखने के अभिप्राय से करता है।

परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता, प्रेमरहित नहीं है

कल का दूसरा बिन्दु ये था कि ये प्रेमरहित नहीं है। कारण कि परमेश्वर का स्वयँ को इस तरह ऊंचा उठाना, प्रेमरहित नहीं है, ये है, क्योंकि परमेश्वर को जानना और परमेश्वर की स्तुति में मगन रहना वो है जो मनुष्य के प्राण को सन्तुष्ट करता है। ‘‘तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा ; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है (भजन 16: 10)।’’ इसलिए यदि, परमेश्वर का स्वयँ को ऊंचा उठाना--इस अंश तक कि हम उसे वैसा देख सकें जैसा ‘वो’ है--हमारे प्राणों को सन्तुष्ट करता है, तब सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर ही वो हस्ति है जिसके लिए स्व उन्नयन सर्वोच्च सद्गुण और प्रेम का सत्व है।

आप इस बात में ‘उसकी’ नकल न करें। जिस अंश तक आप स्वयँ को दूसरे व्यक्ति के लिए ऊंचा उठाते हैं कि वो आप में आनन्द प्राप्त करे, उतना ही आप घृणाकारक है--प्रेममय नहीं--क्योंकि आप उनका ध्यान उस हस्ती से हटाते हैं जो उनके प्राणों को सन्तुष्ट कर सकता है। इसलिए, हम परमेश्वर की नकल ‘उसकी’ परमेश्वरता में, न करें। सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर ही एकमात्र अद्वितीय हस्ती है, जिसके लिए स्व-उन्नयन, प्रेम का सत्व और नींव है। इसे इसी प्रकार होना ही चाहिए यदि ‘वह’ परमेश्वर है।

हम चाह सकते हैं कि, दूसरों को केन्द्र बनाकर, ‘वह’ मानव-प्रेम जैसा प्रेम करे; लेकिन ‘वह’ ऐसा नहीं कर सकता और फिर भी परमेश्वर बना रह सकता है। ‘वह’ स्वयँ में असीम रूप से मूल्यवान् है। परमेश्वर के तुल्य दूसरा कोई नहीं है। इसीलिए ‘वह’--स्पष्टतया इसे रखें तो--किसी भी तरह आपकी आवश्यकता के बिना, भव्य व महिमामय व सर्व-समर्थ व आत्म-निर्भर होने से चिपका हुआ है। यही अनुग्रह की नींव है। यदि आप स्वयँ को अनुग्रह का केन्द्र बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह अनुग्रह बने रहना बन्द हो जायेगा। परमेश्वर-केन्द्रित अनुग्रह, बाइबल-शास्त्रीय अनुग्रह है।

मेरी प्रसन्नता इसमें नहीं है कि परमेश्वर मुझे विश्व का केन्द्र बनाये। मेरी प्रसन्नता, परमेश्वर का सदा के लिए, विश्व का केन्द्र बने रहने में है, और सनातनकाल के सब दिनों में ‘उसकी’ संगति में मुझे खींचने में, ‘उसे’ देखने में, ‘उसे’ जानने में, उस’ में आनन्दित होने में, ‘उसे’ संजोने में, ‘उस’ में सन्तुष्ट होने में है।

ये था कल का संदेश।

मानव-जाति के लिए परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता का तात्पर्य

अब आज ... यदि अब तक जो कहा है सच है, यदि यह बाइबल-शास्त्रीय है, तब आपके जीवन के लिए एक चैंकाने वाला तात्पर्य है। ये यह है: जब आप यहाँ से जाते हैं, और आप अपनी कलीसियाओं या अपने अहातों (कैम्पस)में वापिस जाते हैं, आपको जो करना चाहिए वो ये कि ... परमेश्वर में, आप जितना सम्भव हो सकते हैं उतना प्रसन्न रहने को अपना व्यवसाय बनायें। अतः अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम में, मेरी आपको बुलाहट ये है कि उस सारी शक्ति से जो परमेश्वर सामर्थ के साथ आपके अन्दर प्रेरणा देता है, आपके सुख की खोज करने को अपना सनातन व्यवसाय बना लें।

जीवन में मेरी समस्या, और जीवन में आपकी समस्या, ये नहीं है कि आप तब सुख की खोज कर रहे हैं जब आपको अवश्य है कि अपना कर्तव्य-कर्म कर रहे हों। आपकी समस्या का ये मेरा या परमेश्वर का या बाइबल का मूल्यांकन नहीं है। अपने जीवन-परिवर्तन करने वाले उपदेश में, जो ‘‘द वेट ऑफ ग्लोरी’’ कहलाता है, सी. एस. लेविस ने इसे एकदम ठीक रखा था, जब वे कहते हैं कि हमारी समस्या ये है कि हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं, ये नहीं कि हम अपने सुख की खोज बहुत उत्सुकता से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हम उन बच्चों के समान हैं जो गंदी बस्तियों में मिट्टी के खिलौनों के साथ समय गँवा रहे हैं क्योंकि हम कल्पना नहीं कर सकते कि समुद्र के किनारे एक छुट्टी का दिन कैसा होता है। हमारी समस्या ये है कि हम टिन की मूर्तियों को अपने से जकड़े हुए हैं जबकि सुनहरी वास्तविकता हमारे समक्ष खड़ी हुई है। हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं। संसार के साथ समस्या सुखवाद नहीं है; जो सच में सन्तुष्ट करने वाला है, उसके लिए प्रयास करने में सुखवाद असफल है। आज सुबह का मेरा बिन्दु यह है।

