पवित्रता और आशा के लिए, दु:ख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए


सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें। जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बनें हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें। केवल यही नहीं, बरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज और धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है। और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है, उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है। क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा। किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे। परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

आगामी चार सप्ताह में, आपको मसीह के लिए दुःख उठाने के लिए तैयार होने में सहायता करने की, मैं आशा करता हूँ। मैं विश्वास करता हूँ कि हमें मसीह के लिए दुःख उठाने की तैयारी करना चाहिए, इस कारण कि बाइबल कहती है कि हमें करना चाहिए, और दूसरा कारण है कि आधुनिक स्थिति कहती है कि हमें करना चाहिए।

दु:ख उठाने के लिए तैयार होना

‘डेवड बारैट’, मिशनरी विद्वान, जिसने ऑक्सफोर्ड वल्र्ड क्रिश्चियन एनसाईक्लोपीडिया का सम्पादकीय कार्य किया, प्रत्येक वर्ष सारे संसार में मसीही आंदोलन की दशा पर एक अद्यतन प्रकाशित करता है इसे उभारते हुए कि चीजें कैसी होंगी, जैसे कि वर्ष 2000 में। इस वर्ष के अद्यतन में उसने ये रिपोर्ट दिया है कि वर्ष 1980 में लगभग 270,000 मसीही शहीद थे। इस वर्ष सम्भवतः 308,000 होंगे और वर्ष 2000 में वह अनुमान लगाता है कि 500,000। ये वे लोग हैं जो कम या अधिक प्रत्यक्षतः इस कारण मरते हैं कि वे मसीही हैं।

सोमालिया में आज, दसियों हजारों मसीही, प्रतिद्वन्द्वी गुटों के द्वारा जानबूझ कर अलग किये जा रहे हैं और भूखों मारे जा रहे हैं। नाइजीरिया में मुस्लिम और मसीही जनसमूहों के बीच तनाव, ख़तरनाक रूप से विस्फोटक है। चीन में और अन्य कई देशों में लाखों मसीही, उत्पीडि़त किये जाने और जेलखाने में डाले जाने के निरन्तर ख़तरे में रह रहे हैं।

हमारे स्वयं की भूमि में धर्मविरोधी स्वच्छन्द समाज, विशेषकर बुद्धिवादी विशिष्टवर्ग और समाचार-सेवा के अगुवे, सुसमाचारीय कलीसिया और धार्मिकता व भलाई के बाइबल-शास्त्रीय उस दर्शन के प्रति शत्रुता में बढ़ते जा रहे हैं, जिसके लिए हम खड़े हैं। धर्मविरोधी बैरियों की सेवा में पहिला संशोधन इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा गया है कि किसी न्यायाधीश के लिए ये अब और अधिक सोचने से बाहर नहीं होगा कि तर्क करे कि मसीही कलीसियाओं के भवनों में जल और बिजली और अपशिष्ट पदार्थों के निकास की लोक-आपूर्तियां, सरकारी स्रोतों व नियामकों के द्वारा धर्म का एक असंवैधानिक संस्थापन उपलब्ध कराता है।

शान्तिमय, विरोधकर्ता जो लोक-सम्पत्ति पर मात्र प्रार्थना कर रहे हैं, गर्भपात का बचाव करने वालों के द्वारा बर्बरतापूर्वक मारे जा सकते हैं, जैसा कि ‘बफैलो’, न्यूयार्क में हुआ, और हो सकता है कि पोलीस से कोई सुरक्षा न पायें अपितु इसकी जगह एक अपराध का दोष लगाया जावे।

प्रसिद्ध मनोरंजनकर्ताओं द्वारा यीशु के नाम की इस तरह से खुले रूप में उपेक्षा और निन्दा की जाती है कि बीते दशकों में लोगों की नजरों में उन्हें निन्दनीय बनाया गया होता, लेकिन आज अनुमोदित किया जाता या अनदेखा किया जाता है।

