‘उसके’ पुत्र से सम्बन्धित, परमेश्वर का समाचार


पौलुस की ओर से जो यीशु मसीह का दास है, और प्रेरित होने के लिये बुलाया गया, और परमेश्वर के उस सुसमाचार के लिये अलग किया गया है, 2 जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में, 3 अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में प्रतिज्ञा की थी, जो शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ, 4 और पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है।

पिछले सप्ताह हमने पद 1 में से देखा कि पौलुस मसीह यीशु का एक बन्धुआ-दास है, अर्थात्, वह खरीदा गया था और मसीह के स्वामित्व में है और ‘उसके’ द्वारा नियंत्रित होता है। वह मसीह को प्रसन्न करने के लिए जीवित है। और, इसलिए कि पौलुस की पहल तथा पौलुस की दास-मजदूरी पर किसी तरह निर्भर रहते हुए मसीह, के बारे में हम गलत धारणा न पायें , हमें रोमियों 15:18 में ध्यान देना चाहिए कि उस सब के लिए जो पौलुस स्वयं मसीह की सेवा में करता है, पौलुस, मसीह पर निर्भर है: ‘‘क्योंकि उन बातों को छोड़, मुझे और किसी बात के विषय में कहने का हियाव नहीं, जो मसीह ने अन्यजातियों की आधीनता के लिये वचन, और कर्म और . . . से मेरे ही द्वारा किए।’’ दूसरे शब्दों में , पौलुस, मसीह की सेवा उस सामर्थ्य में करता है, जिसके द्वारा मसीह, पौलुस की सहायता करता है। ‘‘मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उस की सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया, कि आप सेवा टहल करे’’ (मरकुस 10: 45; साथ ही 1 कुरिन्थियों 15:10; 1 पतरस 4: 11 भी देखिये)। यदि हम यह न देखें कि पौलुस, मसीह की सेवा उस सामर्थ्य में करता है जिसकी आपूर्ति मसीह करता है, ताकि पौलुस की सेवा के लिए मसीह को महिमा मिले, तो हम रोमियों की पत्री के सम्पूर्ण अर्थ को प्रारम्भ से ही कतरा कर निकल जायेंगे (देखिये 1 पतरस 4:11)।

यह प्रभुसत्ता-सम्पन्न, सभी आपूर्तियाँ करनेवाला मसीह वो है, जिससे हम अगले वाक्यांश में मिले थे, ‘‘प्रेरित होने के लिए बुलाया गया।’’ मसीह ने पौलुस को दमिश्क के मार्ग पर पुकारा और सच्ची शिक्षा के साथ चर्च (कलीसिया) की नींव रखने में, उसे ‘उसका’ आधिकारिक प्रतिनिधि होने का कार्यभार सौंपा। फिर हमने परमेश्वर के प्रभुसत्ता-सम्पन्न, सर्व-योजना बनाने वाले हाथ को अगले वाक्यांश में देखा, ‘‘परमेश्वर के . . . सुसमाचार के लिये अलग किया गया।’’ गलतियों 1: 15 कहता है, परमेश्वर ने पौलुस को उसके जन्म से पहले ही अलग कर लिया था। परमेश्वर ‘उसके’ सुसमाचार के आगमन और प्रकाशन के लिए इतनी जलन रखता है कि ‘वह’ कुछ भी संयोगवश होने का मौका नहीं देता।

अब आज, हम इन शब्दों को देखते हैं, ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’ (1: 1), और यह कि 2-4 आयतों में पौलुस इसे कैसे खोलता है।

‘‘ . . . जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी . . . ’’

इसके बारे में पौलुस जो पहिली बात कहता है, वो उसके ठीक अनुक्रम में है जो हमने अभी देखी है: कि परमेश्वर ये दिखाने के लिए जलन रखता है कि इसके पूर्व कि यह घटित होता, सुसमाचार की योजना बहुत पहिले बनायी गई थी। पद 2: ‘‘ . . . (पौलुस) सुसमाचार के लिये अलग किया गया (था) जिस की उस ने (परमेश्वर ने) पहिले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’

पद 2 में से इन तीन बातों पर विचार कीजिये।

1) परमेश्वर का सुसमाचार, पुराना नियम की प्रतिज्ञाओं का पालन/सम्पादन है।

यह एक नया धर्म नहीं है। यह एक पुराने धर्म की पालन/सम्पादन है। पुराना नियम का परमेश्वर, नया नियम का परमेश्वर है। ‘वह’ उस समय जो तैयार कर रहा था व प्रतिज्ञा कर रहा था, वो ‘उसने’ यीशु के आने में पूरा किया।

2) परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है।

सैंकड़ों साल बीत जाते हैं। यहूदी जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या मुक्तिदाता कभी आयेगा। वे भयंकर वेदना में से जाते हैं। तब परमेश्वर कार्य करता है और प्रतिज्ञा पूरी होती है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर का भरोसा किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत हो सकता है मानो ‘वह’ अपनी प्रतिज्ञाओं को भूल गया। किन्तु ‘वह’ भूलता नहीं है। अतः पद 2, न केवल सुसमाचार के अन्तर्विषय के बारे में एक कथन मात्र है, अपितु, इसका विश्वास करने के लिए एक कारण भी है। यदि हम यह देख सकते हैं कि परमेश्वर ने ‘उसके’ आने के शताब्दियों पूर्व मसीह की प्रतिज्ञा की थी और यह कि बहुत विस्तार में ‘वह’ ये प्रतिज्ञाएं पूरी करता है, तो हमारा विश्वास मजबूत हो जाता है।

3) यह पवित्र, ‘आत्मा’-प्रेरित रचनाएँ हैं, जिनका हमें सम्मान तथा विश्वास करना चाहिए।

पवित्र-शास्त्र की हमारी धर्मशिक्षा के लिए, पद 2 के विशाल रूप से महत्वपूर्ण उलझावों पर ध्यान दीजिये। प्रथम, परमेश्वर है; इसके बाद एक प्रतिज्ञा है जो परमेश्वर करना चाहता है; फिर भविष्यवक्ता हैं ‘‘जिनके द्वारा’’ (ठीक से ध्यान दीजिये, जिनसे नहीं, अपितु जिनके ‘‘द्वारा’’, परमेश्वर स्वयं वक्ता बने रहते हुए) ‘वह’ अपनी प्रतिज्ञा कहता है; इसके बाद रचनाएँ हैं; और ये रचनाएँ पवित्र कही जाती हैं। वे पवित्र क्यों हैं - अन्य सभी रचनाओं से अलग-थलग की गईं और अपने में अनोखी तथा बहुमूल्य ? क्योंकि ये परमेश्वर है जो उन में बात करता है। आयत को सावधानी से पढि़ये: ‘‘उस (परमेश्वर) ने पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ परमेश्वर ने पवित्र-शास्त्र में प्रतिज्ञा की । परमेश्वर पवित्र-शास्त्र में बातें कर रहा है। यही है जो उन्हें पवित्र बनाता है। पवित्र-शास्त्र के लिए पौलुस की यही समझ है और हमारी भी होनी चाहिए। यदि आप ने कभी आश्चर्य किया हो कि क्यों हमारी बाइबलों के मुख-पृष्ठ पर ‘‘पवित्र बाइबल’’ लिखा होता है, तो रोमियों 1: 2 इसका उत्तर है।

और ऐसा न हो कि रोमियों की पत्री की हमारी व्याख्या के लिए, इसकी निकट की सुसंगतता, से हम चूक जायें, तीन बातें याद रखिये: (1) 1: 1 में पौलुस, कलीसिया की नींव डालने वाले के रूप में मसीह की ओर से अधिकार के साथ बोलते और लिखते हुए, स्वयँ को मसीह यीशु के प्रेरित के रूप में देखता है - दूसरे शब्दों में , पुराने समय के एक भविष्यवक्ता के समान (इफिसियों 2: 20)। (2) 1 कुरिन्थियों 2: 13 में पौलुस ने कहा, ‘‘हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु ‘आत्मा’ की सिखायी हुई बातों में , आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिलाकर सुनाते हैं।’’ दूसरे शब्दों , पौलुस अपने शिक्षण-कार्य के लिए एक विशेष प्रेरणा का दावा करता है। (3) 2 पतरस 3: 1 में, पतरस कहता है कि कुछ ‘‘लोग उन ;पौलुस के लेखोंद्ध के अर्थों को भी पवित्र शास्त्र की और बातों की नाईं खींच तान करते हैं।’’ अतः पतरस, पौलुस की पत्रियों को पवित्र शास्त्र के साथ उसी श्रेणी में रखता है, जिसके बारे में हम यहाँ पढ़ रहे हैं।