और उसका तात्पर्य, यदि ये सच है तो, यह है कि आपको सुबह उठना चाहिए और, ‘जॉर्ज मुलर’ के समान, इससे पूर्व कि वे बाहर जाते और कुछ भी करते, कहें, ‘‘अवश्य है कि मेरा हृदय परमेश्वर में खुश हो अन्यथा मैं किसी के लिए कोई काम का नहीं रहूंगा। मैं उनका उपयोग करूंगा और उनसे मेरी ललक और मेरे खालीपन को सन्तुष्ट करने का प्रयास करूंगा।’’ यदि आप एक प्रेम के व्यक्ति बनना चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोगों के लिए अपनी जिन्दगी उत्सर्ग करने के लिए आप स्वतंत्र हों, तो आपके लिए आवष्यक है कि परमेश्वर में आनन्दित रहने को अपना लक्ष्य बनायें। आज का संदेश यही है: हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं।

हमने ऐसे छोटे, क्षणिक, अपर्याप्त, असन्तोषजनक भोग-विलासों से समझौता कर लिया है कि आनन्द के लिए हमारी क्षमताएँ इस बिन्दु तक ऐसी मुरझा गई हैं कि हमने आनन्दरहित कर्तव्य-कर्म को प्रभावोत्पादकता का सत्व बना दिया है ताकि हमारे अपरिवर्तित हृदयों को ऐसा छिपा लें जो परमेश्वर द्वारा प्रेरित नहीं हो सकते। आप देखिये कि ये कितना पलायनवादी है ? मैं आज सुबह, ‘स्टोइक्स’ (एक दार्शनिक) और ‘इमानुएल कान्त’ के विरोध में एक मुहिम पर हूँ, ‘एनलाइटनमेन्ट’ (ज्ञानोदय) का दार्षनिक, जिसने कहा है कि जिस अंश तक आप किसी नैतिक कार्य में अपना लाभ खोजते हैं, उतना आप इसकी प्रभावोत्पादकता को धूमिल करते हैं। यह बाइबल में नहीं है … और ये हर जगह आराधना, प्रभावोत्पादकता, साहस, और परमेश्वर-केन्द्रता को नष्ट करता है। ये मनुष्य को ऊंचा उठाता है, वो धर्मात्मा जो बिना इस लक्ष्य के कि परमेश्वर उसके प्राण को सन्तुष्ट करे, अपने कर्तव्य-कर्म को पूरा करता है। इस पर छिः ! ऐसा हो कि ये हमारे हृदयों से सदा के लिए निकल जाये।

सुसमाचारीय वायुमण्डल में जो टंगा रहता है, मैं उसके विरूद्ध एक मुहिम पर हूँ। लगभग 25 साल पहिले मैंने ये मुहिम छेड़ी थी, और तब से, मेरे परिवार को इसमें उठाने, इस पर एक कलीसिया निर्मित करने, इस बारे में पुस्तकें लिखने का प्रयास करते हुए, इसे जीने का प्रयास करते हुए, मैं इसमें लगा हुआ हूँ। थोड़ी-थोड़ी आपत्तियाँ आती हैं। इसी तरह आप बढ़ते हैं। आप में से बहुतेरों ने मुझ से कहा है कि इस सम्मेलन के द्वारा आपकी दुनिया बदल रही है। प्रतिमान हिलाये जा रहे हैं। ‘कॉपरनिकस’ की क्रान्तियाँ क्षितिज में हैं, और यही वो तरीका है जिससे आप बदलना आरम्भ करते हैं। इसमें 15 साल लग सकते हैं ... आपत्ति पर आपत्ति। 1968 में मैंने डॉन फुलर, और सी. एस. लेविस, और जोनाथन एडवर्ड, और राजा दाऊद, और सन्त पौलुस, और यीशु मसीह की सहायता से इन कुछ चीजों को देखना आरम्भ किया। और जिस तरह से कि मेरा दिमाग काम करता है, ये है कि एक के बाद दूसरी आपत्ति आती है और मैं दुबक जाता हूँ, और तब मैं बाइबल में जाता हूँ और रोता और चिल्लाता और संघर्ष करता और पूछता और प्रार्थना करता और बात करता हूँ। तब थोड़ा-थोड़ा करके ये आपत्तियाँ, दर्शन को चमका देती हैं।

आपत्तियाँ

  1. क्या बाइबल वास्तव में सिखाती है कि आपको अपने सम्पूर्ण मन और दिमाग और प्राण और शक्ति से, आपके आनन्द की खोज में लगे रहना चाहिए। या ये ध्यान खींचने का, जॉन पाइपर की चतुर उपदेश-कला का तरीका मात्र है ?

  2. आत्म-त्याग के बारे में क्या ? क्या यीशु ने नहीं कहा, ‘‘यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे तो अपने आप का इन्कार करे ?’’

  3. क्या यह भावनाओं के ऊपर अत्याधिक बल नहीं देता ? क्या ऐसा नहीं है कि मसीहियत तत्वतः इच्छा की बात है, जिसके द्वारा हम वचनबद्ध होते और निर्णय लेते हैं ?

  4. परमेश्वर की सेवा, एक कर्तव्य-कर्म के रूप में करने की महान् विचारधारा का क्या होता है, जबकि ये कठिन है और आप इसे करना नहीं चाहते ?

