दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: ताकि हम मसीह को प्राप्त करें


निदान, हे मेरे भाइयो, प्रभु में आनन्दित रहो। वे ही बातें तुम को बार बार लिखने में मुझे तो कुछ कष्ट नहीं होता, और इस में तुम्हारी कुशलता है। कुत्तों से चैकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चैकस रहो, उन काट कूट करनेवालों से चैकस रहो; क्योंकि खतनावाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुआई से उपासना करते हैं, और मसीह यीशु पर घमण्ड करते हैं, और शरीर पर भरोसा नहीं रखते, पर मैं तो शरीर पर भी भरोसा रख सकता हूं। यदि किसी और को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उस से भी बढ़कर रख सकता हूं। आठवें दिन मेरा खतना हुआ, इस्राएल के वंश, और बिन्यामीन के गोत्र का हूं; इब्रानियों को इब्रानी हूं; व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था। परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तामता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं। और उस में पाया जाऊं; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, बरन उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है। और मैं उसको और उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को, और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को जानूं, और उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करूं। ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं। यह मतलब नहीं, कि मैं पा चुका हूं, या सिद्ध हो चुका हूं: पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूं, जिस के लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है।

बाइबल, परमेश्वर के लोगों के लिए दुःखभोग की प्रतिज्ञा करती है

इस सप्ताहों में, हम दुःख उठाने के लिए तैयार होने की आवश्यकता के ऊपर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। इसका कारण मात्र मेरा ये बोध नहीं है कि दिन बुरे हैं और धार्मिकता का मार्ग कीमती है, अपितु बाइबल की प्रतिज्ञा है कि परमेश्वर के लोग दुःख उठायेंगे।

उदाहरण के लिए, प्रेरित 14: 22 कहता है कि पौलुस ने अपनी सभी नौजवान कलीसियाओं से कहा, ‘‘हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।’’ और यीशु ने कहा, ‘‘यदि उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएंगे’’ (यूहन्ना 15: 20)। और पतरस ने कहा, ‘‘जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिए तुम में भड़की है, इस से यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है’’ (1 पतरस 4: 12)। दूसरे शब्दों में, ये अचम्भे की बात नहीं है; इसकी उम्मीद की जाना चाहिए। और पौलुस ने (2 तीमुथियुस 3: 12 में) कहा, ‘‘पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।’’

अतः मैं इसे एक बाइबल-शास्त्रीय एक सच्चाई लेता हूं कि जितना अधिक हम पृथ्वी का नमक और जगत की ज्योति होने के लिए, और संसार के सुसमाचार न पाये लोगों तक पहुंचने, और अन्धकार के कामों को उजागर करने, और पाप व शैतान के बन्धनों को खोलने में, ईमानदार होते हैं, उतना ही अधिक हम दुःख उठायेंगे। इसी कारण हमें तैयारी करना चाहिए। और इसी कारण इन सप्ताहों में, मैं उन मूल- पाठों से उपदेश दे रहा हूँ जो हमें तैयार होने में सहायता करेंगे।

ये संदेश, परमेश्वर की सेवा में हमारे दुःख उठाने में, ‘उसके’ चार उद्देश्यों के बारे में हैं। एक है, नैतिक या आत्मिक उद्देश्य:- दुःख उठाने में हम परमेश्वर में अधिक पूर्णतया आशा रखने लगते हैं और संसार की चीजों में कम भरोसा रखते हैं। दूसरा, सामीप्य का उद्देश्य है:- जब हम मसीह के दुःखों में सहभागी होते हैं, हम ‘उसे’ बेहतर जानने लगते हैं। आज हमारे ध्यान का केन्द्र यही है।

मसीह के साथ अधिक अंतरंगता ;या निकटताद्ध का उद्देश्य

हमें सिखाने और ये दिखाने के द्वारा परमेश्वर हमें दुःख उठाने के लिए तैयार होने में सहायता करता है कि दुःखभोग के द्वारा हमें मसीह के साथ और गहरे सम्बन्ध में जाने का अभिप्राय है। आप ‘उसे’ और बेहतर जान पाते हैं जब आप ‘उसके’ दर्द को बाँटते हैं। वे लोग जो मसीह की बहुमूल्यता के बारे में अधिक गहराई और मिठास के साथ लिखते हैं, वे लोग हैं जिन्होंने ‘उसके’ साथ गहराई से दुःख उठाया है।