सौंपे गए महान् कार्य की कीमत

सब बातों का निचोड़ ये है कि आने वाले वर्षों में एक मसीही होने की अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी। और सौंपे गए महान् कार्य को पूरा करने की कीमत, हम में से कुछ की जिन्दगी होने जा रही है--जैसी कि पहले से है, और जो इसकी सदा से रही है। अठारह सौ वर्ष पूर्व टरतूलियन ने कहा, ‘‘हम (मसीही), जब भी तुम्हारे द्वारा काट डाले जाते हैं, गुणनात्मक रूप से बढ़ते हैं; मसीहियों का खून, बीज है’’ (ऑपोलोजेटिकस, 50)। और 200 साल पश्चात् सन्त जेरोम ने कहा, ‘‘मसीह की कलीसिया की नींव अपना स्वयं का खून बहा कर डली है, दूसरों के खून के द्वारा नहीं; अत्याचार सहने के द्वारा, इसे दण्ड देने के द्वारा नहीं। सताव ने इसे बढ़ाया है; शहादतों/प्राणोत्सर्गों ने इसे मुकुट पहनाया है’’ (लैटर 82)।

आज हम बन्द देशों के बारे में इतना अधिक बात करते हैं कि सुसमाचार-प्रचार के ऊपर परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य को लगभग पूर्णतया खो चुके हैं--मानो कभी ‘उसका’ अर्थ इसके सरल और सुरक्षित रहने का रहा था। उन लोगों के लिए बन्द देष कोई नहीं हैं, जो ये पूर्वानुमान कर लेते हैं कि सताव, कैद, और मृत्यु, सुसमाचार फैलाने के सम्भाव्य परिणाम हैं। और यीशु ने स्पष्टता से कहा कि वे सम्भाव्य परिणाम हैं। ‘‘वे क्लेश दिलाने के लिये तुम्हें पकड़वाएंगे, और तुम्हें मार डालेंगे और मेरे नाम के कारण सब जातियों के लोग तुम से बैर रखेंगे’’ (मत्ती 24: 9)। ‘‘उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएंगे’’ (यूहन्ना 15: 20)।

जब तक हम सुसमाचार के फैलाव और दुःख के ऊपर परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य को वापिस न पा लें, हम अनुग्रह की उन जीतों में आनन्दित नहीं हो सकेंगे, जिसकी योजना ‘वह’ बनाता है।

मिशन-कार्य और सामाजिक न्याय में आज्ञाकारिता, सदा से कीमती रही है, और सदा रहेगी। ‘मियानगो, नाइजीरिया, के गाँव में, एक ‘एस.आई.एम.’ अतिथिगृह और एक छोटा सा चर्च है जो ‘किर्क चैपल’ कहलाता है। उस प्रार्थनालय के पीछे 56 कब्रों के साथ एक छोटा सा कब्रिस्तान है। उनमें से तैंतीस में मिशनरी बच्चों के शरीर हैं। पत्थरों पर लिखा है: ‘‘एथिल अरनॉल्ड: सितम्बर 1, 1928-सितम्बर 2, 1928।’’ ‘‘बारबरा जे. स्वानसन: 1946-1952।’’ ‘‘आइलीन लुइस विटमोयर: मई 6, 1952-जुलाई 3, 1955।’’ हाल के वर्षों में नाइजीरिया में सुसमाचार ले जाने की ये कीमत अनेकों परिवारों ने दी है। ‘चाल्र्स वाइट’ ने इस छोटे से कब्रिस्तान में जाने के बारे में अपनी कहानी बतायी और अत्याधिक शक्शिली वाक्य के साथ इसे समाप्त किया। उसने कहा, ‘‘एकमात्र तरीका जिससे हम मियानगो में के कब्रिस्तान को समझ सकते हैं, ये कि याद रखें कि परमेश्वर ने भी अपने ‘पुत्र’ को सुसमाचार-प्रचार के मैदान में गाड़ा था।’’

और जब ‘उसने’ ‘उसे’ जिलाया, ‘उसने’ कलीसिया को उसी ख़तरनाक खेत में ‘उसके’ पीछे आने को बुलाया जिसे ‘‘सारा संसार’’ कहते हैं। लेकिन क्या हम पीछे जाने के इच्छुक हैं ?

2 तीमुथियुस 3:12 के साथ आप क्या करते हैं ?