इसी कारण उपदेश देना हमारे जीवन में इतना गम्भीर है। हम विश्वास करते हैं कि रोमियों को पौलुस की पत्री, परमेश्वर का वचन है, मात्र मनुष्य के शब्द नहीं। पवित्र रचनाओं में, परमेश्वर की प्रेरणा से सुसमाचार की प्रतिज्ञा की गई थी; और परमेश्वर की प्रेरणा से पवित्र लेखों में हमारे लिए खोला गया और संरक्षित किया गया है। यही हम विश्वास करते हैं, और सच्चाई और धर्मशिक्षा और प्रचार और आराधना और सब कुछ जो संसार में है, के बारे में हम जिस तरह दृष्टिकोण रखते हैं, उसमें ये एक विशाल अन्तर लाता है।

अतः परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में पहली बात जो पौलुस कहता है, यह है कि इसकी योजना और भविष्यवाणी बहुत पहले हो चुकी थी (1: 2)। यह वो सुसमाचार है ‘‘जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’

‘‘ . . . अपने पुत्र के विषय में . . . ’’

परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में दूसरी बात जो वह कहता है(1: 3), वो यह है कि इसका सम्बन्ध उसके ‘पुत्र’ से है। ‘‘ . . . परमेश्वर के उस सुसमाचार . . . जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में, अपने पुत्र . . . के विषय में प्रतिज्ञा की थी, . . . ।’’ परमेश्वर के सुसमाचार का सम्बन्ध, परमेश्वर के ‘पुत्र’ से है। हमें परमेश्वर के पुत्र के बारे में, दो बातें अभी तुरन्त स्पष्ट करना आवश्यक है, अन्यथा हम दूर भटक जायेंगे।

1) इसके पूर्व कि ‘वह’ मानव बना, परमेश्वर का ‘पुत्र’ अस्तित्व में था।

रोमियों 8: 3 को देखिये, ‘‘क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उस को परमेश्वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिए भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।’’ परमेश्वर ने उसे भेजा कि वह मानव शरीर धारण कर ले। अतः इसके पूर्व कि वह मनुष्य बने, ‘पुत्र’, परमेश्वर के ‘पुत्र’ के रूप में, अस्तित्व में था। इसका अर्थ है कि एक अत्यन्त अद्वितीय रूप में - उस तरह नहीं जैसे हम परमेश्वर के पुत्र हैं - मसीह, परमेश्वर का पुत्र है और था (रोमियों 8: 14, 19)।

2) मसीह स्वयं परमेश्वर है।

रोमियों 9: 5 में, इस्राएल के सौभाग्यों का उल्लेख करते हुए, पौलुस कहता है, ‘‘ . . . पुरखे भी उन्हीं के हैं, और मसीह भी शरीर के भाव से उन्हीं (अर्थात्, इस्राएल) में से हुआ, जो सब के ऊपर परम परमेश्वर युगानुयुग धन्य है। आमीन।’’ और कुलुस्सियों 2: 9 में पौलुस कहता है, ‘‘उस (मसीह) में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है।’’ अतः जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर का सुसमाचार, ‘उसके’ ‘पुत्र’ से संबंधित है, उसका अर्थ है कि इसका संबंध ईश्वरीय, पूर्ववर्ती ‘पुत्र’ से है। परमेश्वर का सुसमाचार इस बारे में नहीं है कि परमेश्वर मानवीय मामलों का बेहतर ढंग से व्यवस्थित कर रहा है। ये इस बारे में है कि परमेश्वर, अपने पुत्र के व्यक्तित्व में जो पिता का परिपूर्ण प्रतिरूप है और स्वयं परमेश्वर है, मानवीय मामलों में बाहर से गहरा प्रभाव डाल रहा है।

अतः पौलुस ‘‘परमेश्वर के सुसमाचार’’ पर यह कहने के द्वारा भारी वजन डालता है, प्रथम, कि इसके घटित होने के बहुत पूर्व ही यह परमेश्वर द्वारा - प्रतिज्ञा किया हुआ - सुनियोजित है,, और, द्वितीय, कि यह ईश्वरीय ‘पुत्र’ से सम्बन्धित है। विश्व के प्रभु-सत्ता सम्पन्न सृष्टिकर्ता ने, संसार के लिए भली चीजों की योजना बनायी है, और इस योजना के केन्द्र में ‘उसका’ ‘पुत्र’ है।