  5. क्या ये मुझे--और परमेश्वर को नहीं--चीजों के केन्द्र में नहीं रखती ?

आपत्तियों का उत्तर देना

1. क्या बाइबल वास्तव में सिखाती है कि आपको आपके आनन्द की खोज में लगे रहना चाहिए ?

मेरा उत्तर है हाँ, और ये ऐसा, कम से कम चार तरह से करती है:

अ) आज्ञाओं से।

भजन 37: 4 पर विचार कीजिये - ‘‘यहोवा को अपने सुख का मूल जान।’’ ये एक सुझाव नहीं है, ये एक आज्ञा है। यदि आप विश्वास करते हैं कि ‘‘तू व्यभिचार न करना’’ कुछ ऐसा है जिसका आपको पालन करना है, तब आपको, ‘‘यहोवा को अपने सुख का मूल जान,’’ का भी पालन करना चाहिए।

अथवा भजन 32: 11, ‘‘हे धर्मियो, यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मनवालो आनन्द से जयजय- कार करो।’’ अथवा भजन 100, ‘‘आनन्द से यहोवा की आराधना (अंग्रेजी में:- सेवा) करो।’’ ये एक आज्ञा है: ‘‘आनन्द से यहोवा की आराधना (अंग्रेजी में:- सेवा) करो!’’ जिस अंश तक आप इसके प्रति उदासीन हैं कि चाहे आप प्रभु की सेवा आनन्द के साथ करते हैं अथवा नहीं, उतने अंश तक ही आप परमेश्वर के प्रति उदासीन हैं। ‘उसने’ आप से कहा है कि आपको ‘उसकी’ सेवा आनन्द के साथ करना आवष्यक है। अथवा फिलिप्पियों 4: 4, ‘‘प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूं आनन्दित रहो।’’

वे सम्पूर्ण बाइबल में हैं। हम आज्ञाओं की बात कर रहे हैं। ये पहिला तरीका है जिससे बाइबल इसे सिखाती है।

ब) आशंकाओं से।

‘जेरेमी टेलर’ ने एक बार कहा, ‘‘यदि हम आनन्दित न रहें तो परमेश्वर हमें भयंकर बातों की आशंका बताता है।’’ जब मैंने पहिली बार इसे सुना तो मैंने सोचा कि ये चतुराई है। ये चतुराई नहीं है ... ये व्यवस्थाविवरण से 28: 47 से एक उद्धरण है, और विनाशकारी है। ‘‘क्योंकि तू ने आनन्द और प्रसन्नता के साथ अपने परमेश्वर यहोवा की सेवा नहीं की, इस कारण तुझे अपने उन शत्रुओं की सेवा करनी पड़ेगी जिन्हें यहोवा तेरे विरुद्ध भेजेगा।’’ परमेश्वर भयंकर बातों की आशंका बताता है, यदि हम ‘उस’ में आनन्दित न रहें। क्या यह सुखवाद के लिए एक आज्ञा-पत्र है या कुछ और ? क्या यह आज्ञा-पत्र है, परमेश्वर में अपने आनन्द की खोज अपनी भरपूर शक्ति से करने को, अपनी जिन्दगी का उद्यम बनाने का ?

स) यीशु में, परमेश्वर वो सब जो आपके लिए है, उससे अनिवार्यतः सुन्तुष्ट हो जाने के रूप में उद्धार देने वाले विश्वास को प्रस्तुत करने के द्वारा।

उदाहरण के लिए, इब्रानियों 11: 6:- ‘‘विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।’’ यदि आपको परमेश्वर को प्रसन्न करना है तो आपके पास विश्वास होना चाहिए। विश्वास क्या है ? एक ऐसे के पास आना, जो ठीक-ठीक गहरे दृढ़-विश्वास के साथ है, कि आने के लिए वह मुझे प्रतिफल देने जा रहा है। यदि आप ये विश्वास नहीं करते, अथवा यदि आप परमेश्वर के पास किसी अन्य कारण से जाते हैं, आप परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करते।

अथवा, यूहन्ना 6: 35 लीजिये: यीशु कहते हैं, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी पियासा न होगा।’’ इस पद ध्यान दीजिये: जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी पियासा न होगा। विश्वास के बारे में इसका क्या अर्थ है ? विश्वास क्या है ? यूहन्ना के धर्मविज्ञान में, विश्वास, हमारे प्राणों की सन्तुष्टि के लिए यीशु के पास आना है, ऐसा कि कुछ और सन्तुष्ट नहीं कर सकता। वो है विश्वास। जिसके बारे में मैं बातें कर रहा हूँ, विश्वास उसके सिवाय और कुछ नहीं है। मैं आधार-भूत मसीहियत को ऐसी भाषा में खोल रहा हूँ जिससे आप कम परिचित हैं।

द) पाप को, परमेश्वर में आपके सुख की खोज को त्याग देने के पागलपन के रूप में, परिभाषित करने के द्वारा।