‘एर्मेलो, हॉलैण्ड में दो साल पहिले, भाई एन्ड्यू ने एक कहानी बतायी, कि बुडापेस्ट, हंगरी, में उस शहर के एक दर्जन पासवानों के साथ बैठकर वे उन्हें बाइबल से शिक्षा दे रहे थे। तभी एक पुराना मित्र आया, रोमानिया से एक पासवान् जो हाल ही में जेलखाने से आजाद हुआ था। र्भाइ एन्ड्यू ने कहा कि उन्होंने शिक्षा देना रोक दिया और जानते थे कि ये समय सुनने का था।

एक लम्बे अन्तराल के बाद रोमानियाई पादरी ने कहा, ‘‘एन्ड्यू, क्या हॉलैण्ड के जेलखाने में कोई पासवान् हैं ? ‘‘नहीं’’ उसने उत्तर दिया। ‘‘नहीं क्यों ?’’ पासवान् ने पूछा। र्भाइ एन्ड्यू ने एक क्षण के लिए सोचा और कहा, ‘‘मैं सोचता हूं कि ये अवश्य इस कारण से है कि हम उन सभी अवसरों का लाभ नहीं उठाते जो परमेश्वर हमें देता है।’’

और तब सबसे कठिन प्रश्न न आया। ‘‘एन्ड्यू, 2 तीमुथियुस 3: 12 के साथ तुम क्या करते हो ?’’ र्भाइ एन्ड्यू ने बाइबल खोली और उस मूल-पाठ को निकाला और ऊंची आवाज में पढ़ा, ‘‘पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।’’ उसने धीरे से बाइबल बन्द किया और कहा, ‘‘भाई, कृपया मुझे क्षमा करें। हम उस आयत के साथ कुछ नहीं करते।’’

मैं डरता हूँ, हमने भक्ति के विचार को ऐसे आपत्तिहीन मध्यम वर्गीय नैतिकता और कानून-पालन में वातावरण के अनुकूल बना लिया है कि 2 तीमुथियुस 3: 12 हमारे लिए अबौद्धिक बन गया है। मैं सोचता हूँ कि हम में से कई लोग सुसमाचार के लिए दुःख उठाने को तैयार नहीं हैं। और इसी कारण मैं बुलाया गया महसूस करता हूँ कि चार सप्ताह इसे समझाने में लूं कि बाइबल इस बारे में क्या कहती है और आज परमेश्वर हमें किस के लिए बुला रहा है।

दु:ख उठाने के बाइबल- शास्त्रीय चार लक्ष्य

प्रत्येक संदेश, दुःख उठाने के चार लक्ष्यों में से एक के साथ, मेल खाता है। और हम दुःख उठाने के उद्देश्यों के बारे में बात कर सकते हैं क्योंकि ये स्पष्टतः परमेश्वर का ध्येय है कि हम समय-समय पर धार्मिकता की ख़ातिर और सुसमाचार के लिए दुःख उठायें। उदाहरण के लिए, ‘‘इसलिये जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार दुख उठाते हैं, वे भलाई करते हुए, अपने अपने प्राण को विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथ में सौंप दें’’ (1 पतरस 4: 19; तुलना कीजिये, 3: 17; इब्रानियों 12:4-11)।

दुःख उठाने के चार लक्ष्य जो मेरे दिमाग में हैं, वे हैं:-

  1. नैतिक लक्ष्य, क्योंकि दुःख हमारी पवित्रता और आशा को परिश्कृत करता है (रोमियों 5: 1-8),

  2. निकटता का लक्ष्य, क्योंकि दुःख में मसीह के साथ हमारा सम्बन्ध अधिक गहरा और अधिक मीठा हो जाता है (फिलिप्पियों 3: 7-14),

  3. सौंपे गए कार्य का लक्ष्य, क्योंकि परमेश्वर हमें मसीह के क्लेशों का पूरा करने के लिए बुलाता है, जब हम हमारी वास्तविकता के द्वारा ‘उसके’ क्लेशों के मूल्य को बढ़ाते हैं (कुलुस्सियों 1: 24),

  4. और महिमा का लक्ष्य, क्योंकि ये हल्का सा, क्षणिक क्लेश हमारे लिए अनन्त महिमा उत्पन्न करता है (2 कुरिन्थियों 4: 16-18)।

दु:ख उठाने का नैतिक (आत्मिक) लक्ष्य

आज, हम दुःख उठाने के नैतिक (या आत्मिक) लक्ष्य पर ध्यान देंगे। परमेश्वर निर्धारित करता है कि हम सुसमाचार के लिए और धार्मिकता के कारण दुःख उठायें, उन नैतिक और आत्मिक परिणामों के कारण, जो इसका हम पर होता है।