‘‘ . . . जो शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ . . . ’’

परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में तीसरी बात जो पौलुस कहता है, वो यह है कि यह ईश्वरीय ‘पुत्र’ ‘शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ।’’ यह तुरन्त दो बातें कहता है:

1) परमेश्वर का ‘पुत्र’ मनुष्य बना।

‘वह’ पैदा हुआ। वो काम जो उसे करना था - जिस जीवन-लक्ष्य पर वह था - इसकी मांग थी कि ‘वह’ अपने ईश्वरीय स्वभाव के साथ, एक मानव स्वभाव धारण करे। परमेश्वर ने एक मनुष्य को चुनकर, उसे अपना पुत्र नहीं बनाया; उसने अपने सनातन, एकमात्र ‘पुत्र’ को मनुष्य बनाने का चुनाव किया।

2) पुराना नियम में राजा दाऊद के वश में, ‘वह’ पैदा हुआ।

यह परमेश्वर के सुसमाचार का हिस्सा क्यों है ? यह शुभ-समाचार क्यों है ? उत्तर यह है कि पुराना नियम की सभी प्रतिज्ञाएँ, ‘मुक्तिदाता’ - ‘उस’ अभिषिक्त, के आगमन पर निर्भर रहीं - जो दाऊद के वश में एक राजा के रूप में राज्य करेगा और परमेश्वर के लोगों के शत्रुओं को जीतेगा और सदाकाल के लिए धार्मिकता और शान्ति ले आयेगा। ‘वह’ परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं के लिए ‘‘हाँ’’ होगा।

पुराना नियम की दो प्रतिज्ञाओं पर विचार कीजिए। यिर्मयाह 23: 5, ‘‘यहोवा की यह भी वाणी है, ‘देख ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और वह राजा बनकर बुद्धि से राज्य करेगा, और अपने देश में न्याय और धर्म से प्रभुता करेगा।’’’ अथवा, यशायाह 11: 10, ‘‘उस समय यिशै की जड़ (अर्थात्, यिशै की सन्तान, दाऊद का पुत्र) देश दश के लोगों के लिये एक झण्डा होगी ; सब राज्यों के लोग उसे ढूँढ़ेंगे, और उसका विश्रामस्थान तेजोमय होगा।’’

अतः परमेश्वर का सुसमाचार, शुभ-संदेश है कि अब, सैंकड़ों साल बाद, परमेश्वर ने ‘अपनी’ योजना व प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए कार्य किया है कि दाऊद के वंश में से एक राजा आया, और, जैसा यशायाह 9:6-7 कहता है, ‘‘प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राज- कुमार रखा जाएगा। उसकी प्रभुता सर्वदा बढ़ती रहेगी, और उसकी शान्ति का अन्त न होगा।’’

अतः ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’, शुभ-समाचार है कि समय पूरा हुआ है और परमेश्वर का राज्य निकट है (मरकुस 1: 14- 15, ‘‘यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया, और कहा, ‘समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है ; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो’’’)। परमेश्वर के ‘पुत्र’ का संसार में आना, प्रतिज्ञा किये गए राजा, ‘दाऊद की सन्तान’ का आना था। ‘वह’ सब जातियों पर राज्य करेगा और परमेश्वर के शत्रुओं पर जय पायेगा तथा धार्मिकता व शान्ति के साथ राज्य करेगा और, यशायाह 35: 10 के अनुसार ‘‘यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटकर जयजयकार करते हुए सियोन में आएँगे ; और उनके सिर पर सदा का आनन्द होगा ; वे हर्ष और आनन्द पाएँगे और शोक और लम्बी सांस का लेना जाता रहेगा।’’ यही है जो पद 3 को ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’ बनाता है। परमेश्वर के ‘पुत्र’ का दाऊद की ‘सन्तान/पुत्र’ के रूप में आने का अर्थ होगा, परमेश्वर की उपस्थिति में सदा का आनन्द - परमेश्वर के सब छुड़ाए हुए लोगों के लिए।

‘‘ . . . पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है . . . ’’