पाप, परमेश्वर में आपके सुख की खोज को त्याग देने का पागलपन है। मूल-पाठ ये है: यिर्मयाह 2: 12-13:- ‘‘हे आकाश, चकित हो, बहुत ही थरथरा और सुनसान हो जा, यहोवा की यह वाणी है। क्योंकि मेरी प्रजा ने दो बुराइयां की हैं: उन्हों ने मुझ बहते जल के सोते को त्याग दिया है, और, उन्हों ने हौद बना लिए, वरन ऐसे हौद जो टूट गए हैं, और जिन में जल नहीं रह सकता।’’ मुझसे कहिये, बुराई क्या है ? बुराई की परिभाषा, वो जो विश्व को विस्मित करती है, जो परमेश्वर के स्वर्गदूतों को कहने को मजबूर करती है, ‘‘नहीं ! ये नहीं हो सकता !’’ ... ये क्या है ? ये सर्व-सन्तुष्टि प्रदान करने वाले, जीवित जल के सोते, परमेश्वर की ओर देख रही है, और कह रही है ‘‘नहीं, धन्यवाद,’’ और टेलीविज़न, यौन, पार्टियों, नशाखोरी, पैसा, मान-सम्मान, उपनगर में एक मकान, एक छुट्टी, एक नये कम्प्यूटर कार्यक्रम की ओर मुड़ रही है, और कह रही है ‘‘हाँ!’’ ये पागलपन है ! और यिर्मयाह 2: 12 के अनुसार, ये सम्पूर्ण स्वर्ग को चकित करता है।

कम से कम, उन चार तरीकों से, बाइबल कहती है कि ‘जॉन पाइपर’ आज सुबह सच्चाई सिखा रहा है जब वह कहता है कि परमेश्वर में आपके सन्तोष की खोज को अपनी जिन्दगी अर्पित करो। अतः आपत्ति क्रमांक 1 निरस्त हो गई।

2. आत्म-त्याग के बारे में क्या ?

क्या यीशु ने मरकुस 8: 34 में नहीं कहा ‘‘जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले।’’ क्रूस वो स्थान है जहाँ आप मरते हैं, प्राणदण्ड का स्थान। ये एक चिड़चिड़ी सास, या एक खराब कक्ष-साथी, या आपके हड्डियों में का कोई रोग नहीं है। ये अपने आपे या स्वयँ की मृत्यु है। अतः ‘पाइपर’, एक आजीवन -व्यवसाय के रूप में, अपने प्राणों की सन्तुष्टि की खोज में लगे रहने के लिए, हमें बुलाने में, आप विधर्मी हैं। मैंने इसे महसूस किया ... और फिर मैंने शेष आयत को पढ़ा (कभी-कभी, संदर्भों को पढ़ना सहायता करता है): ‘‘क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।’’ यहाँ तर्क क्या है ? उन आयतों में यीशु का तर्क क्या है ?

तर्क ये है:

--‘‘ओ मेरे चेलो, अपना जीवन मत खो। अपना जीवन मत खो। अपना जीवन बचाओ ! अपना जीवन बचाओ !’’

--‘‘कैसे ? ... कैसे यीशु ?’’

--‘‘इसे खो दो।’’

--‘‘मैं इसे समझ नहीं पा रहा ... यीशु मैं इसे समझ नहीं पा रहा।’’

--‘‘मेरा अर्थ ये है-- मेरे चेलो, मेरे प्रियो--इस अर्थ में अपना जीवन खो दो कि मेरे सिवाय तुम सब कुछ खो दो। ‘जब तक गेहूँ का एक दाना भूमि में गिरकर मरता नहीं, ये अकेला रहता है। लेकिन यदि यह मरता है, ये बहुत फल लाता है।’ संसार के प्रति मर जाओ। मान-सम्मान के प्रति मर जाओ, धन के प्रति मर जाओ, पापमय यौन के प्रति मर जाओ, आगे बढ़ने के लिए छल के प्रति मर जाओ, अपने को प्रमाणित करने के लिए लोगों की आवश्यकता के लिए मर जाओ। मर जाओ, और मुझे पा लो।’’

मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। स्वयँ टिन का इन्कार करो कि सोना पाओ। एक चट्टान पर खड़े होने के लिए, स्वयँ रेत का इन्कार करो। वाइन पाने के लिए, स्वयँ खारे पानी का इन्कार करो। कोई चरम आत्म-त्याग नहीं है, न ही यीशु का कभी उस तरह का अर्थ था। मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं यीशु से यीशु के बारे में इस वचन में विश्वास करता हूँ: मत्ती 13: 44। ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के, जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।’’ आप उसे आत्म-त्याग कहते हैं ? हाँ ! उसने सब कुछ बेच दिया। उसने सब वस्तुओं को कूड़ा और रद्दी-माल समझा ताकि वह मसीह को प्राप्त करे।

अतः, हाँ ये आत्म-त्याग है; और नहीं, ये आत्म-त्याग नहीं है। एक स्वयँ (हमारा पुराना मनुष्यत्व) है जिसे क्रूसित होना चाहिए: वो स्वयँ जो संसार से प्रेम करता है। परन्तु नया मनुष्यत्व--वो मनुष्यत्व जो सब चीजों से ऊपर मसीह से प्रेम करता है और ‘उसमें’ अपना सन्तोष ढूँढता है--उस मनुष्यत्व को मत मारिये। वो नयी सृष्टि है। उस मनुष्यत्व को परमेश्वर से तृप्त कीजिये।

ओ, मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं उस आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ जिसे वो जवान शासक नहीं समझ सका, किन्तु जिसे यीशु ने उस क्षण सिखाया:

‘‘हे जवान पुरुष, जा, जो तेरे पास है सब कुछ बेच दे; और आकर मेरे पीछे हो ले और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा।’’ और वो ये नहीं करेगा। और यीशु ने चेलों से कहा, ‘‘एक धनवान के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना वास्तव में कठिन है ! स्वर्ग के राज्य में धनी लोगों के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है !’’ तब चेले नितान्त अचभ्भित हुए, और उन्होंने कहा, ‘‘तो फिर किसका उद्धार हो सकता है ?’’ और यीशु ने कहा, ‘‘मनुष्यों से यह असम्भव है। किसी के पास वो मन अपने आप से नहीं हो सकता, जिसके लिए मैं बुला रहा हूं। किन्तु परमेश्वर के साथ,’’ ‘वह’ कहता है, ‘‘सब कुछ सम्भव है।’’ और तब पतरस चिंघाड़ता है, ‘‘हम तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे हो लिए हैं। हमारे बारे में क्या ? हमने वास्तव में त्याग किया।’’ और यीशु प्रत्युत्तर देते हैं--काश मैं ‘उसकी’ आवाज का स्वर जान पाता--और कहा, ‘‘पतरस, कोई ऐसा नहीं है जिसने मेरी ख़ातिर अपना घर या माता या पिता या भाइयों या बहिनों या जमीन या बच्चे छोड़ दिया हो और जो सौ गुना माताएँ, बहिनें, भाईयों, जमीनें, और बच्चे इस जीवन में--क्लेशों के साथ--वापिस न पाये-- और आने वाले युग में , अनन्त जीवन। तुम किसी भी चीज का त्याग नहीं कर सकते जिसे तुम्हें हजार गुना लौट न दिया जायेगा। अपने ऊपर दया मत खाना जब मेरे लिए तुम्हारे सिर धड़ से काट कर अलग कर दिये जावें’’ (देखिये, मरकुस 10: 17-31)।

हाँ, मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं हर उस चीज का स्वयँ के लिए इन्कार करने में विश्वास करता हूँ जो, परमेश्वर में मेरी पूरी सन्तुष्टि के मार्ग में खड़ी होती है, और इसी तरह मैं समझता हूँ कि आत्म-त्याग से बाइबल का क्या अर्थ है। मैं विश्वास करता हूँ कि ‘डेविड लिविंगस्टोन’ और ‘हडसन टेलर’--ये महान् सुसमाचार-प्रचारक--अपनी जिन्दगियों के अन्त में आने पर और अपनी पत्नियों तथा स्वास्थ्य और सब कुछ खोकर सिवाय एक चीज के, कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्रों और सब जगह लोगों को कह सकें कि, ‘‘मैंने कभी कोई बलिदान नहीं किया,’’ पूर्णतया सही थे। ये सही है ! मैं जानता हूँ कि उनका क्या अर्थ है और आप जानते हैं कि उनका क्या अर्थ है। और मैं विश्वास करता हूँ कि ‘जिम एल्यिोट’ जिसने एक जवान पुरुष के रूप में अपना जीवन अर्पित कर दिया, ये कहने में पूर्णतया ठीक था कि, ‘‘वह मूर्ख नहीं है जो वो दे देता है जिसे वह रख नहीं सकता, ताकि वो प्राप्त करे जिसे वह खो नहीं सकता।’’ यही है जो मैं आत्म-त्याग के बारे में विश्वास करता हूँ। अतः आपत्ति क्रमांक 2 ख़ारिज हो गई।

3. क्या आप मनोभाव/भावनाओं के ऊपर अत्याधिक बल नहीं दे रहे हैं ?

क्या मसीहियत, मूलतः निर्णय नहीं है ? इच्छा की वचनबद्धता ? क्या मनोभाव मात्र, केक के ऊपर बाद में आने वाली, वैकल्पिक, आइसिंग नहीं हैं ? ‘पाइपर’, मैं सोचता हूँ, मसीहियत के बारे में आपकी बातचीत करने का तरीका, मनोभावों को एक गैर-बाइबल-शास्त्रीय श्रेष्ठता के स्थान तक ऊंचा उठाता है।

लेकिन तब मैं बाइबल पढ़ता हूँ--जब आप एक तर्क-वितर्क में हों, बाइबल पढ़ना सहायता करता है--और मैंने देखा किः

  • हमें आनन्द की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: फिलिप्पियों 4: 4, ‘‘प्रभु में आनन्दित रहो।’’

  • हमें आशा की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: भजन 42: 5, ‘‘परमेश्वर पर आशा लगाये रह।’’

  • हमें भय की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: लूका 12: 5, ‘‘उसी से डरो जो प्राण और शरीर दोनों, नरक में डाल सकता है।’’

  • हमें शान्ति की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: ‘‘मसीह की शान्ति तुम्हारे हृदयों में राज्य करे’’ (कुलुस्सियों 3: 15)।

  • हमें जोश की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: रोमियों 12: 11, ‘‘आत्मिक उन्माद में भरे रहो (अक्षरश ‘उबलो’) प्रयत्न करने में आलसी न हो।’’ ये वैकल्पिक नहीं है, ये केक की आइसिंग करना नहीं है। ये एक आज्ञा है ! ‘‘प्रयत्न करने में आलसी न हो।’’

  • हमें दुःख की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: रोमियों 12: 15, ‘‘रोनेवालों के साथ रोओ।’’ आपके पास कोई विकल्प नहीं है। आपको रोना ही होगा, जो रोते हैं उनके साथ आपको रोने की अनुभूति करना ही होगा।