परमेश्वर की महिमा की आशा में उल्लसित होना या घमण्ड करना

आइये इस बिन्दु पर हम एक महान् मूल-पाठ को पढ़ें: रोमियों 5: 3-4। ये दिखाने के पश्चात् कि हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरे हैं और यह कि यीशु के द्वारा अनुग्रह तक हमारी पहुंच हुई है और यह कि हम अनुग्रह में बने हुए हैं, पद 2 में वह कहता है कि हम मसीही ‘‘परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।’’ मसीही जीवन में आनन्द का प्रमुख कारण है उत्सुक अपेक्षा, कि हम परमेश्वर की महिमा को देखेंगे और उसमें भागीदार होंगे। परमेश्वर की महिमा की आशा, हमारे आनन्द का मर्म है।

अब, यदि वो सच है, तब 3 व 4 आयतों में पौलुस पूर्णतया समनुरूप है कि कहता जावे कि हम उन बातों में भी घमण्ड करेंगे (उल्लसित होंगे) जो हमारी आशा को बढ़ाती हैं। यहाँ तर्क-वितर्क की रेखा यही है: पद 2 के अन्त में हम परमेश्वर की महिमा की आशा से आरम्भ करते हैं, और फिर हम पद 4 के अन्त में आशा के साथ समाप्त करते हैं। बिन्दु ये है: यदि हम आशा में घमण्ड करते (उल्लसित होते) हैं, तो हम उसमें भी घमण्ड करेंगे (उल्लसित होंगे) जो आशा ले आता है।

क्या चीज आशा लेकर आती है

अतः पद 3 व 4 वर्णन करते हैं कि वो क्या है। ‘‘केवल यही नहीं (हम केवल परमेश्वर की महिमा की आशा पर ही घमण्ड नहीं करते), बरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज और धीरज से खरा निकलना (परखे जाने की एक अनुभूति), और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है।’’

अतः कारण कि हम क्लेशों में घमण्ड करते हैं ये नहीं है कि हम दर्द या दुःख या असुविधा या परेशानी पसन्द करते हैं (हम मासोक-वादी/परपीडि़त-कामुक नहीं हैं), अपितु इसलिए कि क्लेश वो उत्पन्न करते हैं जो हम पसन्द किया करते हैं, यथा, आशा की एक मजबूत और अधिक मजबूत अनुभूति, जो धीरज से सहने के अनुभव और परखे जाने की अनुभूति के द्वारा आती है।

'उसके' लोगों के दु:ख उठाने में परमेश्वर का एक लक्ष्य है

तो, मुख्य पाठ जो यहाँ है वो ये कि ‘उसके’ लोगों के दुःख उठाने में परमेश्वर का एक उद्देश्य है। वो उद्देश्य बहुधा उस सेवकाई के लक्ष्य से भिन्न होता है जिस में वे परिश्रम कर रहे हैं। सेवकाई का लक्ष्य, एक जोड़ा-शहरों के गैर- कलीसियाई अविवाहित लोगों, या उपनगरीय व्यवसायिओं, या तुर्की मुसलमानों को सुसमाचार सुनाना हो सकता है। लेकिन परमेश्वर का लक्ष्य, सेवकों और मिशनरियों को जेलखाने में डालने के द्वारा उन में और अधिक आशा उत्पन्न करना, हो सकता है। परमेश्वर सदैव उससे अधिक कर रहा है (जैसा कि हम आने वाले सप्ताहों में देखेंगे), किन्तु वो पर्याप्त रहेगा।

दूसरे शब्दों में , परमेश्वर, सेवकाई की उत्पादकता और क्षमता के ऊपर कदापि नहीं जायेगा जिस तरह से हम जाते हैं। बारम्बार पौलुस को, उसके कैदखाने में डाले जाने और पीटे जाने और जहाज के डूबने और टूटी हुई योजनाओं में, परमेश्वर के अनोखे काम का हिसाब-किताब करना पड़ा। कैसे परमेश्वर इतना अक्षम हो सकता था कि उसके जीवन-लक्ष्य में इस प्रकार से बारम्बार रोड़ा अटकाने दे ? इस मूल-पाठ का उत्तर (एकमात्र उत्तर नहीं) हो सकता है: खोये हुओं तक पहुंचने की प्रक्रिया में, ‘उसके’ लोगों की आशा और पवित्रता बढ़ाने के प्रति परमेश्वर प्रतिबद्ध है। और केवल परमेश्वर जानता है कि कैसे इन दो चीजों को संतुलित करे और सर्वाधिक उत्तम तरीके से उन्हें होने दे।