जैरी ब्रिजे़स के जीवन में दुःखभोग

उदाहरण के लिए, जैरी ब्रिजे़स की पुस्तक, ट्रस्टिंग गॉड, इवन वैन लाइफ़ हर्टस्, दुःख उठाने के बारे में तथा क्लेशों के द्वारा परमेश्वर के निकट हो जाने के बारे में, एक गहरी व सहायक पुस्तक है। और इसलिए ये जानकर कोई अचरज नहीं है कि जब वह 14 साल का था, उसने दूसरे कमरे से अपनी माँ द्वारा पुकारा जाना सुना, सर्वथा अनपेक्षित, और पहुँचा तो उसे अन्तिम श्वास लेते देखा। उसकी शारीरिक दशा भी ऐसी थी जिसने उसे सामान्य खेलकूद से वंचित रखा। और मात्र कुछ ही वर्ष पूर्व उसकी पत्नी कैंसर से मर गई। जहाज-चालकों के साथ परमेश्वर की सेवा करने ने उसको दर्द से नहीं बचाया। वह दुःखभोग के बारे में गहराई से लिखता है क्योंकि वह मसीह के साथ दुःखों में गहराई से गया है।

होरेशियस़ बोनार के जीवन में दुःखभोग

एक सौ वर्ष से भी पूर्व होरेशियस़ बोनार, स्काटलैन्ड निवासी पास्टर और भक्ति-गीत लेखक, ने एक छोटी पुस्तक लिखी जो नाइट ऑफ वीपिंग, अथवा, ‘‘वैन गॉड्स चिल्डरेन सफ़र’’ कहलाती है। इस में उसने कहा कि उसका लक्ष्य था, ‘‘सन्तों की सेवकाई करना … उनके बोझों को उठाने की खोज में रहना, उनके घावों को बाँधना, और उनके बहुत से आँसुओं में से कम से कम कुछ को सुखाना।’’ यह एक कोमल और गहरी और बुद्धिमत्तापूर्ण पुस्तक है। अतः उसे ऐसा कहते हुए सुनना अचम्भे की बात नहीं है,

ये एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा लिखी गई है जो स्वयँ ही परखों के द्वारा लाभ उठाने की खोज में है, और काँपता है, कि ऐसा न हो कि यह चट्टान के ऊपर से हवा के समान, उसे सदा की तरह कठोर छोड़ते हुए, गुजर जाये; उस एक के द्वारा जो हर एक व्यथा में परमेश्वर के निकट हो जायेगा ताकि वह ‘उसे’ और भी जाने, और जो यह अंगीकार करने के लिए अनच्छिुक नहीं है कि फिर भी वह जितना जानता है, थोड़ा ही जानता है।

ब्रिजे़स और बोनार, हमें दिखाते हैं कि दुःखभोग, परमेश्वर के हृदय में गहरे उतर जाने का मार्ग है। परमेश्वर के पास उसके दुःख उठाते हुए बच्चों के लिए ‘उसकी’ महिमा के विशेष प्रकाशन हैं।

अय्यूब, स्तिफनुस, और पतरस के वचन

महीनों तक दुःखभोग के बाद, अय्यूब अन्ततः परमेश्वर से कहता है, ‘‘मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं’’ (अय्यूब 42: 5)। अय्यूब एक भक्त और खरा मनुष्य था, परमेश्वर के मन को भाने वाला, किन्तु जो वह परमेश्वर के बारे में समृद्धि में जानता था, और जो वह ‘उसे’ संकट के द्वारा जान गया, उनके बीच अन्तर, ‘उसके’ के बारे में सुनना और देखने का अन्तर था।