  • हमें इच्छा की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: 1 पतरस 2: 2, ‘‘वचन के निर्मल आत्मिक दूध की लालसा रो।’’ ये एक विकल्प नहीं है। आप नहीं कह सकते कि, ‘‘ठीक है, लेकिन मैं पर्याप्त इच्छा जगा नहीं सकता, अतः मैं इसका पालन कैसे कर सकता हूँ ? ये वास्तव में एक आज्ञा नहीं हो सकती।’’ गलत ! हाँ, आप अपनी इच्छा से इन अनुभूतियों को चालू या बन्द नहीं कर सकते। नहीं, वे अब भी जिम्मेदारियाँ हैं। वहाँ हमारी निराशाजनक स्थिति पायी जाती है, जिसके बारे में हमने विगत रात्रि सुना था।
    हर एक चीज जो मैं आपसे कह रहा हूँ कि आपको अभी करने की आज्ञा दी जाती है, उसे आप, इच्छा-शक्ति या निर्णय, या वचनबद्धता के द्वारा, इसी क्षण में नहीं कर सकते हैं। आप इसे केवल चमत्कार के द्वारा कर सकते हैं। क्या आप निराश नहीं हैं ? क्या ये एक निराशाजनक चीज नहीं है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के द्वारा आपको वो करने को कहा जावे जो आप नहीं कर सकते ? यदि आपके हृदय ठीक थे आप उन्हें करते। हम भ्रष्ट हो गये हैं और हमें आज्ञा दी गई है कि कोमल-हृदयता की अनुभूति करें: ‘‘कोमल-हृदय होकर, एक-दूसरे पर दया करो।’’ आप मात्र ये नहीं कह सकते कि क्षमा का अर्थ है, ‘‘आई एम सॉरी’’ कह देना। आपको इसकी अनुभूति करना ही होगी।

  • हमें कृतज्ञता की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: एक बच्चे को लीजिये, जिसे क्रिसमस की सुबह दादी से एक उपहार मिलता है ... और ये काले मोजे/जुराबें हैं ! ईक ! काले मोजे तो छोड़ दीजिये, कोई भी बच्चा क्रिसमस के लिए मोजे नहीं पाना चाहता। और तब आप कहते हैं, ‘‘अपनी दादी को धन्यवाद कहो।’’ और फिर वो बच्चा कहता है, ‘‘मोजों के लिए धन्यवाद।’’ ये वो नहीं है जिसके बारे में बाइबल बता रही है। बच्चा उसे अपनी इच्छा-शक्ति से कर सकता है। किन्तु वह उन मोजों के लिए इच्छा-शक्ति से कृतज्ञता का बोध नहीं कर सकता। न ही आप अपनी इच्छा-शक्ति के द्वारा, इफिसियों 5: 20 की आज्ञा कि ‘‘सदा सब बातों के लिए ... धन्यवाद करते रहो,’’ के अनुरूप परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति कर सकते हैं। तब ठीक है, हम तो निरुपाय हैं, जब तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य न करे।

आपत्ति क्रमांक 3 ? मैं इसे मोल नहीं लेता। मैं विश्वास नहीं करता कि मैं अनुरागों और अनुभूतियों और मनोभावों को उससे ऊंचा उठा रहा हूँ जितना कि बाइबल उठाती है। मैं सोचता हूँ कि मैं उन्हें वहाँ से पुनः-स्थापित कर रहा हूँ जहाँ से एक निर्णयात्मक, प्रतिबद्धता से लदी, इच्छा-शक्ति, हम-इसे-कर-सकते हैं अमेरिकी धर्म ने, उन्हें गिरा दिया, क्योंकि वे हमारे नियंत्रण से बाहर हैं।

4. परमेश्वर की सेवा करने के महान् दर्शन के बारे में क्या ?

क्या परमेश्वर की सेवा करना एक कर्तव्य-कर्म नहीं है ? ‘पाइपर’, मसीहियत के बारे में आपकी बातचीत के तरीके में तो ये सेवा ध्वनित नहीं होती। ये बिल्कुल भी उस सेवा के समान ध्वनित नहीं होती--कर्तव्यपरायण, परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने की चुनौती तक उठने वाली सेवा--जबकि यह कठिन है।

इसका प्रत्युत्तर देना मैंने अब सीख लिया है, ‘‘आइये हम कुछ मूल-पाठों को देखें जो सेवकपन के रूपक को आकार देते हैं।’’ परमेश्वर के प्रति आपके सम्बन्ध के बारे में रूपक-अलंकार, चाहे ये एक सेवक के रूप में है, या पुत्र या पुत्री, या मित्र, सभी अपने में अवयव रखते हैं जिन्हें, यदि आपने प्रबलित किया है, असत्य होंगे। वे अपने में वे अवयव भी रखते हैं जिन्हें, यदि आपने प्रबलित किया, सत्य होंगे। अब, सेवकपन के अनुरूपता में, क्या असत्य है और क्या सत्य है ?