सतावों / पीडाओं के तीन परिणाम

आइये हम सतावों के परिणाम को अधिक विशेष रूप से देखें। पद 3 व 4 में तीन विशिष्ट परिणाम व्यक्त किये गए हैं।

1. दृढ़ रहना

प्रथम, संकट, दृढ़ता या धैर्यपूर्ण सहनशीलता ले आता है। पौलुस का ये अर्थ नहीं है कि ये विश्वव्यापी सच है। कई लोगों के लिए संकट, घृणा और कड़वाहट और क्रोध और नाराज़गी और कुड़कुड़ाने को, बेलगाम कर देता है। लेकिन जिनके पास मसीह का ‘आत्मा’ है उनमें ये बना रहने वाला परिणाम नहीं है। उनके लिए परिणाम है धैयपूर्ण सहनशीलता, क्योंकि ‘आत्मा’ का फल धीरज है।

यहाँ पर बिन्दु ये है कि जब तक कठिनाई हमारी जिन्दगी में नहीं आती, विशेष रूप से मसीह और उसकी धार्मिकता की ख़ातिर कठिनाई, हम मसीह के प्रति हमारी भक्ति की मात्रा और गहराई का अनुभव नहीं करते। जब तक समय कठिन नहीं हो जाते, हम चख नहीं पाते और वास्तव में नहीं जानते कि क्या हम केवल उत्तम-मौसम के मसीही हैं--वो प्रकार जिसका वर्णन यीशु ने मरकुस 4: 16-17 में भूमियों के दृष्टान्त में किया।

और ये वे हैं जो पथरीली भूमि पर बोये गए, जो, जब वे वचन सुनते हैं, तुरन्त आनन्द के साथ इसे ग्रहण करते हैं; और अपने में कोई जड़ नहीं रखते, किन्तु कुछ समय के लिए बने रहते हैं; और तब, जब वचन के कारण संकट या सताव आता है, वे तुरन्त सूख जाते हैं।

अतः, पौलुस कह रहा है कि कष्ट का एक महान् परिणाम ये है कि ये परमेश्वर के लोगों में धैयपूर्ण सहनशीलता और दृढ़ता ले आता है, इस प्रकार वे अपने जीवनों में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को देख सकते हैं और जान सकते हैं कि वे सच में ‘उसके’ हैं।

2. परखा हुआ चरित्र/खरा निकलना

दूसरा परिणाम जो व्यक्त किया गया है, का ये बिन्दु है (पद 4)। ‘‘और (ये) धीरज से खरा निकलना (परखा हुआ चरित्र) होता है (ले आता है)।’’ अक्षरश:, शब्द डोकीमैन का अर्थ है ‘‘परखे जाने और सिद्ध किये जाने का अनुभव।’’ हम कह सकते हैं, ‘‘सिद्धता’’ या ‘‘परीक्षितता’’ (परखा गया)।

ये समझने में कठिन नहीं है। यदि, जब कष्ट आते हैं, आप मसीह के प्रति भक्ति में दृढ़ बने रहिये और ‘उसके’ विरोधी मत हो जाइये, तब आप उस अनुभव में से एक अधिक मजबूत बोध के साथ बाहर आते हैं कि आप वास्तविक हैं, आप परखे गए हैं, आप एक पाखण्डी नहीं हैं। विश्वास का वृक्ष मोड़ा गया और ये टूटा नहीं। आपकी ईमानदारी और स्वामिभक्ति की जाँच हुई और वे उत्तीर्ण हुए। अब उनके पास एक ‘‘परखा हुआ चरित्र’’ है। आपके विश्वास का सोना आग में डाला गया और ये परिश्कृत होकर निकला, और भस्म नहीं हुआ।

जब तेरा मार्ग आग की सी परखों से होकर जाये,
सर्व-पर्याप्त, मेरा अनुग्रह, तेरी आपूर्ति होगी,
लपट तुझे जला न सकेगी, मैंने ऐसा बनाया,
तेरा मैल तो भस्म हो और तेरा सोना परिश्कृत हो जाये।