जब स्तिुफनुस को बन्दी बनाया गया और उसे उसके विश्वास के लिए परखा गया और उसे उपदेश देने का एक अवसर दिया गया, परिणाम ये हुआ कि अगुवे क्रोधित हुए और उस पर अपने दाँतों को पीसा। वे उसे घसीट कर नगर से बाहर ले जाने और मार डालने वाले ही थे। ठीक उसी क्षण, लूका हमें बताता है, ‘‘उस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिने ओर खड़ा देखा’’ (प्रेरित 7: 55)। वहाँ एक विशेष प्रकाशन है, एक विशिष्ट निकटता, जो उनके लिए तैयार की गई है जो मसीह के साथ दुःख उठाते हैं।

पतरस इसे इस तरह प्रस्तुत करता है, ‘‘यदि मसीह के नाम के लिये तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो धन्य हो; क्योंकि महिमा का आत्मा, जो परमेश्वर का आत्मा है, तुम पर छाया करता है’’ (1पतरस 4: 14)। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने बच्चों के ऊपर, ‘उसके’ ‘आत्मा’ और ‘उसकी’ महिमा का एक विशिष्ट आगमन और ठहरना सुरक्षित रखता है, जो ‘उसके’ नाम के लिए दुःख उठाते हैं।

मूल-पाठ से तीन प्रेक्षण

अतः आज के संदेश का मुख्य केन्द्र, दुःखभोग में इस निकटता या अंतरंगता के कारक पर है। सन्तों के दुःख उठाने के उद्देश्यों में से एक ये है कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता, कम औपचारिक व कम बनावटी व कम दूरी का बन जावे और अधिक व्यक्तिगत व अधिक वास्तविक व अधिक अंतरंग व निकट व गहरा हो जावे।

हमारे मूल-पाठ (फिलिप्पयों 3: 5-11) में, मैं कम से कम तीन चीजें देखना चाहता हूँ:

  1. पहिला, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, पौलुस की दुःख उठाने की तैयारी;

  2. दूसरा, मसीह के प्रति आज्ञाकारिता की कीमत के रूप में, दुःखभोग और क्षति का, पौलुस का अनुभव;

  3. तीसरा, इस सब में पौलुस का लक्ष्य, यथा, मसीह को प्राप्त करना: ‘उसे’ जानना और, और अधिक अंतरंगता व वास्तविकता के साथ ‘उस’ में व संगति में बने रहना, तुलना में उससे जो वह अपने सर्वोत्तम मित्रों, बरनबास और सीलास के साथ जानता था।

1. दुःख उठाने के लिए पौलुस की तैयारी

पद 5 व 6 में पौलुस उन विशेषकों को सूचीबद्ध करता है जिनका उपभोग वह मसीही बनने से पहले करता था। वह इब्राहीम की कुलीन सन्तान, इब्रानियों का इब्रानी के रूप में अपना जातीय वंशवृक्ष बताता है। ये उसके लिए बड़ा लाभ ले आया, महत्वपूर्ण होने की एक विशाल अनुभूति और भरोसा। वह एक इस्राएली था। फिर वह तीन चीजें बताता है जो, इससे पूर्व कि वह एक मसीही बना, पौलुस की जिन्दगी के ठीक मर्मस्थल को जाती हैं (पद 5 के अन्त में):- ‘‘व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था।’’

पौलुस की मान्यताएं, इससे पूर्व कि उसकी भेंट मसीह से हुई

ये पौलुस का जीवन था। ये वो था जिसने उसे अर्थ और महत्व दिया। ये उसकी उपलब्धि थी, उसका सौभाग्य, उसका आनन्द। विभिन्न समूहों के लिए विभिन्न सौभाग्य--और पौलुस का ये था कि वह व्यवस्था का पालन करनेवालों के उच्च-सोपानक, फ़रीसीगण, से आता था, और ये कि उनके बीच में वह इतना उत्साही था कि वह परमेश्वर के शत्रुओं, यीशु की कलीसिया, को सताने के मार्ग में अगुआ बना, और ये कि उसने अतिसतर्कता से व्यवस्था का पालन किया। उसे वंशगत-सम्बद्धता से सौभाग्य मिला, उसे श्रेष्ठ होने में सौभाग्य मिला, उसके द्वारा निर्दोष व्यवस्था-पालन में उसे परमेश्वर से सौभाग्य मिला--या उसने ऐसा सोचा।