लेकिन एक और बात है जो पौलुस ‘‘परमेश्वर के सुसमाचार’’ के बारे में कहता है। इसके घटित होने से पूर्व न केवल इसकी योजना बनायी गई व प्रतिज्ञा की गई थी ; और न केवल यह ‘उसके’ ईश्वरीय, पूर्ववर्ती (पहले से ही अस्तित्व में) ‘पुत्र’ से सम्बन्धित है ; और न केवल यह संदेश है कि पुराना नियम की आशाओं तथा परमेश्वर के राज्य में धार्मिकता व शान्ति व आनन्द के स्वप्नों को परिपूर्ण करने के लिए यह ‘पुत्र’, दाऊद के मानव पुत्र के रूप में पैदा हुआ है ; अपितु, पद 4 में, पौलुस कुछ ऐसा कहता है जो सर्वनाश करने वाला और उल्लासित करने वाला, दोनों था। वह कहता है कि परमेश्वर का ‘पुत्र’, ‘‘पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है।’’

मैं क्यों कहता हूँ कि ये सर्वनाश करने वाला था? पौलुस के दिनों में अधिकांश यहूदी लोगों ने आशा की थी कि ‘मुक्तिदाता’ सामर्थ्य व राजनैतिक नियंत्रण/अधिकार के साथ आयेगा, और संसार के अत्याचारी शासकों, रोमियों को, पराजित करेगा, और यरूशलेम में पृथ्वी पर का एक राज्य स्थापित करेगा और अपने लोगों के साथ सदा के लिए विजयी होकर जीवित रहेगा। किन्तु पद 4 में पौलुस जो कहता है उसमें अन्तर्निहित है कि पद 3 व 4 के बीच ‘दाउद का पुत्र’ मर गया। ‘वह’ मर गया! वे जिन्होंने सोचा था कि ‘वह’ ‘मुक्तिदाता’ था, उजड़ गए। मुक्तिदाता मरते नहीं हैं। वे जीवित रहते और विजित होते व शासन करते हैं। वे बन्दी नहीं बनाये जाते और पीटे नहीं जाते और ठट्ठों में नहीं उड़ाये जाते और क्रूस पर नहीं चढ़ाये जाते और अपने लोगों को निसहाय नहीं छोड़ते। यह पूरी तरह सर्वनाशकारी था। (लूका 24: 21, ‘‘परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्राएल को छुटकारा देगा’’)।

पौलुस अध्याय 3 व 5 व 8 में वापस मसीह की मृत्यु पर आयेगा। किन्तु अभी के लिए, वह तुरन्त परमेश्वर के सुसमाचार में विजय के आनन्ददायक स्वर पर आ जाता है। पौलुस पद 4 में कहता है, यह मृतक ‘मुक्तिदाता’, मृतकों में से जिलाया गया। यह परमेश्वर के सुसमाचार के मर्म में है। और पौलुस इस पुनरुत्थान के बारे में दो बातें कहता है:

1) मृतकों में से ये पुनरुत्थान, ‘‘पवित्रता के आत्मा के भाव से’’ था।

इसका क्या अर्थ है ? मैं इसका अर्थ कम से कम दो बातों में लेता हूँ।

अ. परमेश्वर के ‘पवित्र आत्मा’ ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया।

मैं अपना संकेत रोमियों 8: 11 से लेता हूँ, जहाँ पौलुस कहता है, ‘‘और यदि उसी का ‘आत्मा’ जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है ; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने ‘आत्मा’ के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।’’ यह सिखाता है कि हम परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा जिलाये जायेंगे, जो हमारे अन्दर वास करता है, वैसे ही जैसे कि मसीह जिलाया गया था। अतः यीशु को मरे हुओं में से जिलाने में ‘आत्मा’ सम्मिलित था।

ब. लेकिन पौलुस क्यों यह असामान्य अभिव्यक्ति, ‘‘पवित्रता का आत्मा’’ उपयोग करता है, (जो नया नियम में और कहीं नहीं पाया जाता)?