मूल-पाठ जो इन दो को पृथक करने में आपकी सहायता करते हैं ताकि जब आप सेवा करते हैं आप निन्दा न करें ; वे मूल-पाठ हैं, जैसे कि प्रेरित 17: 25:-‘‘परमेश्वर, न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और श्वास और सब कुछ देता है।’’ साथियो, परमेश्वर सेवा नहीं लेता। सावधान रहिये। ‘वह’ ऐसी सेवा नहीं लेता मानो कि ‘उसे’ आपकी या आपकी सेवा की आवश्यकता थी। ‘उसे’ आवश्यकता नहीं है। अथवा मरकुस 10: 45 के समान एक मूल-पाठ लीजिये: ‘‘मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे।’’ ‘वह’ सेवा करवाने नहीं आया। सावधान् ! सावधान् ! यदि आप उसकी सेवा करने का जिम्मा उठाते हैं तो आप ‘उसके’ उद्देश्य को लांघते हैं ! यद्यपि ये व्याकुल करने वाला है, क्या ऐसा नहीं है। पौलुस ने लगभग सभी पत्रियों में स्वयँ को प्रभु का सेवक कहा है। और यहाँ प्रेरित 17: 25 और मरकुस 10: 45 में, ये कहता है कि परमेश्वर की सेवा नहीं की जाती और ये कि मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए। एक प्रकार की सेवा अवश्य होगी जो बुरी है और एक प्रकार की सेवा जो भली है। भली सेवा क्या है ?

भली या उत्तम सेवा 1 पतरस 4: 11 है:- ‘‘यदि कोई सेवा करे, तो उस शक्ति से करे जो परमेश्वर देता है; जिस से सब बातों में परमेश्वर की महिमा हो।’’ परमेश्वर की सेवा मानवीय हाथों से नहीं होती, मानो ‘उसे’ किसी चीज की आवश्यकता थी। आराधना करने, पर्चे टाइप करने, सम्भाषणों को सुनने, एक कार चलाने, बच्चे की नेपकिन बदलने, एक उपदेश का

प्रचार करने के लिए, आपको एक तरीका खोजना होगा, इस तरह कि आप सदैव प्राप्त करने वाले हैं। क्योंकि देने वाले को महिमा प्राप्त होती है, और पाने वाले को आनन्द प्राप्त होता है। जिस भी समय हम प्रेरित 17: 25 को लांघते हैं-- ‘‘परमेश्वर, मनुष्यों के हाथों की सेवा नहीं लेता (जैसे की मानो ‘वह’ एक प्राप्त करने वाला हो,) मानो ‘उसे’ किसी वस्तु का प्रयोजन हो।’’--हम निन्दा करते हैं।

इस सम्मेलन के अगुओं के समूह को, सेवा के बारे में, मत्ती 6: 24 से, मैंने कल एक दृष्टान्त दिया था, जहाँ ये कहता है, ‘‘तुम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते, या तो तुम एक से घृणा करोगे और दूसरे से प्रेम रखोगे। या तुम एक के प्रति भक्त रहोगे और दूसरे को तुच्छ जानोगे। तुम परमेश्वर और पैसा दोनों की सेवा नहीं कर सकते।’’ तो यहाँ हम सेवा की बात कर रहे हैं। आप पैसे की सेवा कैसे करते हैं ? आप पैसे की सेवा, पैसे की आवश्यकताओं को पूरी करते हुए नहीं करते ? अपनी सारी ऊर्जा और समय और प्रयत्न से, अपनी जिन्दगी को निरन्तरता में ढालते हुए, आप पैसे की सेवा करते हैं, ताकि पैसे से लाभ पायें। आपका दिमाग इस बात से घूमता रहता है कि कैसे चतुर निवेश किया जावे, कैसे सर्वोत्तम लेन-देन ढूँढा जावे, जहाँ निम्न है वहाँ कैसे निवेश किया जावे ताकि ये ऊंचा जाये, और आप इसमें लिप्त रहते हैं कि रुपया से कैसे लाभ पायें, क्योंकि रुपया आपका स्रोत है।

जिस तरीके से आप पैसे की सेवा करते हैं यदि उसके बारे में ये सच है, तो आप परमेश्वर की सेवा किस तरह करते हैं ? ये बिल्कुल समान है: आप अपने आप को विशिष्ट मुद्रा में लाते हैं, अपनी जिन्दगी को युक्ति-चालन में लाते हैं, और शक्ति व यत्न व समय व सृजनात्मकता अर्पित करते हैं ताकि स्वयँ को परमेश्वर की आशीष के निरन्तर झरने के नीचे ले आयें, जिससे कि ‘वह’ स्रोत बना रहे और आप एक खाली प्राप्तकर्ता बने रहें। आप लाभभोगी बने रहते हैं, ‘वह’ हितकारी बना रहता है; आप भूखे बने रहते हैं, ‘वह’ रोटी बना रहता है; आप प्यासे बने रहते हैं, ‘वह’ जल बना रहता है। आप कभी भी उलट-भूमिका का, परमेश्वर के ऊपर निन्दा लाने वाला काम न करें। हमें सेवा करने का एक मार्ग इस तरह का खोजना होगा जो उस ताकत में है जिसकी आपूर्ति परमेश्वर करता है। जब मैं सेवा कर रहा हूँ, मैं प्राप्त करने वाले छोर पर हूँ। अन्यथा मैं परमेश्वर को लाभभोगी की स्थिति में रखता हूँ ; मैं उसका हितकारी बन जाता हूँ, और अब मैं परमेश्वर हूँ। और, संसार में ऐसे बहुतेरे धर्म हैं। अतः आपत्ति 4 निरस्त होती है।

5. क्या आप स्वयँ को केन्द्रीय नहीं बना रहे हैं ?