और तब वह दमिश्क के मार्ग पर मसीह से, जीवते परमेश्वर के ‘पुत्र’ से, मिला। मसीह ने उसे बता दिया कि उसे कितना दुःख उठाना पड़ेगा (प्रेरित 9: 16)। और पौलुस ने स्वयँ को तैयार कर लिया।

पौलुस ने अपने पूर्व की मान्यताओं को हानि गिना

जिस तरीके से उसने स्वयँ को तैयार किया, पद 7 में वर्णित है। ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’ पौलुस, धर्मी समाज की अपनी उच्च-सोपानक स्थिति, फरीसी होने, को देखता है; वह इसके सभी सौभाग्यों और शाबासी के साथ उस समूह में सबसे उच्च स्थिति में होने के गौरव को देखता है; वह व्यवस्था-पालन में अपनी सख़्ती और उस नैतिक गर्व की अनुभूति को जिसका उसने आनन्द लिया, को देखता है; और वह, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, अपने पूरे संसार को लेकर इसे उलट देने के द्वारा, दुःख उठाने के लिए तैयारी करता है:- ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं (अर्थात् पद 5-6), उन्हीं को मैं ने हानि समझ लिया है।’’

इससे पूर्व कि वह मसीही बना, उसके पास एक बही-ख़ाता था जिसमें दो स्तम्भ/कॉलम थे: एक जो कहता था, लाभ या प्राप्तियाँ और दूसरा जो कहता था, हानियाँ। लाभ की ओर था, पद 5-6 का मानवीय गौरव। हानि की ओर थीं, भयंकर सम्भावनाएँ कि ये यीशु-क्रान्ति हाथ से निकल जाये और यीशु वास्तविक प्रमाणित होकर दिन जीत ले। जब वह दमिश्क के मार्ग पर जीवते मसीह से मिला, पौलुस ने एक बड़ी लाल पैन्सिल लिया और अपने लाभ के कॉलम के आर-पार बड़े लाल अक्षरों ‘‘हानि’’ लिख दिया। और उसने हानि के कॉलम पर बड़े अक्षरों में ‘‘लाभ’’ लिख दिया, जिसमें केवल एक नाम था: ‘मसीह’।

और केवल यही नहीं, जितना अधिक पौलुस ने संसार में जीवन की तुलनात्मक मान्यताओं और मसीह की महानता के बारे में सोचा, वह पद 5-6 में व्यक्त की गई कुछ चीजों से आगे बढ़ गया और उस पहले कॉलम में मसीह को छोड़कर हर एक चीज को डाल दिया:- पद 8: ‘‘बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ उसने अपनी सर्वाधिक बहुमूल्य उपलब्धियों को हानि गिनने से आरम्भ किया, और उसने मसीह को छोड़कर, हर एक चीज को हानि गिनने से अन्त किया।

सामान्य मसीहियत

पौलुस के लिए, एक मसीही बनने का यही अर्थ था। और ऐसा न हो कि हम में से कोई यह सोचे कि वह अद्वितीय या विशिष्ट था, ध्यान दीजिये कि पद 17 में पूरे प्रेरिताई के अधिकार के साथ वह कहता है, ‘‘हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो।’’ ये है सामान्य मसीहियत।

जो पौलुस यहाँ कर रहा है वो ये कि यह दिखाना कि यीशु की शिक्षाओं को किस प्रकार जीना है। उदाहरण के लिए, यीशु ने कहा, ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया’’ (मत्ती 13: 44)। एक मसीही बनने का अर्थ है, ये खोजना कि मसीह (राजा), पवित्र आनन्द के ख़जाने की तिजोरी है और ‘उसे’ प्राप्त करने के लिए संसार की हर एक अन्य चीज के ऊपर ‘‘हानि’’ लिखना। ‘‘उसने उस खेत को खरीदने के लिए, जो कुछ उसके पास था सब बेच दिया।’’