सताव का वो दूसरा परिणाम है:- यीशु के प्रति हमारी स्वामिभक्ति के सोने का परखा जाना और शुद्ध किया जाना। धीरज से सहना, परखे जाने की निष्चयता ले आता है।

3.आशा

परखे जाने और सिद्ध किये जाने और शुद्ध किये जाने के इस बोध से तीसरा परिणाम आता है। पद 4ब: ‘‘और खरे निकलने (परखे हुए चरित्र) से आशा उत्पन्न होती है।’’ ये हमें पीछे पद 2 में ले जाता है। ‘‘हम ................. परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।’’ मसीही जीवन, सुसमाचार में परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में आशा के साथ आरम्भ होता है, और यह कष्टों/क्लेशों के द्वारा अधिक और अधिक आशा की ओर बढ़ता जाता है।

परखे जाने का बोध, और अधिक आशा ले आता है क्योंकि हमारी आशा विकसित होती है जब परखों के द्वारा हम हमारी स्वयँ की विश्वसनीयता की वास्तविकता का अनुभव करते हैं। लोग जो परमेश्वर को सर्वोत्तम तरीके से जानते हैं, वे लोग हैं जो मसीह के साथ दुःख उठाते हैं। लोग, जो अपनी आशा में सर्वाधिक अटल हैं, वे हैं जो सर्वाधिक गहराई से परखे गए हैं। लोग, जो महिमा की आशा की सर्वाधिक गम्भीरतापूर्वक और अटल रूप से व उत्सुकतापूर्वक बाट जोहते हैं, वे हैं जिन्होंने इस जिन्दगी की सुख-सुविधाओं को कष्टों/क्लेशों के द्वारा उतार फेंका है।

महिमा की आशा में और क्लेश में आनन्दित होना (घमण्ड करना)

अतः इस श्रंखला में पहिली चीज जो हम दुःख उठाने और कष्टों के बारे में कहते हैं, ये है कि परमेश्वर का इसमें एक लक्ष्य है। और वो लक्ष्य है ‘उसके’ नाम की ख़ातिर ‘उसके’ लोगों में धैयपूर्ण सहनशीलता प्रगट करे; और उसके द्वारा मसीह के प्रति स्वामिभक्ति और विश्वास की वास्तविकता को परखे और प्रमाणित करे और परिश्कृत करे; और उसके द्वारा परखे जाने के बोध को, ताकि हमारी आशा को मजबूत और गहरा और सघन करे।

एक कलीसिया के रूप में हमारे पास सेवकाई के लक्ष्य हैं (शहरी क्षेत्रों में चेला बनाना, छोटे समूहों की चरवाही, सुसमाचार -प्रचार का नेटवर्क, अजन्मों की रक्षा; जवानों और बच्चों को गतिशील बनाना); हमारे पास एक विशाल मिशनरी दर्शन है, सन् 2000 तक 2000 को भेजना; हमारे पास एक भवन है जिसका पैसा चुकाना है और एक बज़ट जो इसे संचित करे, सब कुछ मसीह और ‘उसके’ राज्य के लिए। अपनी प्रभु-सत्ता सम्पन्नता में परमेश्वर इसमें से कितना पूरा करेगा, मैं नहीं जानता। लेकिन ये मैं जानता हूँ, आज्ञाकारी रहकर, हमारे द्वारा इन लक्ष्यों का पीछा करने में , परमेश्वर के पास प्रत्येक बाधा और प्रत्येक निराशा और प्रत्येक दर्द और प्रत्येक कष्ट का एक लक्ष्य है, और वो लक्ष्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितने कि स्वयँ लक्ष्य--आपका धीरज, आपका परखा हुआ चरित्र, और परमेश्वर की महिमा में आपकी आशा।

इसके अतिरिक्त जो कुछ भी परमेश्वर हमारी जिन्दगी के योजना स्तर पर कर रहा हो, ये ‘वह’ सदैव आपकी जिन्दगी के हृदय/मर्म स्तर पर कर रहा है। और इसलिए आइये हम पौलुस के साथ महिमा की आशा में घमण्ड करें और उन क्लेशों या कष्टों में भी जो आने वाले हैं।