मेरा सुझाव यह है। मृतकों के साथ व्यवहार/बर्ताव करना, एक गन्दा व्यवसाय था। जब शाऊल मृतक के साथ सम्पर्क करना चाहता था, वह एन्दोर की भूतसिद्धि करने वाली के पास गया (1 शमूएल 28: 7 से आगे), और यह एक गुप्त और अवैध पेशा था। भूत साधने वाले और शगुन निकालने वाले और टोना करने वाले, इस्राएल में घृणित थे। जब मृतक मर जाते हैं, आप उन्हें अकेला छोड़ देते हैं और उनसे कोई व्यवहार नहीं रखते। विश्वासियों के लिए आत्मायन (मृत-आत्माओं से सम्पर्क) नियम विरोध था और है। मृतकों के साथ बर्ताव करना एक प्रकार का काला-जादू रहा है, एक सुन्दर, साफ, पवित्र चीज नहीं। इस सब के अलावा। एक प्राण दण्ड पाया मृतक, मरे हुओं में से जिलाया जा रहा है, यह बात भी कई लोगों के कानों में नितान्त भयंकर और घटिया और गन्दी और अशुद्ध लगी होगी, काला-टोना और काला-जादू के समान।

इन सब से ऊपर हटकर पौलुस ठीक विपरीत बात पर जोर देता है: मसीह, पवित्रता के ‘आत्मा’ के भाव से मृतकों में से जिलाया गया था, किसी अन्धकार की आत्मा या दुष्ट आत्मा या अशुद्ध आत्मा के भाव से नहीं, अपितु स्वयँ परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा जो सर्वोपरि पवित्रता से चिन्हित है। यीशु को जिलाने में ‘वह’ अशुद्ध नहीं हुआ। यह करना एक पवित्र कार्य था। ये उचित और अच्छा और साफ और सुन्दर और परमेश्वर को सम्मान देने वाला था, परमेश्वर के महत्व को घटाने वाला नहीं। यह पवित्र था।

2) इस पुनरुत्थान के द्वारा मसीह ‘‘सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का ‘पुत्र’ ठहरा (या नियुक्त किया गया)।’’

यहाँ पर मुख्य वाक्यांश ‘‘सामर्थ्य के साथ’’ है। मैं सोचता हूँ कि एन.ए.एस.बी. और के.जे.वी. और आर.एस.वी., यह दिखाने में सही हैं कि यह वाक्यांश ‘‘परमेश्वर के पुत्र’’ को रूपान्तरित करता है। बिन्दु यह नहीं है कि पुनरुत्थान के पूर्व, मसीह परमेश्वर का पुत्र नहीं था। बिन्दु यह है कि पुनरुत्थान में मसीह, अकेलेपन तथा मानवीय सीमा व दुर्बलता में परमेश्वर का ‘पुत्र’ होने से आगे बढ़कर, सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का ‘पुत्र’ ठहरा। मुख्य वाक्यांश है, ‘‘सामर्थ्य के साथ’’।

यीशु का वही अर्थ था जब पुनरुत्थान के बाद ‘उसने’ कहा, ‘‘स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है’’(मत्ती 28:18)। यही अर्थ पौलुस का 1 कुरिन्थियों 15: 25-26 में था, जब उसने जी उठे हुए मसीह के बारे में कहा, ‘‘जब तक कि वह अपने बैरियों को अपने पावों तले न ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है। सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु, मसीह राजा है। ‘वह’ अभी संसार पर राज्य कर रहा है। ‘वह’ अपने सब शत्रुओं को अपने पावों के नीचे ला रहा है। एक दिन आयेगा जब ‘वह’ अपने अदृश्य राज्य में से, प्रत्यक्ष महिमा के साथ उभर कर बाहर आयेगा, और प्रत्यक्षतः व महिमित रूप में पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करेगा। ‘‘सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र’’, के द्वारा पौलुस का यही अर्थ है। ‘वह’ अभी शासन कर रहा है। ‘वह’ अपने लक्ष्यों को अपने ‘आत्मा’ और अपनी कलीसिया के द्वारा कार्यरूप में परिणित कर रहा है। और वो दिन आयेगा जब मसीह प्रत्येक शत्रु को पराजित कर देगा, और हर एक घुटना टिकेगा और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार करेगी कि ‘वह’ ही प्रभु है (फिलिप्पियों 2: 11) ।

वो परमेश्वर के सुसमाचार की परिपूर्णता होगी (का समापन होगा)। जिसके लिए हम कहते हैं, ‘‘आमीन। हे प्रभु यीशु आ।’’

Thumb author john piper

John Piper (@JohnPiper) is founder and teacher of desiringGod.org and chancellor of Bethlehem College & Seminary. For 33 years, he served as pastor of Bethlehem Baptist Church, Minneapolis, Minnesota. He is author of more than 50 books, including A Peculiar Glory.