अथवा, पुनः लूका 14: 33 में यीशु ने कहा, ‘‘तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु का चेला बनने का अर्थ है, अपनी सब सम्पत्ति--और हर उस चीज के ऊपर जो ये संसार प्रस्तुत करता है, बड़े लाल अक्षरों में ‘‘हानि’’ लिखना।

व्यावहारिक रूप से इसका क्या अर्थ है

अब, इसका व्यावहारिक दृष्टि से क्या अर्थ है ? मैं सोचता हूँ कि इसका अर्थ चार बातें हैं:

  1. इसका अर्थ है कि जब कभी मुझे इस संसार की किसी भी चीज और मसीह में से चुनना पड़ता है, मैं मसीह को चुनता हूँ।

  2. इसका अर्थ है कि मैं इस संसार की चीजों से इस प्रकार बर्ताव करूंगा जो मुझे मसीह के निकट ले जावे ताकि मैं मसीह को और भी प्राप्त करूं और जिस तरह से मैं संसार का उपयोग करता हूँ, उससे मैं और भी ‘उसमें’ आनन्दित हो सकूं।

  3. इसका अर्थ है कि मैं संसार की चीजों से सदैव इस तरह बर्ताव करूंगा जो ये प्रदर्शित करें कि वे मेरा धन नहीं हैं, अपितु ये प्रदर्शित करें कि मसीह मेरा धन है।

  4. इसका अर्थ है कि यदि मैं इस संसार की कोई या सभी चीजें खो दूं जो ये संसार प्रस्तुत करता है, मैं अपना आनन्द या अपने धन को या अपनी जिन्दगी को खो नहीं दूंगा, क्योंकि मसीह सब कुछ है।

अब, ये वो गणना है जिसे पौलुस ने अपने आत्मा में गिना पद 8: ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ मसीह सब-कुछ है और शेष सब हानि है।

दुःख उठाने के लिए तैयार होने का ये एक तरीका क्यों है ?

आइये हम एक मिनिट के लिए रुक जावें और अपनी स्थिति को पायें। मैं अब भी पहिले बिन्दु में ही चल रहा हूँ:-यथा, यह कि ये पौलुस का तरीका है दुःख उठाने के लिए तैयार होने का। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ ? क्यों एक मसीही बनना, और मसीह के सिवाय अपने जीवन की हर चीज के ऊपर ‘‘हानि’’ लिख देना, दुःख उठाने के लिए तैयार होने का एक तरीका है ?

उत्तर ये है कि, दुःख उठाना, उन्हें दूर कर देने से अधिक, और कुछ नहीं है, जो संसार हमारे आनन्द के लिए हमें बुरी चीजें या अच्छी चीजें प्रस्तुत करता है--प्रतिष्ठा, समकक्ष लोगों के बीच सम्मान, नौकरी, पैसा, पति/पत्नी, यौन-जीवन, बच्चे, मित्रगण, स्वास्थ्य, ताकत, दृष्टि, श्रवण, सफलता इत्यादि। जब ये चीजें दूर कर दी जाती हैं (बल द्वारा या परिस्थिति द्वारा या चुनाव द्वारा), हम दुःख उठाते हैं। किन्तु यदि हमने पौलुस का और यीशु की शिक्षा का अनुसरण किया है और मसीह को प्राप्त करने के, समझ से परे मूल्य के कारण, उन्हें हानि समझ चुके हैं, तब हम दुःख उठाने के लिए तैयार हैं।

जब आप एक मसीही बन जाते हैं, यदि आप मसीह को छोड़कर संसार की सभी चीजों के आर-पार एक बड़ा लाल ‘‘हानि’’ लिख देते हैं, तब जब मसीह आपको उन में से कुछ चीजों का परित्याग करने को बुलाता है, ये अजीब या अनपेक्षित नहीं है। दर्द और दुःख अत्याधिक हो सकता है। आँसू बहुत हो सकते हैं, जैसा वे गतसमनी में यीशु के लिए थे। लेकिन हम तैयार रहेंगे। हम जान जायेंगे कि मसीह का मूल्य उन सब चीजों से परे है जो संसार हमें दे सकता है और ये कि उन्हें खो देने में हम मसीह को और अधिक प्राप्त करते हैं।