‘‘आप, आपके आनन्द और आपके सुख की खोज में लगे रहने की बात करते हैं। आप, कर्तव्य-कर्म के बारे में ऐसे बात करते हैं मानो जो हमने सदा से जाना है, उससे कुछ अलग है, और आप कहते हैं कि हमें सेवा के बारे में सावधान रहना अवश्य है। ये मुझे ऐसा ध्वनित होता है जैसे मात्र स्वयँ को केन्द्रीय बनाने के लिए आप बाइबल-शास्त्रीय भाषा को युक्ति- चालन से मोड़ रहे हैं।’’ ये सबसे विध्वंसकारी आलोचना होगी, क्या नहीं ?

मेरा उत्तर यहाँ है: दिसम्बर 21 को मेरे विवाहित जीवन के 28 साल हो जायेंगे। मैं ‘नोएल’ से बहुत प्रेम करता हूँ। हम एक-साथ बहुत से समयों से गुजरे हैं, वास्तविक कठिन समयों और वास्तविक अच्छे समयों से। हमने अपने किशोरवय के बच्चों को, किशोरावस्था के अविश्वसनीय रूप से कठिन वर्षों में से जाते देखा है। मैं बहुत सरलता से रो देता हूँ जब मैं अपने बेटों और अपनी छोटी लड़की के बारे में सोचता हूँ। मान लीजिये कि 21 दिसम्बर को मैं लम्बी डंडी वाले 28 लाल गुलाबों को मेरी पीठ के पीछे छुपा कर लाया और द्वार पर लगी घंटी बजाया। ‘नोएल’ दरवाजे पर आती है, और इस बारे में थोड़ी विचलित दिखती है कि मैं अपने ही घर की घंटी क्यों बजा रहा था, और मैं गुलाबों को बाहर कालता हूँ और कहता हूँ, ‘‘हैप्पी एनिवर्सरी, नोएल।’’ और वो कहती है, ‘‘जॉनी, वे सुन्दर हैं ! लेकिन तुम ?’’ और मैं कहता हूँ, ‘‘ये मेरा कर्तव्य-कर्म (ड्यूटी) है।’’

गलत उत्तर। आइये, हम इसे वापिस पलटायें।

(डिंग-डांग)
--‘‘हैप्पी एनिवर्सरी, नोएल।’’
--‘ जॉनी, वे सुन्दर हैं ! लेकिन तुम क्यों ?’’
--‘‘और कोई चीज मुझे इससे अधिक खुश नहीं करती जितना कि तुम्हारे लिए गुलाब खरीदना। वास्तव में, तुम जाकर क्यों नहीं कपड़े बदलती, क्योंकि मैंने एक, बच्चों की देखभाल करने वाली, का प्रबंध किया है और आज रात्रि हम जाकर कुछ विशेष करेंगे, क्योंकि आज रात्रि मैं और कुछ नहीं करूंगा सिर्फ इसके कि तुम्हारे साथ संध्या व्यतीत करूं।’’

सही उत्तर।

क्यों ? वो क्यों ऐसा नहीं कहेगी, ‘‘तुम सर्वाधिक स्वार्थी मसीही सुखवादी हो, जिससे मैं कभी मिली हूँ ! तुम सदैव जो भी सोचते हो वो ये कि तुम्हें क्या खुश करता है !’’ यहाँ क्या चल रहा है ? क्यों ‘ड्यूटी’, गलत उत्तर है और ‘प्रसन्नता’ सही उत्तर है ? क्या आप समझे ?

यदि आप इसे समझ गये तब आप ने इसे पा लिया, और मैं मीनियापोलीस वापिस जाकर परमेश्वर की स्तुति कर सकता हूँ। मेरी पत्नी मुझ में सर्वाधिक महिमित है जब मैं उस में सर्वाधिक सन्तुष्ट हूँ। यदि मैं, हमारे सम्बन्ध को एक सेवा-सम्बन्ध में बदलने का प्रयास करता हूँ, एक ऐसा ड्यूटी-सम्बन्ध, जहाँ मैं अपनी पत्नी में अपने सुख की खोज में न लगा रहूँ, उसका अनादर होगा ... और इसी तरह परमेश्वर का भी। जब आप स्वर्ग में जायें और पिता आपकी ओर देखते और कहते हैं, ‘‘तुम यहाँ क्यों आये हो ? तुमने मेरे लिए अपना जीवन क्यों न्योछावर कर दिया ?’’ बेहतर हो कि आप न कहें, ‘‘यहाँ आना मेरा कर्तव्य-कर्म (ड्यूटी) था, क्योंकि मैं एक मसीही हूँ।’’ बेहतर हो आप कहें, ‘‘मैं और कहाँ जाना चाहूंगा ? और किस की ओर मैं मुड़ सकता यशायाह था ? आप मेरे प्राणों की लालसा हैं !’’ और ये सम्मेलन इसी के बारे में है। ये सम्मेलन दो महान् चीजों के बारे में है, जो यशायाह 26: 8 से 268 पीढ़ी में, एक साथ आती हैं: ये परमेश्वर की धुन है ‘उसके’ नाम और ख्याति के लिए और मेरे हृदय की धुन कि मेरी सभी इच्छाओं में सन्तुष्ट रहूँ। विश्व में ये दो अटल चीजें हैं। और मैं क्या आशा करता हूँ कि आपने ये देख लिया है कि वे एक हैं, क्योंकि परमेश्वर और ‘उसका’ नाम और ‘उसकी’ ख्याति, मुझमें सर्वाधिक महिमित होते हैं जब मैं ‘उसमें’ सर्वाधिक सन्तुष्ट होता हूँ।

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