2. दुःख उठाने का पौलुस का अनुभव

अतः, पद 8 के द्वितीय-अर्द्ध में पौलुस, दुःख उठाने के लिए तैयार होने से, वास्तविक दुःख उठाने की ओर बढ़ता है। वह पद 8 के प्रथम-अर्द्ध में सब चीजों को हानि गिनने से आगे बढ़कर, उस आयत के द्वितीय-अर्द्ध में सब वस्तुओं की वास्तव में हानि भोगने की ओर बढ़ता है। ‘‘ ... जिस {अर्थात् मसीह} के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ हम आगामी सप्ताह में इसे देखने जा रहे हैं:- पौलुस ने संसार के सामान्य लाभों और सुख-सुविधाओं की इतनी अधिक वास्तविक हानि का अनुभव कर लिया था कि वह कह सकता था कि वह वस्तुओं को हानि मात्र गिन नहीं रहा था ( वह हानि उठा रहा था। उसने अपनी मान्यताओं को उलटा कर देने के द्वारा तैयारी कर ली थी, और अब वह परखा जा रहा था। क्या उसने सब वस्तुओं के ऊपर मसीह का मूल्य आँका।

3. दुःख उठाने में पौलुस का लक्ष्य (और परमेश्वर का उद्देश्य)

अतः, इस दुःख उठाने में पौलुस के लक्ष्य और परमेश्वर के उद्देश्य पर हमारा ध्यान आकृष्ट करने के द्वारा मुझे समाप्त करने दीजिये। क्यों परमेश्वर ने ठहराया और पौलुस ने हानियों को स्वीकार किया कि इसका अर्थ उसके लिए एक मसीही होना था ?

इन आयतों में पौलुस बारम्बार उत्तर देता है ताकि हम बिन्दु को खो न सकें। इस हानि उठाने में वह निष्क्रिय नहीं है। वह सप्रयोजन/सोद्देश्य है। और उसका उद्देश्य मसीह को प्राप्त करना है।

  • पद 7: ‘‘उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’

  • पद 8अः ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’

  • पद 8बः ‘‘जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई।’’

  • पद 8सः ‘‘और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’

  • पद 9: ‘‘... और उस में पाया जाऊं {ताकि परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करूं, मेरी अपनी नहीं} ...’’

  • पद 10अः (सब वस्तुओं की हानि स्वीकार करने में अब भी अपने लक्ष्य को देते हुए) ‘‘ताकि मैं उसे ... जानूं’’

  • पद 10ब-11: (इसके बाद इसकी चार विशिष्टताएं देते हुए कि मसीह को जानने का क्या अर्थ है)

  1. ‘‘उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को’’; और
  2. ‘‘उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को’’;
  3. ‘‘उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करना’’ {जानना};
  4. ‘‘ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं।’’

दूसरे शब्दों में, वो जो सब वस्तुओं की हानि उठाने में पौलुस को स्थिर रखता है, वो आत्मविश्वास है, कि संसार में बहुमूल्य चीजों की उसके द्वारा हानि उठाने में, वह कुछ अधिक बहुमूल्य को — मसीह को प्राप्त कर रहा है।

और दो बार उस प्राप्त करने को, जानना कहा गया है--पद 8अ:- ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण ... ।’’ पद 10:-‘‘ताकि मैं उसे … जानूं।’’ दुःख उठाने में ये अंतरंगता का कारक है। क्या हम ‘उसे’ जानना चाहते हैं ? क्या हम ‘उसके’ साथ और अधिक व्यक्तिगत और ‘उसके’ साथ गहरा और ‘उसके’ साथ वास्तविक और ‘उसके’ साथ अंतरंग होना चाहते हैं — यहाँ तक कि हम, इस सभी धनों में महानतम् को प्राप्त करने के लिए, हर चीज को हानि गिनें ?

यदि हम चाहते हैं, हम दुःख उठाने के लिए तैयार रहेंगे। यदि हम नहीं चाहते, ये हमें अचम्भे में डाल देगा और हम विद्रोह करेंगे। मसीह को जानने के, समझ से परे मूल्य के प्रति, प्रभु हमारी आँखों को खोले !